गंगटोक/दार्जिलिंग(वरण्य जुनेजा): वर्ष १९७५ में हिमालयी राज्य सिक्किम का भारतीय संघ में विलय दक्षिण एशियाई आधुनिक इतिहास की एक अत्यंत युगांतरकारी एवं दूरगामी घटना थी। तीन दशकों से भी अधिक समय तक भारत के संरक्षण में रहने के पश्चात, सिक्किम की जनता ने एक ऐतिहासिक जनमत-संग्रह के माध्यम से राजशाही को समाप्त कर भारत के २२वें राज्य के रूप में अपनी नई पहचान चुनी। यह संपूर्ण घटनाक्रम सामाजिक आकांक्षाओं, लोकतांत्रिक चेतना और भू-राजनीतिक सुरक्षा का एक अनुपम संगम सिद्ध हुआ।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और रणनीतिक महत्व
ब्रिटिश औपनिवेशिक काल से ही सिक्किम की भौगोलिक स्थिति अत्यंत संवेदनशील रही है। तिब्बत, भूटान, नेपाल और पश्चिम बंगाल से घिरे इस भूभाग को तत्कालीन ब्रिटिश शासकों ने चीन के साथ व्यापारिक मार्गों (विशेषकर नाथू ला दर्रा) की सुरक्षा और एक ‘बफर स्टेट’ के रूप में स्थापित किया था। १८१७ की टिटलिया संधि और १८६१ की तुमलोंग संधि के माध्यम से यहाँ ब्रिटिश प्रभाव सुदृढ़ हुआ। १९४७ में भारत की स्वतंत्रता के उपरांत, तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने मध्य मार्ग अपनाते हुए १९५० की भारत-सिक्किम संधि के अंतर्गत सिक्किम की आंतरिक स्वायत्तता को अक्षुण्ण रखा, जबकि रक्षा, विदेश नीति और संचार का दायित्व भारत सरकार को सौंपा गया।
जनसांख्यिकीय असंतुलन और ‘पैरिटी सिस्टम’ का विरोध
सिक्किम के इस राजनीतिक रूपांतरण के मूल में वहाँ का सामाजिक ताना-बाना था। मूल निवासी लेप्चा और भूटिया समुदायों के अतिरिक्त, ब्रिटिश काल में बड़ी संख्या में आकर बसे नेपाली मूल के लोग १९५० के दशक तक कुल जनसंख्या का लगभग ७५ प्रतिशत हो चुके थे। इसके विपरीत, शासन की बागडोर और प्रशासनिक शक्तियाँ केवल २५ प्रतिशत आबादी वाले भूटिया-लेप्चा वर्ग के हाथों में केंद्रित थीं। राजशाही द्वारा स्थापित ‘पैरिटी सिस्टम’ (समान प्रतिनिधित्व व्यवस्था) ने बहुसंख्यक नेपाली समुदाय में तीव्र असंतोष को जन्म दिया, क्योंकि यह व्यवस्था ‘एक व्यक्ति, एक मत’ के लोकतांत्रिक सिद्धांत के विपरीत थी।
जन-आंदोलन से जनमत-संग्रह तक का सफर
अप्रैल १९७३ में चोग्याल पाल्देन थोंडुप नामग्याल के शासन के विरुद्ध जन-आक्रोश फूट पड़ा। काजी ल्हेंदुप दोरजी और सिक्किम नेशनल कांग्रेस के नेतृत्व में लोकतंत्र समर्थक आंदोलन ने तीव्र रूप धारण कर लिया। स्थिति को अनियंत्रित देख चोग्याल ने भारत सरकार से हस्तक्षेप का आग्रह किया। इसके पश्चात, १९७४ के ऐतिहासिक चुनावों में काजी ल्हेंदुप दोरजी की पार्टी ने अभूतपूर्व विजय प्राप्त की और विधानसभा की ३२ में से ३१ सीटों पर कब्ज़ा कर ‘गवर्नमेंट ऑफ सिक्किम एक्ट’ पारित किया, जिसने राजा की शक्तियों को सीमित कर दिया।
एक नए राज्य का उदय
चोग्याल द्वारा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समर्थन जुटाने के प्रयासों के विरोध में सिक्किम विधानसभा ने १० अप्रैल १९७५ को राजशाही के उन्मूलन का प्रस्ताव पारित किया। तदोपरांत, १४ अप्रैल १९७५ को आयोजित राज्यव्यापी जनमत-संग्रह में सिक्किम की जनता ने अभूतपूर्व ऐतिहासिक निर्णय दिया। कुल मतदान में से ९७.५५% (५९,६३७ मत) भारत में विलय के पक्ष में पड़े, जबकि विरोध में मात्र २.४५%(१,४९६ मत) ही रहे।

भारतीय संसद द्वारा ३६वाँ संविधान संशोधन पारित किए जाने के बाद, १६ मई १९७५ को तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के हस्ताक्षर के साथ सिक्किम आधिकारिक रूप से भारत का अंग बन गया। काजी ल्हेंदुप दोरजी ने राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। आज सिक्किम न केवल भारत का एक अभिन्न अंग है, अपितु देश के सबसे प्रगतिशील, सुरक्षित और अनुकरणीय राज्यों में अग्रणी है।










