नई राजनीतिक चेतना की शुरुआत और पुरानी संसदीय प्रवृत्ति पतन की ओर

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देवेन्द्र किशोर ढुंगाना

नेपाल की संसदीय राजनीति में पिछले कुछ वर्षों में दिखाई देने वाला सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन नई राजनीतिक शक्तियों का उदय है। विशेष रूप से राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी (रास्वपा) के आगमन ने न केवल नेपाली राजनीति के पुराने शक्ति-संतुलन को हिला दिया है, बल्कि लंबे समय से जनता के भीतर जमा निराशा, वितृष्णा और असंतोष को भी एक वैकल्पिक दिशा देने का प्रयास किया है। इसी परिवर्तित राजनीतिक संदर्भ में संसद के भीतर वर्तमान में हो रहे प्लेकार्ड प्रदर्शन, नारेबाज़ी और सभामुख के साथ टकराव को समझना आवश्यक है।
पिछले तीन दशकों से नेपाली राजनीति मुख्यतः सत्ता साझेदारी, भागबंडा, नीतिगत अस्थिरता, संस्थागत भ्रष्टाचार और राजनीतिक संरक्षणवाद के चक्र में फँसी हुई दिखाई देती है। लोकतंत्र के नाम पर जनता के विश्वास पर बार-बार प्रहार हुआ। राज्य के संस्थान राजनीतिक प्रभाव के अखाड़े बन गए। सुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही पर बहुत भाषण हुए, लेकिन व्यवहार में जनता ने बहुत कम परिवर्तन महसूस किया। इसी पृष्ठभूमि में नई पीढ़ी की राजनीतिक चेतना ने विकल्प तलाशना शुरू किया।
रास्वपा के उदय को इसी सामाजिक-राजनीतिक असंतोष का परिणाम समझना चाहिए। यह शक्ति केवल एक राजनीतिक दल के रूप में नहीं, बल्कि पुरानी राजनीतिक संस्कृति के प्रति अस्वीकृति के प्रतीक के रूप में सामने आई है। इसलिए आज संसद में दिखाई देने वाली बहस केवल प्लेकार्ड या विरोध की शैली का विषय नहीं है, बल्कि यह पुरानी और नई राजनीतिक संस्कृति के बीच टकराव का संकेत भी है।
संसद लोकतंत्र की सर्वोच्च नीति-निर्माण संस्था है। वहाँ सरकार से प्रश्न करना, नीतियों पर बहस करना और जनता की आवाज़ को संस्थागत रूप से उठाना सांसदों का दायित्व होता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि संसद को सड़क आंदोलन का रूप दे दिया जाए। संसदीय अभ्यास की मूल आत्मा संवाद, तर्क, तथ्य और नीतिगत बहस है। जब संसद के भीतर नारेबाज़ी, वेल घेराव, प्लेकार्ड प्रदर्शन और उत्तेजनात्मक गतिविधियाँ प्राथमिक बनने लगती हैं, तब लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा कमजोर होने लगती है।
हर्कराज राई तथा श्रम संस्कृति पार्टी द्वारा उठाए गए कुछ प्रश्न सैद्धांतिक रूप से असंगत नहीं हैं। सरकार संसद के प्रति जवाबदेह होनी चाहिए, प्रधानमंत्री को प्रश्नों का उत्तर देना चाहिए और मंत्रियों की सदन में उपस्थिति सुनिश्चित होनी चाहिए—ये माँगें लोकतांत्रिक अभ्यास का ही हिस्सा हैं। लेकिन प्रश्न उठाने की शैली भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। यदि हर राजनीतिक असहमति प्रदर्शन और अवरोध के माध्यम से व्यक्त होने लगे, तो संसद नीति-निर्माण की जगह राजनीतिक स्टंट का मंच बनने का खतरा रहेगा।
यहीं पर सभामुख की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। सभामुख पर संसद की मर्यादा और सुव्यवस्था बनाए रखने की संवैधानिक जिम्मेदारी होती है। प्रतिनिधि सभा नियमावली के अनुसार अमर्यादित व्यवहार पर चेतावनी देना, बैठक से हटाना या निलंबित करना तक का अधिकार सभामुख को प्राप्त है। हालाँकि ‘अभद्र व्यवहार’ की स्पष्ट परिभाषा न होने से व्याख्या को लेकर विवाद बना रहता है। फिर भी लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा बनाए रखने के लिए सभामुख को संतुलित और दृढ़ भूमिका निभानी ही होगी।
विडंबना यह है कि आज संसद में विरोध कर रहे कई दल स्वयं अतीत में इसी प्रकार की विरोध राजनीति में शामिल रहे हैं। सत्ता और विपक्ष में रहते हुए संसदीय मर्यादा की परिभाषा बदल जाना नेपाली राजनीतिक संस्कृति की पुरानी बीमारी रही है। इसलिए वर्तमान बहस केवल हर्क सम्पाङ या श्रम संस्कृति पार्टी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे राजनीतिक वर्ग के दोहरे चरित्र पर भी प्रश्न उठाती है।
लेकिन यहाँ एक और पक्ष भी महत्वपूर्ण है। जनता ने नई राजनीतिक शक्तियों को संसद में केवल पुराने दलों के प्रति असंतोष के कारण नहीं भेजा, बल्कि वैकल्पिक राजनीतिक संस्कृति की अपेक्षा से भी भेजा है। यदि नए दल भी सस्ती लोकप्रियता, उत्तेजनात्मक प्रस्तुति और निरंतर अवरोध की राजनीति को प्राथमिकता देने लगेंगे, तो इससे उनकी विश्वसनीयता को ही नुकसान पहुँचेगा। जनता परिवर्तन के नाम पर एक और अव्यवस्थित राजनीति नहीं चाहती; वे नीतिगत सुधार, सुशासन, जवाबदेही और कार्यसंस्कृति में परिवर्तन चाहती है।
रास्वपा ने शुरू से ही स्वयं को पारंपरिक राजनीतिक विकृतियों के विरुद्ध शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया है। इसलिए संसद के भीतर उसकी भूमिका अधिक जिम्मेदार, संयमित और नीतिमुखी होने की अपेक्षा स्वाभाविक है। संसद में बहस का स्तर ऊँचा उठाना, विधेयकों पर गहन चर्चा करना, राज्य संरचना में सुधार के प्रस्ताव लाना और जनता के मुद्दों को संस्थागत रूप से उठाना ही नई राजनीतिक शक्तियों की वास्तविक परीक्षा होगी।
लोकतंत्र में विरोध आवश्यक है, लेकिन विरोध की भी मर्यादा होती है। संसद के भीतर की जाने वाली हर गतिविधि जनता को राजनीतिक संस्कृति का संदेश देती है। यदि सांसद ही लगातार अवरोध, नारेबाज़ी और उत्तेजना की राजनीति में रमने लगेंगे, तो इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का विश्वास कमजोर होगा। विशेष रूप से परिवर्तन का मुद्दा उठाकर आए दल यदि पुरानी शैली को ही दोहराने लगेंगे, तो जनता में फिर से निराशा बढ़ने का खतरा रहेगा।
आज नेपाल की राजनीति संक्रमण के एक और मोड़ पर खड़ी है। पुराने दल अपनी विश्वसनीयता खोते जा रहे हैं, जबकि नई शक्तियों को अभी पूरी तरह स्थापित होना बाकी है। ऐसे समय में यदि संसद को प्रदर्शन का मंच नहीं बल्कि राष्ट्रीय बहस और नीतिगत परिवर्तन का केंद्र बनाया जा सके, तभी लोकतंत्र के प्रति जनता का विश्वास पुनः स्थापित हो सकता है। इसी चुनौती और अवसर के बीच रास्वपाजैसी नई राजनीतिक शक्तियों की परिपक्वता आने वाली राष्ट्रीय राजनीति में निर्णायक साबित होगी।

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