नई दिल्ली: बच्चों के टीकाकरण को लेकर अक्सर अभिभावकों के बीच रहने वाले असमंजस को दूर करते हुए स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि सरकारी और निजी अस्पतालों में दी जाने वाली वैक्सीन के असर में कोई मौलिक अंतर नहीं होता है। नेशनल वैक्सीनेशन कार्यक्रम के तहत सरकारी केंद्रों पर मिलने वाले टीके और निजी क्लीनिकों में मिलने वाले टीके समान मानकों पर तैयार किए जाते हैं और दोनों ही बच्चों को संक्रामक बीमारियों से बचाने में बराबर रूप से प्रभावी और सुरक्षित हैं। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, टीकों का मुख्य कार्य शरीर के इम्यून सिस्टम को मजबूत करना है ताकि वह भविष्य में वायरस और बैक्टीरिया से लड़ सके।
सरकारी और प्राइवेट टीकों के बीच मुख्य अंतर उनकी उपलब्धता, कीमत और कवरेज का है। भारत में राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम के तहत बीसीजी, पोलियो, हेपेटाइटिस बी, रोटावायरस और खसरा-रूबेला जैसे जरूरी टीके मुफ्त में उपलब्ध कराए जाते हैं, जिनका उद्देश्य बाल मृत्यु दर को कम करना और गंभीर बीमारियों से सुरक्षा देना है। वहीं, निजी अस्पतालों में मिलने वाले कुछ टीकों के लिए शुल्क देना पड़ता है और इनमें ऐसी अतिरिक्त वैक्सीन भी शामिल हो सकती हैं जो वर्तमान में सरकारी सूची में नहीं हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि वैक्सीन लगने के बाद हल्का बुखार या इंजेक्शन की जगह पर दर्द होना सामान्य है, जिसके लिए डॉक्टर की सलाह के बिना कोई दवा नहीं देनी चाहिए। अभिभावकों को किसी भी भ्रम में न पड़कर बच्चों का समय पर टीकाकरण सुनिश्चित करना चाहिए।









