महात्मा गाँधी द्वारा अपने जीवनकाल में किए गए विभिन्न अनशन और सत्याग्रह भारत के स्वतंत्रता संग्राम के महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाक्रम माने जाते हैं।
सन् १९१५ में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने के बाद सन् १९४८ में हुई हत्या से पहले तक गाँधी जी ने लगभग ३० बार अनशन किया था। सामान्यतः यह माना जाता है कि गाँधी जी के सभी अनशन ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध केंद्रित थे, लेकिन इतिहास एक अलग ही तथ्य दिखाता है। गाँधी जी द्वारा किए गए ३० अनशनों में से केवल चार अनशन ही प्रत्यक्ष रूप से ब्रिटिश सरकार की नीति और कदमों के विरुद्ध केंद्रित थे। गाँधी जी अनशन को किसी भी सरकार या व्यवस्था के विरुद्ध प्रयोग किया जाने वाला अंतिम कूटनीतिक तथा नैतिक हथियार मानते थे। वे अपने ही सहयोगियों, अनुयायियों या समाज में देखी गई गलतियों, हिंसा और भेदभाव का प्रायश्चित्त करने तथा सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने के लिए अनशन का सहारा लिया करते थे।
गाँधी के अनशनों में से सन् १९३२ के ‘पूना पैक्ट’ से जुड़ा यरवदा जेल का अनशन और सन् १९४३ का आगा खान पैलेस का २१ दिनों का अनशन सबसे संवेदनशील और चर्चित माना जाता है। सन् १९३२ में ब्रिटिश सरकार द्वारा दलितों के लिए घोषित पृथक निर्वाचन क्षेत्र की व्यवस्था के विरुद्ध गाँधी ने जेल के भीतर ही अनशन शुरू किया था। बाद में डॉ. भीमराव आंबेडकर और अन्य हिंदू नेताओं के बीच हुए ऐतिहासिक समझौते के बाद संयुक्त निर्वाचन प्रणाली के भीतर ही दलितों के लिए सीटें आरक्षित करने की व्यवस्था कर ‘पूना पैक्ट’ पर हस्ताक्षर किए गए थे। इसी प्रकार गाँधी ने जातीय भेदभाव और छूआछूत उन्मूलन के लिए भी बार-बार अनशन किया था।
गाँधी के जीवन का सबसे जोखिम भरा अनशन सन् १९४३ में आगा खान पैलेस (जो उस समय जेल के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा था) में हुआ था। सन् १९४२ के ‘भारत छोड़ो’ (क्विट इंडिया) आंदोलन के दौरान देश भर में फैली हिंसा और अशांति का पूरा दोष ब्रिटिश सरकार और तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने गाँधी जी और कांग्रेस पर मढ़ दिया था। गाँधी जी ने अपने ऊपर लगाए गए आरोपों को या तो प्रमाण सहित सिद्ध करने या उन्हें वापस लेने के लिए वायसराय को पत्र लिखा था। लेकिन जब ब्रिटिश सरकार अपने रुख से पीछे नहीं हटी, तो ७३ वर्ष के वृद्ध गाँधी जी ने आरोपों का प्रतिवाद करते हुए २१ दिनों के अनशन की घोषणा कर दी। कमजोर स्वास्थ्य और ढलती उम्र के कारण डॉक्टरों ने उनके इस अनशन से जीवित लौटने की उम्मीद पूरी तरह से छोड़ दी थी।
अनशन के दौरान गाँधी जी की स्वास्थ्य स्थिति दिन-ब-दिन बिगड़ती गई और उनके गुर्दों (किडनी) पर गंभीर असर पड़ा, जिससे शरीर में यूरीमिया के लक्षण दिखाई देने लगे। गाँधी जी की स्थिति मृत्यु के कगार पर पहुँचने के बाद ब्रिटिश सरकार ने भी उनके बचने की उम्मीद छोड़ दी थी। ब्रिटिश प्रशासन ने गाँधी जी के संभावित निधन को ध्यान में रखते हुए उनके अंतिम संस्कार के लिए आवश्यक चंदन और अन्य लकड़ियों का प्रबंध करने के साथ-साथ शवयात्रा के मार्ग का भी चयन कर लिया था। गाँधी जी के निधन के बाद देश भर में भड़कने वाले सम्भावित दंगों और आंदोलनों को कुचलने के लिए ब्रिटिश सरकार ने अपने सभी प्रशासनिक और सैन्य अधिकारियों को हाई अलर्ट (उच्च सतर्कता) पर रखा था। लेकिन चिकित्सकों की निरंतर देखरेख और अंततः फल के रस की कुछ बूँदें मिले हुए पानी को पीने के लिए तैयार होने के बाद गाँधी जी के स्वास्थ्य में धीरे-धीरे सुधार आया और वे इस जानलेवा संकट से उबरने में सफल रहे।









