नेपाल की अर्थव्यवस्था की स्थिति चुनौतीपूर्ण

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देवेन्द्र किशोर

नेपाल की अर्थव्यवस्था पिछले एक दशक से एक विरोधाभासी वास्तविकता का सामना कर रही है। एक ओर प्रति व्यक्ति आय (पर कॉपीटा इनकम ) में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, वहीं दूसरी ओर घरेलू उत्पादन, औद्योगिक विस्तार और रोजगार सृजन में अपेक्षित प्रगति दिखाई नहीं दी। वर्ष २०१४ से २०२५ के बीच नेपाल की औसत वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर लगभग ४–४.५ प्रतिशत तक सीमित रही, फिर भी प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय लगभग दोगुनी हो गई। यह स्थिति सामान्य आर्थिक संरचना से मेल नहीं खाती और नेपाल की अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति, संरचनात्मक कमजोरियों तथा भविष्य के जोखिमों पर गंभीर बहस की आवश्यकता पैदा करती है।
सामान्यतः किसी भी देश में प्रति व्यक्ति आय की वृद्धि घरेलू उत्पादन, औद्योगिकीकरण, उत्पादकता वृद्धि और रोजगार विस्तार से सीधे जुड़ी होती है। लेकिन नेपाल के मामले में यह संबंध कमजोर दिखाई देता है। यहाँ आय वृद्धि का मुख्य स्रोत विदेशों में कार्यरत नेपाली श्रमिकों द्वारा भेजी गई रेमिटेंस है। लाखों नेपाली युवा विदेशों में श्रम कर रहे हैं और उनके द्वारा भेजा गया धन देश की उपभोग क्षमता, सेवा क्षेत्र तथा विदेशी मुद्रा भंडार को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यही कारण है कि नेपाल की प्रति व्यक्ति आय डॉलर में आकर्षक दिखती है, लेकिन उसका आधार घरेलू उत्पादन नहीं बल्कि विदेशी श्रम बाजार है।
आज नेपाल की जीडीपी में रेमिटेंस का योगदान २० से ३० प्रतिशत के बीच पहुँच चुका है, जो दुनिया में सबसे ऊँचे अनुपातों में से एक है। रेमिटेंस ने परिवारों के जीवन स्तर में सुधार, गरीबी में कमी, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच बढ़ाने तथा उपभोग क्षमता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। ग्रामीण क्षेत्रों में पक्के मकान, निजी विद्यालय, मोटरसाइकिल, स्मार्टफोन और शहरी जीवनशैली के विस्तार में इसकी बड़ी भूमिका रही है। लेकिन इसी संरचना की आलोचना भी बढ़ रही है, क्योंकि यह दीर्घकालिक आर्थिक उत्पादकता का निर्माण करने में सफल नहीं हो पाई है।
नेपाल की अर्थव्यवस्था अब एक “रेमिटेंस-निर्भर उपभोग अर्थव्यवस्था” के रूप में विकसित होती दिखाई देती है। विदेश से आने वाला धन मुख्यतः उपभोग, भूमि और मकान, आयातित वस्तुओं तथा गैर-उत्पादक क्षेत्रों में खर्च हो रहा है। उत्पादनशील उद्योगों, अनुसंधान, तकनीक, कृषि आधुनिकीकरण या निर्यातोन्मुख उद्योगों में इसका उपयोग बहुत सीमित है। परिणामस्वरूप आय बढ़ने के बावजूद औद्योगिक क्षमता का विस्तार नहीं हो पाया। देश के भीतर रोजगार सृजन कमजोर रहने के कारण युवाओं का विदेश पलायन और तेज हो गया है।
इस बीच जनसंख्या संरचना में आए बदलाव ने भी प्रति व्यक्ति आय को कृत्रिम रूप से बढ़ाया है। नेपाल की जनसंख्या वृद्धि दर में उल्लेखनीय गिरावट आई है और बड़ी संख्या में युवाओं के विदेश जाने के कारण सक्रिय जनसंख्या भी कई क्षेत्रों में कम हुई है। जब कुल जनसंख्या वृद्धि दर घटती है, तो प्रति व्यक्ति आय की गणना में उपयोग होने वाला भाजक छोटा हो जाता है और औसत आय स्वतः अधिक दिखाई देती है। इससे वास्तविक आर्थिक स्थिति की तुलना में आँकड़े अधिक आकर्षक लगते हैं।
इण्डिया के साथ तुलना करने पर नेपाल की कमजोरियाँ और स्पष्ट हो जाती हैं। भारत में प्रति व्यक्ति आय की वृद्धि मुख्यतः घरेलू उत्पादन, सूचना प्रौद्योगिकी, विनिर्माण उद्योग, सेवा निर्यात और आधारभूत संरचना विकास के कारण हो रही है। वहाँ जीडीपी वृद्धि और प्रति व्यक्ति आय के बीच सीधा संबंध दिखाई देता है। भारत उत्पादन, डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्टार्टअप, ऊर्जा और औद्योगिक निर्यात में दीर्घकालिक निवेश के माध्यम से संरचनात्मक परिवर्तन कर रहा है। दूसरी ओर नेपाल अभी भी आयात-निर्भर और सेवा-केंद्रित उपभोग अर्थव्यवस्था तक सीमित है।
नेपाल का वर्तमान आर्थिक मॉडल दीर्घकालिक दृष्टि से जोखिमपूर्ण भी है। पहला, ब्रेन ड्रेन तेजी से बढ़ रहा है। कुशल मानव संसाधन के विदेश जाने से देश के भीतर नवाचार, अनुसंधान और उद्यमिता की नींव कमजोर होती जा रही है। दूसरा, रेमिटेंस पर अत्यधिक निर्भरता बाहरी जोखिमों से जुड़ी हुई है। खाड़ी देशों या अन्य श्रम बाजारों में आर्थिक मंदी, युद्ध, आव्रजन नीतियों में बदलाव या तकनीकी स्वचालन नेपाली श्रमिकों की माँग को कम कर सकते हैं। इससे नेपाल की विदेशी मुद्रा आपूर्ति और उपभोग प्रणाली पर सीधा प्रभाव पड़ेगा। तीसरा, घरेलू उत्पादन क्षमता में वृद्धि न होने के कारण व्यापार घाटा लगातार बढ़ रहा है। आयात की तुलना में निर्यात कमजोर रहने से अर्थव्यवस्था दीर्घकाल में असंतुलित होने का खतरा बढ़ रहा है।
ऐसी स्थिति में नेपाल को अपनी आर्थिक नीतियों का केंद्र बदलने की आवश्यकता है। केवल रेमिटेंस आधारित आय वृद्धि को विकास का संकेतक मानना पर्याप्त नहीं है। अब घरेलू उत्पादकता वृद्धि, औद्योगिकीकरण, कृषि आधुनिकीकरण और कौशल-आधारित मानव संसाधन निर्माण पर विशेष ध्यान देना होगा।
नेपाल के पास कृषि, जलविद्युत, पर्यटन और जैव विविधता के क्षेत्र में विशाल संभावनाएँ हैं। लेकिन ये क्षेत्र अभी तक पर्याप्त मूल्य संवर्धन से नहीं जुड़ पाए हैं। चाय, कॉफी, मसाले, जड़ी-बूटियाँ, फल और जैविक कृषि उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़कर निर्यातोन्मुख उद्योगों का विस्तार किया जा सकता है। इसी प्रकार जलविद्युत उत्पादन को केवल घरेलू उपयोग तक सीमित न रखकर क्षेत्रीय ऊर्जा व्यापार से जोड़ना आवश्यक है।
पर्यटन क्षेत्र में भी नई सोच की आवश्यकता है। पारंपरिक ट्रेकिंग और पर्वतारोहण के साथ-साथ वन्यजीव पर्यटन, स्वास्थ्य एवं वेलनेस पर्यटन, सांस्कृतिक अनुभव, शैक्षिक पर्यटन और साहसिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा सकता है। जब वैश्विक बाजार में “उच्च मूल्य पर्यटन” की अवधारणा तेजी से विकसित हो रही है, तब नेपाल को गुणवत्तापूर्ण सेवाएँ और विशिष्ट अनुभव प्रदान करने में सक्षम बनना होगा।
इसके साथ ही शिक्षा व्यवस्था को श्रम बाजार से जोड़ना भी अत्यंत आवश्यक है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली मुख्यतः प्रमाणपत्र प्रदान कर रही है, लेकिन कौशल और नवाचार विकसित नहीं कर पा रही। तकनीकी शिक्षा, अनुसंधान एवं विकास (आरएनडी), डिजिटल कौशल, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, हरित ऊर्जा और उद्यमिता को प्राथमिकता देनी होगी।
अंततः कहा जा सकता है कि नेपाल की प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि एक सकारात्मक संकेत अवश्य है, लेकिन इसे वास्तविक समृद्धि का प्रतीक मानने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। यदि आय वृद्धि मुख्यतः विदेशी श्रम बाजार और रेमिटेंस पर निर्भर बनी रहती है, तो इसे टिकाऊ विकास नहीं कहा जा सकता। दीर्घकालिक समृद्धि के लिए उत्पादनशील अर्थव्यवस्था, देश के भीतर रोजगार सृजन, औद्योगिक परिवर्तन और मानव संसाधन विकास अनिवार्य हैं। नेपाल आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है—या तो वह रेमिटेंस-निर्भर उपभोग अर्थव्यवस्था तक सीमित रहेगा, या फिर घरेलू उत्पादन और नवाचार आधारित टिकाऊ विकास का नया मार्ग अपनाएगा।

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