जयशंकर का संभावित नेपाल यात्रा: नई दिल्ली–काठमांडू संबंधों का नया अध्याय या पुरानी दुविधा?

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देवेंद्र किशोर

नेपाल–भारत संबंध दक्षिण एशियाई कूटनीति में सबसे जटिल, संवेदनशील और बहुआयामी संबंधों में से एक है। खुली सीमा, सांस्कृतिक निकटता, धार्मिक संबंध, आर्थिक परस्पर निर्भरता और राजनीतिक प्रभाव के कारण दोनों देशों के बीच संबंध केवल दो सरकारों के औपचारिक रिश्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जनस्तर से लेकर रणनीतिक स्तर तक गहराई से जुड़ा हुआ है। इसी संदर्भ में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर की संभावित नेपाल यात्रा को कूटनीतिक हलकों में विशेष महत्व के साथ देखा जा रहा है।
भारत के विदेश मंत्रालय ने नेपाल से औपचारिक निमंत्रण मिलने की पुष्टि कर दी है। हालांकि यात्रा की तारीख अभी तय नहीं हुई है, लेकिन इसका राजनीतिक और कूटनीतिक संदेश स्पष्ट है—काठमांडू और नई दिल्ली दोनों ही अब अपने संबंधों को पुनर्परिभाषित करने की प्रक्रिया में प्रवेश कर रहे हैं। विशेष रूप से नेपाल में नए राजनीतिक समीकरण बनने के बाद भारत अपने रणनीतिक संवाद को और अधिक सक्रिय करने के संकेत दे रहा है।
जयशंकर कोई साधारण कूटनीतिज्ञ नहीं हैं। वे भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विश्वासपात्र ही नहीं, बल्कि पिछले वर्षों में भारत की ‘पड़ोसी प्रथम नीति’, इंडो–पैसिफिक रणनीति और चीन के साथ शक्ति संतुलन में निर्णायक भूमिका निभाने वाले प्रमुख व्यक्तित्वों में से एक हैं। नेपाल के प्रति उनका दृष्टिकोण हमेशा व्यावहारिक और रणनीतिक माना जाता रहा है। इसलिए उनकी संभावित नेपाल यात्रा को केवल औपचारिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार वे काठमांडू के मेयर बालेन शाह से भी मुलाकात कर सकते हैं। यदि ऐसी मुलाकात होती है, तो यह केवल स्थानीय सरकार के साथ एक सामान्य संवाद नहीं होगा। बालेन शाह हाल के वर्षों में वैकल्पिक राजनीतिक चेतना के प्रतीक के रूप में उभरे हैं। युवा वर्ग में उनकी लोकप्रियता और पारंपरिक राजनीतिक दलों के प्रति असंतोष को वे प्रतिनिधित्व करते हैं। यह संकेत हो सकता है कि भारत अब केवल केंद्र सरकार ही नहीं, बल्कि नेपाल के भीतर उभरते नए शक्ति केंद्रों के साथ भी अपने संबंधों को विस्तार देना चाहता है।
लेकिन नेपाल–भारत संबंधों की चर्चा में एक मुद्दा अनदेखा नहीं किया जा सकता—सीमा विवाद। विशेष रूप से लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी क्षेत्र को लेकर विवाद ने दोनों देशों के बीच भावनात्मक दूरी पैदा की थी। नेपाल द्वारा नया नक्शा जारी कर इन क्षेत्रों को अपने हिस्से के रूप में शामिल करने के बाद संबंध कुछ समय के लिए तनावपूर्ण हो गए थे। उस समय भारत की ओर से कड़ा रुख अपनाया गया था और नेपाल में राष्ट्रवाद की बहस तेज हो गई थी।
वर्तमान स्थिति थोड़ी अलग दिखाई देती है। नेपाल सरकार ने अपना आधिकारिक रुख नहीं बदला है। विवादित क्षेत्रों पर उसका दावा अब भी कायम है। लेकिन संवाद की शैली बदल रही है—टकराव की जगह संवाद, भावनात्मक प्रतिक्रिया की जगह कूटनीतिक संयम और सार्वजनिक आरोप–प्रत्यारोप की जगह संरचनात्मक सहयोग पर जोर दिया जा रहा है। भारत भी नेपाल को पूरी तरह नजरअंदाज करने की स्थिति में नहीं है, क्योंकि चीन की बढ़ती सक्रियता दक्षिण एशियाई रणनीति में एक नई चुनौती बन चुकी है।
इसी कारण जयशंकर की संभावित यात्रा केवल द्विपक्षीय मुलाकातों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह क्षेत्रीय शक्ति संतुलन से भी जुड़ी हुई है। पिछले वर्षों में नेपाल में चीन का बुनियादी ढांचा निवेश, बीआरआई परियोजनाएँ, ऊर्जा सहयोग और राजनीतिक पहुंच बढ़ी है। भारत इसे बारीकी से देख रहा है। इसलिए नेपाल के साथ संबंधों को नए ढंग से व्यवस्थित करना उसके लिए रणनीतिक आवश्यकता बन गया है।
नेपाल के लिए भी भारत के साथ संबंध संवेदनशील विषय है। आर्थिक दृष्टि से नेपाल अभी भी काफी हद तक भारत पर निर्भर है। व्यापार, पेट्रोलियम, रोजगार, बिजली निर्यात, परिवहन और आपूर्ति प्रणाली में भारत की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। दूसरी ओर नेपाली समाज में भारत के प्रति विश्वास और संदेह दोनों समानांतर रूप से मौजूद हैं। एक तरफ धार्मिक–सांस्कृतिक निकटता है, तो दूसरी ओर राजनीतिक हस्तक्षेप को लेकर गहरी मनोवैज्ञानिक असंतुष्टि भी है।
ऐसी स्थिति में नेपाल सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती संतुलित कूटनीति की है। राष्ट्रीय स्वाभिमान पर स्पष्ट रुख रखते हुए आर्थिक और रणनीतिक सहयोग को मजबूत करना आवश्यक है। केवल राष्ट्रवाद की राजनीति से संबंध नहीं चल सकता, और न ही राष्ट्रीय हितों की अनदेखी कर निकटता टिकाऊ हो सकती है।
जयशंकर की संभावित यात्रा इस दुविधा के बीच एक नए संवाद का अवसर बन सकती है। यदि इस यात्रा में सीमा मुद्दा, ऊर्जा व्यापार, कनेक्टिविटी, निवेश, युवा नेतृत्व और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे विषयों पर स्पष्ट और परिपक्व बातचीत होती है, तो यह संबंधों को नई दिशा दे सकती है। लेकिन यदि यह केवल औपचारिकता या शक्ति प्रदर्शन तक सीमित रह जाती है, तो नेपाली जनता में मौजूद अविश्वास और गहरा हो सकता है।
नेपाल और भारत का संबंध इतिहास, भूगोल और जनभावनाओं से जुड़ा हुआ संबंध है। इसे न तो केवल सरकारें बिगाड़ सकती हैं और न ही एक झटके में आदर्श बना सकती हैं। आवश्यकता पारदर्शी संवाद, पारस्परिक सम्मान और संवेदनशील मुद्दों पर ईमानदार कूटनीति की है। जयशंकर की संभावित नेपाल यात्रा यह तय करेगी कि काठमांडू–नई दिल्ली संबंधों की दिशा आगे किसh ओर जाती है—नए विश्वास की ओर या पुरानी दुविधाओं की पुनरावृत्ति की ओर।

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