पूर्व विधानसभा अध्यक्ष पर मुकदमा चलाने की राज्यपाल की मंजूरी क्यों मानी जा रही है ऐतिहासिक?
देवेंद्र किशोर
मिजोरम में पिछले कुछ वर्षों से राजनीतिक शुचिता, प्रशासनिक पारदर्शिता और विकास बजट के उपयोग को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। ऐसे समय में पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और पूर्व मंत्री लालरिंलिना सैलो के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले में मुकदमा चलाने की अनुमति राज्यपाल वी. के. सिंह द्वारा दिए जाने से राज्य की राजनीति में नई हलचल पैदा हो गई है।
यह केवल एक कानूनी प्रक्रिया भर नहीं है, बल्कि इसे मिजोरम के राजनीतिक इतिहास में “सत्ता संरक्षण से ऊपर कानून की सर्वोच्चता” स्थापित करने वाले निर्णायक कदम के रूप में देखा जा रहा है। लंबे समय से राजनीतिक प्रभाव और दलगत समीकरणों के कारण संवेदनशील भ्रष्टाचार मामलों के दब जाने के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे में राज्यपाल का यह कदम प्रशासनिक तंत्र को सक्रिय और जवाबदेह बनाने का संकेत माना जा रहा है।
आरोपों के केंद्र में सड़क निर्माण परियोजना
पूरा मामला पूर्वी मिजोरम की खाव्जावल–नगाइजावल सड़क निर्माण परियोजना से जुड़ा हुआ है। राज्य भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) की जांच के अनुसार, साइलो पर अपने राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव का उपयोग कर परियोजना की उप-ठेका प्रक्रिया को प्रभावित करने का आरोप है।
जांच में परियोजना से जुड़े धन के अनियमित लेनदेन, निजी हितों के लिए सरकारी पहुंच के दुरुपयोग तथा ठेकेदारों के माध्यम से धन हस्तांतरण किए जाने के दावे किए गए हैं। एसीबी के अनुसार लगभग ९७.८५ लाख रुपये की राशि के दुरुपयोग की आशंका जताई गई है।
सबसे संवेदनशील आरोप यह है कि जांचकर्ताओं का दावा है कि साइलो ने विधानसभा अध्यक्ष के पद पर रहते हुए भी परियोजना से संबंधित धनराशि प्राप्त की। यदि अदालत में ये आरोप सिद्ध होते हैं, तो यह मिजोरम की राजनीतिक नैतिकता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करेगा।
राजनीतिक सफर से विवाद तक:
साइलो का राजनीतिक जीवन भी काफी दिलचस्प रहा है। वे एक समय इंडियन नेशनल कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार में मंत्री थे। बाद में २०१८ के विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने कांग्रेस छोड़कर मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) का दामन थामा और चुनाव जीतने के बाद विधानसभा अध्यक्ष बने।
२०२३ के चुनाव से पहले वे भरतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए, लेकिन चुनाव हार गए। लगातार दल बदलने और सत्ता के केंद्र के निकट बने रहने की राजनीतिक संस्कृति ने भी उनकी भूमिका को लेकर सार्वजनिक बहस को तेज किया है।
राज्यपाल का निर्णय ऐतिहासिक क्यों?
भारतीय राज्यों की राजनीति में उच्च पदों पर बैठे नेताओं के खिलाफ जांच आगे बढ़ाने के लिए अभियोजन स्वीकृति अक्सर बड़ी बाधा बनती रही है। कई मामलों में राजनीतिक दबाव, गठबंधन की मजबूरियां और प्रशासनिक देरी के कारण मुकदमे आगे नहीं बढ़ पाए।
लेकिन इस बार राज्यपाल ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, १९८८ और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), २०२३ के तहत अभियोजन की अनुमति देकर अदालत में मुकदमा चलाने का रास्ता साफ कर दिया है। इससे यह संदेश गया है कि संवैधानिक पद केवल औपचारिक नहीं, बल्कि जवाबदेह भी हो सकते हैं।
विशेष रूप से पूर्वोत्तर भारत के छोटे राज्यों में राजनीति अक्सर व्यक्तिकेंद्रित मानी जाती है। ऐसे में इस तरह का निर्णय दुर्लभ माना जा रहा है। इसलिए इसे “भ्रष्टाचार के खिलाफ संस्थागत सक्रियता” का उदाहरण बताया जा रहा है।
मिजोरम में बढ़ते भ्रष्टाचार को लेकर चिंता:
मिजोरम लंबे समय तक भारत के सबसे शांत और सामाजिक अनुशासन वाले राज्यों में गिना जाता रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में विकास परियोजनाओं में देरी, ठेका प्रक्रियाओं में अपारदर्शिता, राजनीतिक संरक्षणवाद और सार्वजनिक धन के उपयोग को लेकर सवाल लगातार बढ़े हैं।
सड़क, ग्रामीण बुनियादी ढांचे और सरकारी योजनाओं में कथित अनियमितताओं ने जनता के विश्वास को कमजोर किया है। यही कारण था कि २०२२ के विधानसभा बजट सत्र के दौरान विपक्षी दलों ने साइलो पर लगे आरोपों के विरोध में सदन से वॉकआउट किया था।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया कि भ्रष्टाचार अब केवल कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि सार्वजनिक नैतिकता और लोकतांत्रिक जवाबदेही का विषय बन चुका है।
आगे की राह:
राज्यपाल की मंजूरी के बाद अब मामला अदालत में जाएगा। अदालत सबूतों, वित्तीय लेनदेन, ठेका प्रक्रिया और आरोपित व्यक्तियों की भूमिका की विस्तृत जांच करेगी। कानूनी सिद्धांत के अनुसार, दोष सिद्ध होने तक साइलो को निर्दोष माना जाएगा।
लेकिन राजनीतिक दृष्टि से यह मामला एक बड़ा संदेश दे चुका है, सत्ता में बैठे लोग भी जांच के दायरे से बाहर नहीं हैं।
यदि जांच निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से आगे बढ़ती है, तो यह केवल मिजोरम ही नहीं, बल्कि पूरे पूर्वोत्तर भारत में सुशासन और जवाबदेही पर नई बहस को जन्म दे सकती है। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई केवल नारों तक सीमित न रहकर संस्थागत व्यवहार में बदलती दिखाई दे रही है।










