काठमांडू(नेत्र बिक्रम बिमली): प्रतिनिधिसभा की बुधवार की बैठक किसी फिल्मी ड्रामे से कम नहीं रही। कार्यसूची में लिखा था—प्रधानमंत्री वालेन्द्र शाह ‘बालेन’ सरकार की ‘नीति तथा कार्यक्रम’ पर चर्चा का प्रस्ताव पेश करेंगे। सोशल मीडिया से लेकर संसद के गलियारों तक चर्चा थी कि आज ‘बालेन’ बोलेंगे। लेकिन, जब सदन की घंटी बजी, तो प्रधानमंत्री की कुर्सी खाली थी। वह सिंहदरबार में कैबिनेट की बैठक में व्यस्त थे।
विपक्ष का प्रहार: प्रधानमंत्री कहां हैं?
सदन शुरू होते ही कांग्रेस सचेतक निश्कल राई ने मोर्चा खोल दिया। उन्होंने सभामुख डोलप्रसाद अर्याल से सीधा सवाल किया, “सदन प्रधानमंत्री को खोज रहा है, वह कहां हैं? उन्हें रुलिंग के जरिए बुलाया जाए।” कैबिनेट की बैठक खत्म हुई, लेकिन बालेन संसद नहीं पहुंचे। उनकी जगह अर्थमंत्री स्वर्णिम वाग्ले फाइल लेकर खड़े हुए, तो विपक्ष भड़क गया। एमाले सांसद गुरुप्रसाद बराल ने तंज कसते हुए पूछा, “प्रधानमंत्री को संसद आने से कौन सा बड़ा काम रोक रहा है? क्या हाउस को उनकी व्यस्तता जानने का हक नहीं है?”
संविधान की दुहाई और ‘अनुहार’ वाली बहस
बहस तब और दिलचस्प हो गई जब रास्वपा के प्रमुख सचेतक कवीन्द्र बुर्लाकोटी ने नियमावली का हवाला देकर अर्थमंत्री का बचाव किया। उन्होंने कहा, “क्या विपक्ष सिर्फ प्रधानमंत्री का चेहरा देखने के लिए अड़ा है?” इस पर माओवादी सांसद युवराज दुलाल ने कड़ा प्रतिवाद किया। उन्होंने संविधान की धारा ७६ (१०) का हवाला देते हुए कहा, “क्या नियमावली की आड़ में प्रधानमंत्री ५ साल तक चुप रहेंगे? जनता उनकी आवाज सुनना चाहती है, सिर्फ चेहरा देखना काफी नहीं है।” अपनी ही पार्टी रास्वपा की बैठक में भी गायब रहने वाले बालेन की ‘रहस्यमयी’ अनुपस्थिति ने फिलहाल नीति तथा कार्यक्रम की चर्चा को विवादों के घेरे में ला खड़ा किया है।








