ईरान-अमेरिका तनाव: होर्मुज़ की नाकाबंदी और कूटनीति के बीच फंसा पेंच

USA vs Iran

नई दिल्ली: ​ईरान और अमेरिका के बीच जारी सैन्य और कूटनीतिक संघर्ष अब एक ऐसे मोड़ पर है जहाँ एक तरफ युद्धविराम की उम्मीदें हैं, तो दूसरी तरफ एक भीषण आर्थिक और नौसैनिक युद्ध का खतरा। इस्लामाबाद में हुई वार्ताओं के विफल होने के बाद, ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बग़र ग़ालिबाफ़ ने पहली बार ईरानी टेलीविजन पर आकर देश का पक्ष विस्तार से रखा है।
​होर्मुज़ स्ट्रेट: युद्ध का नया केंद्र
​इस पूरे विवाद की धुरी होर्मुज़ स्ट्रेट है, जहाँ से दुनिया का लगभग एक-तिहाई तेल गुजरता है। अमेरिका ने ईरान पर दबाव बनाने के लिए यहाँ ‘नौसैनिक नाकाबंदी’ कर दी है। इसके जवाब में ग़ालिबाफ़ ने दो टूक कहा है कि यदि ईरान के जहाज इस रास्ते से नहीं गुजर पाएंगे, तो वह किसी भी अन्य देश के यातायात को यहाँ से गुजरने नहीं देगा। हाल ही में भारतीय झंडे वाले जहाजों पर हुई फायरिंग ने इस खतरे को और भी वास्तविक बना दिया है।
​सैन्य मोर्चे पर ‘असममित युद्ध’
​ग़ालिबाफ़ ने दावा किया कि ईरान ने पारंपरिक युद्ध के बजाय ‘आड़ा-टेढ़ा’ (Asymmetric) युद्ध लड़ा है। उनके अनुसार, ईरान ने लगभग १८० ड्रोन के जरिए अमेरिकी रक्षा प्रणालियों को चुनौती दी है। सबसे चौंकाने वाला दावा एक अमेरिकी एफ-३५ लड़ाकू विमान को लेकर है, जिसे ईरान ने अपनी तकनीकी क्षमता से आपातकालीन लैंडिंग के लिए मजबूर करने की बात कही है। हालाँकि अमेरिकी पक्ष ने इसे तकनीकी खराबी बताया है, लेकिन ईरान इसे अपनी मनोवैज्ञानिक और तकनीकी जीत के रूप में पेश कर रहा है।
​इस्लामाबाद वार्ता और ट्रंप का दावा
​पाकिस्तान के इस्लामाबाद में जेडी वेंस के नेतृत्व में हुई वार्ता बिना किसी समझौते के समाप्त हुई। इसके बावजूद, डोनाल्ड ट्रंप का हालिया बयान कि “ईरान हर बात पर सहमत हो गया है”, अंतरराष्ट्रीय हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। ट्रंप के अनुसार, ईरान अपना समृद्ध यूरेनियम सौंपने और परमाणु संवर्धन बंद करने को तैयार है। वहीं, ईरानी विदेश मंत्रालय का कहना है कि उन्होंने अभी तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया है और वे किसी भी ‘अल्टीमेटम’ के आगे नहीं झुकेंगे।
​ईरान की शर्तें और ‘प्रतिरोध की धुरी’
​ईरान की रणनीति केवल अपनी सीमाओं तक सीमित नहीं है। ग़ालिबाफ़ ने स्पष्ट किया कि लेबनान में हिज़्बुल्लाह, यमन में हूती और गज़ा में हमास (जिन्हें ईरान ‘प्रतिरोध की धुरी’ कहता है) की सुरक्षा और उनके हितों को शामिल किए बिना कोई भी समझौता स्वीकार्य नहीं होगा। उनका तर्क है कि इन समूहों ने ईरान की रक्षा के लिए युद्ध लड़ा है, इसलिए उन्हें शांति प्रक्रिया का हिस्सा होना ही चाहिए।
​भविष्य की राह: मध्यस्थता या महायुद्ध?
​वर्तमान में स्थिति यह है कि पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर तेहरान और वाशिंगटन के बीच एक ‘पुल’ का काम कर रहे हैं। १७ अप्रैल को लेबनान में घोषित युद्धविराम ने थोड़ी राहत जरूर दी है, लेकिन होर्मुज़ स्ट्रेट की नाकाबंदी और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर बना गतिरोध किसी भी समय एक बड़े क्षेत्रीय संघर्ष को जन्म दे सकता है।
​ईरान के भीतर भी राजनीतिक मतभेद गहरे हैं। कट्टरपंथी गुट अमेरिका के साथ किसी भी बातचीत को ‘आत्मसमर्पण’ मान रहे हैं, जबकि नेतृत्व इसे ‘सम्मानजनक कूटनीति’ के रूप में संतुलित करने की कोशिश कर रहा है। आने वाले कुछ दिन यह तय करेंगे कि दुनिया का यह सबसे संवेदनशील क्षेत्र शांति की ओर बढ़ेगा या एक नई वैश्विक मंदी और युद्ध की ओर।

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