देवेंद्र के. ढुंगाना
नई दिल्ली: बिहार की राजनीति में आज १५ अप्रैल एक प्रतीकात्मक मोड़ के रूप में सामने आया है। सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने के साथ “सम्राट युग” की शुरुआत कही जा रही है, लेकिन इसका वास्तविक अर्थ केवल सत्ता हस्तांतरण नहीं, बल्कि एक गहरी रणनीतिक पुनर्संरचना है। सतह पर देखने पर ऐसा लग सकता है कि नीतीश कुमार अपनी राजनीतिक भूमिका को कमजोर करते हुए सत्ता के केंद्र से पीछे हट रहे हैं। लेकिन बिहार की जटिल जातीय-राजनीतिक संरचना को समझने वालों के लिए यह कदम सत्ता त्याग नहीं, बल्कि सत्ता की पुनर्परिभाषा है।
नीतीश कुमार की राजनीति हमेशा प्रत्यक्ष सत्ता से अधिक अप्रत्यक्ष नियंत्रण पर केंद्रित रही है। उन्होंने अतीत में भी विभिन्न गठबंधनों को बदलते हुए अपनी प्रासंगिकता बनाए रखी है। अब सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाने का निर्णय भी उसी दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है। इससे वे प्रशासनिक जिम्मेदारियों से कुछ हद तक मुक्त होकर राजनीतिक संतुलन साधने वाले “केंद्रीय सूत्रधार” की भूमिका में स्थापित होते हैं।
जातीय समीकरण का पुनर्गठन:
सम्राट चौधरी का उदय केवल नेतृत्व परिवर्तन नहीं, बल्कि एक सामाजिक संदेश भी है। कोइरी समुदाय से आने वाले वे नीतीश द्वारा लंबे समय से बनाए गए “लव–कुश” (कुर्मी–कोइरी) समीकरण का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह समीकरण लालू प्रसाद यादव द्वारा स्थापित मुस्लिम–यादव गठबंधन को चुनौती देता रहा है।
सम्राट को आगे लाकर नीतीश ने स्पष्ट संकेत दिया है कि गैर-यादव ओबीसी और अत्यंत पिछड़ा वर्ग (इबिसि) अब भी उनके प्रभाव क्षेत्र में हैं। यह कदम राष्ट्रीय जनता दल के पारंपरिक सामाजिक आधार में दरार डालने की रणनीति भी है।
उपमुख्यमंत्री चयन: संतुलन का सूक्ष्म खेल:
नई व्यवस्था में उपमुख्यमंत्री पद के लिए चर्चा में रहे विजय चौधरी और बिजेंद्र प्रसाद यादव की भूमिका अहम है। भूमिहार और यादव—दो अलग सामाजिक आधारों को एक ही सत्ता संरचना में शामिल करने का प्रयास नीतीश की “समावेशी नियंत्रण” रणनीति को दर्शाता है।
परंपरागत रूप से उच्च जातियों का समर्थन भारतीय जनता पार्टी के साथ जुड़ा रहा है, जबकि यादव मतदाता आधार तेजस्वी यादव के नेतृत्व में आरजेडी की मुख्य ताकत है। ऐसे में यादव नेता को एनडीए ढांचे में शामिल करना विपक्ष के मूल आधार में हस्तक्षेप करने जैसा है।
यह कदम स्पष्ट करता है कि बिहार में जातीय राजनीति अब भी निर्णायक है, लेकिन उसका नियंत्रण और पुनर्गठन करने की क्षमता अब भी नीतीश के पास है।
भाजपा की भूमिका: साझेदारी या निर्भरता?
इस समीकरण में भाजपा एक मजबूत साझेदार जरूर है, लेकिन पूरी तरह स्वतंत्र निर्णायक के रूप में नहीं दिखती। सम्राट चौधरी भले ही भाजपा पृष्ठभूमि से आते हों, लेकिन समग्र शक्ति संरचना नीतीश की रणनीति के अनुरूप चलती दिखाई देती है।
भाजपा के लिए इन संतुलनों को स्वीकार करना मजबूरी भी है और रणनीति भी। बिहार जैसे सामाजिक रूप से जटिल राज्य में अकेले बहुमत हासिल करना कठिन है, इसलिए जेडीयू के साथ गठबंधन आवश्यक है। इस प्रकार, सत्ता साझेदारी भले ही बराबरी की लगे, लेकिन रणनीतिक नियंत्रण अब भी नीतीश के पास ही दिखाई देता है।
उच्च जातियों की ओर विस्तार: नया सामाजिक संदेश:
पिछले कुछ वर्षों में उच्च जातियों में पहचान-आधारित राजनीति को लेकर असहजता देखी गई है। आरक्षण और प्रतिनिधित्व के मुद्दों पर वे खुद को हाशिए पर महसूस कर रहे हैं।
नीतीश ने इस मनोविज्ञान को समझते हुए अपनी पार्टी को केवल पिछड़े वर्गों की पार्टी नहीं, बल्कि एक “सर्वसमावेशी” राजनीतिक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की है। विजय चौधरी जैसे नेताओं का उभार और ब्राह्मण नेतृत्व को संगठन में जगह देना इसी दिशा का संकेत है।
इससे जेडीयू अपनी सीमित सामाजिक परिधि से बाहर निकलकर व्यापक राजनीतिक आधार बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
“सम्राट युग” का वास्तविक अर्थ:
सम्राट चौधरी के नेतृत्व में शुरू हुए इस नए अध्याय को केवल नेतृत्व परिवर्तन के रूप में देखना अधूरा होगा। यह दरअसल “प्रत्यक्ष शासन” से “रणनीतिक नियंत्रण” की ओर बदलाव है।
नीतीश कुमार खुद को सत्ता संरचना के शीर्ष पर रखते हुए विभिन्न जातीय और राजनीतिक शक्तियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इससे वे न केवल चुनावी राजनीति में, बल्कि दीर्घकालिक शक्ति संरचना में भी निर्णायक बने रहते हैं।
निष्कर्ष:
बिहार की मौजूदा राजनीतिक स्थिति एक स्पष्ट संदेश देती है—यहां सत्ता केवल पद तक सीमित नहीं है, बल्कि समीकरणों, संतुलन और समयानुकूल रणनीतियों का खेल है। “सम्राट युग” की शुरुआत के साथ एक नई राजनीतिक यात्रा जरूर शुरू हुई है, लेकिन इसकी असली दिशा अब भी बिहार की राजनीति के पुराने और अनुभवी खिलाड़ी नीतीश कुमार ही तय करते नजर आते हैं।
आने वाले समय में यह व्यवस्था कितनी स्थिर रहती है और इसका शासन व विकास पर क्या प्रभाव पड़ता है, यही असली परीक्षा होगी। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि सत्ता बदली है, लेकिन शक्ति का केंद्र अभी भी वहीं है।








