वाम एकता की नई पुकार या पुरानी सत्ता की प्रतिध्वनि?

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देवेन्द्र किशोर ढुंगाना

नेपाल की राजनीति में एक बार फिर ‘वाम सहयोग’, ‘वाम एकता’ और ‘देशभक्त शक्तियों के ध्रुवीकरण’ जैसे नारे गूंजने लगे हैं। लंबे समय बाद एक ही मंच पर खड़े नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (यूएमएल) के अध्यक्ष केपी शर्मा ओली और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी केंद्र) के अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचंड’ सहित अन्य शीर्ष नेताओं ने सरकार के विरुद्ध संयुक्त प्रतिरोध और वाम सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया। लेकिन इस घोषणा ने राजनीतिक हलकों में जितनी हलचल पैदा की, उससे कहीं अधिक सवाल आम जनता के मन में खड़े कर दिए—क्या यह वास्तव में विचारों की एकता है, या फिर राजनीतिक अस्तित्व बचाने का अंतिम हथियार?
दरअसल, नेपाली कम्युनिस्ट आंदोलन का इतिहास देखें तो एकता और विभाजन कोई नई बात नहीं है। सिद्धांतों से अधिक सत्ता, विचारों से अधिक नेतृत्व और जनता से अधिक व्यक्तिगत राजनीतिक भविष्य को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति के कारण यह आंदोलन बार-बार विभाजित होता रहा है। ऐसे में आज फिर ‘एकता’ की चर्चा होना भी उसी चक्र का एक नया अध्याय भर है—ऐसी धारणा नेपाली समाज में लगातार मजबूत होती जा रही है।
इस बार की परिस्थितियां और भी रोचक हैं। यूएमएल के भीतर नेतृत्व परिवर्तन की बहस तेज होने के बीच ओली ने वाम सहयोग का कार्ड आगे बढ़ाया है। महासचिव शंकर पोखरेल से लेकर उपाध्यक्ष रघुजी पंत तक कई नेताओं ने संगठन के पुनर्गठन की आवश्यकता पर जोर दिया है। पूर्व राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी की सक्रियता, दूसरी पीढ़ी के नेताओं का दबाव और ओली के नेतृत्व पर उठ रहे सवालों के बीच आई वाम सहयोग की यह पहल कई लोगों को एक राजनीतिक रणनीति के रूप में दिखाई दे रही है।
उधर माओवादी केंद्र भी अपने राजनीतिक संकट से गुजर रहा है। हाल के चुनावों ने उसके जनाधार के सिकुड़ने का स्पष्ट संकेत दिया है। सशस्त्र संघर्ष से लेकर गणतंत्र की स्थापना तक की राजनीतिक पूंजी रखने वाला नेतृत्व आज जनता का विश्वास दोबारा जीतने के लिए संघर्ष करता दिखाई देता है। यही स्थिति यूएमएल और माओवादी केंद्र—दोनों को पुराने वाम ध्रुवीकरण की राजनीति को फिर से जीवित करने के लिए प्रेरित करती प्रतीत होती है।
लेकिन मूल प्रश्न नेतृत्व का नहीं, बल्कि जनविश्वास का है।
नेपाली जनता ने दो दशकों से अधिक समय तक कम्युनिस्ट शक्तियों को बार-बार शासन की जिम्मेदारी सौंपी। संविधान निर्माण से लेकर स्थिर सरकार की उम्मीद तक जनता ने उन्हें अभूतपूर्व जनादेश दिया। लेकिन इस अवधि में सुशासन के बजाय सत्ता संघर्ष, संस्थागत भ्रष्टाचार, राजनीतिक संरक्षणवाद, राज्य तंत्र में कार्यकर्ताओं की नियुक्ति, सार्वजनिक संपत्तियों के दुरुपयोग और विदेशी शक्ति केंद्रों के बीच संतुलन साधने वाली राजनीति अधिक देखने को मिली—ऐसी आलोचना व्यापक रूप से होती रही है।
राज्य के संवेदनशील संस्थानों में राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ाने की प्रवृत्ति, सार्वजनिक संस्थाओं को दलगत प्रभाव में लाने की कोशिश और सुशासन से जुड़ी चुनौतियों ने जनता में निराशा बढ़ाई। यही कारण है कि हाल के चुनावों में पारंपरिक दलों का मत प्रतिशत घटा है, जबकि वैकल्पिक राजनीतिक शक्तियों और निर्दलीय उम्मीदवारों ने उल्लेखनीय स्थान बनाया है। अनेक राजनीतिक विश्लेषक इसे जनता के स्पष्ट राजनीतिक संदेश के रूप में देखते हैं।
इसी पृष्ठभूमि में वर्तमान वाम एकता की बहस को भी अनेक नागरिक उत्साह से नहीं, बल्कि संदेह की दृष्टि से देख रहे हैं। क्योंकि आज जनता विचारधारा से अधिक व्यवहार, घोषणाओं से अधिक परिणाम और नारों से अधिक सुशासन चाहती है। जब तक अतीत की गलतियों पर आत्मालोचना नहीं होगी, राजनीतिक जिम्मेदारी स्वीकार नहीं की जाएगी और नया नेतृत्व तथा नई कार्यशैली प्रस्तुत नहीं होगी, तब तक केवल ‘एकता’ का नारा जनसमर्थन वापस ला सकेगा—ऐसी संभावना बहुत कम दिखाई देती है।
दूसरी ओर, पिछले कुछ वर्षों में नेपाली राजनीति में एक नई प्रवृत्ति भी स्पष्ट रूप से उभरती दिखाई दे रही है। पारंपरिक वाम-दक्षिण ध्रुवीकरण से अलग सुशासन, जवाबदेही, पारदर्शिता, आर्थिक सुधार और संस्थागत लोकतंत्र को केंद्र में रखने वाली मध्यमार्गी राजनीतिक धारा धीरे-धीरे मजबूत होती नजर आ रही है। यह धारा किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है, बल्कि स्थापित राजनीतिक संस्कृति के प्रति बढ़ते असंतोष की सामाजिक-राजनीतिक अभिव्यक्ति है।
यह विचारधारा का विरोध नहीं करती, बल्कि विचारधारा के नाम पर होने वाली सत्ता-केंद्रित राजनीति का विकल्प तलाश रही है। जनता की अपेक्षाएं अब वाम या दक्षिण की बहस से आगे बढ़कर सक्षम शासन, कानून का राज, आर्थिक अवसर और ईमानदार नेतृत्व पर केंद्रित होती दिखाई दे रही हैं।
इसीलिए वर्तमान में चर्चा में आई संभावित वाम एकता को भी कई लोग जनआकर्षण से अधिक नेतृत्व की राजनीतिक सुरक्षा, संगठनात्मक पुनर्संतुलन और आंतरिक शक्ति समीकरणों से जुड़ा प्रयास मान रहे हैं। चाहे यूएमएल के भीतर पुनर्गठन की बहस हो या माओवादी केंद्र के अस्तित्व की चुनौती—इन दोनों ने वाम एकता की आवश्यकता का एहसास कराया हो सकता है। लेकिन जनता को अब भी ऐसा कोई ठोस आधार दिखाई नहीं देता, जिससे यह विश्वास हो कि इस बार परिणाम अतीत से अलग होंगे।
नेपाल की राजनीति इस समय एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। एक ओर पुराने नेता अपना राजनीतिक प्रभाव बचाने के लिए नए समीकरण तलाश रहे हैं, तो दूसरी ओर मतदाता नई राजनीतिक संस्कृति की खोज में हैं। इसलिए आज की बहस केवल वाम एकता या सहयोग की बहस नहीं है, बल्कि यह पुरानी राजनीतिक संस्कृति और उभरती नई राजनीतिक चेतना के बीच की प्रतिस्पर्धा भी है।
अंततः इतिहास ने यही दिखाया है कि केवल सत्ता की साझेदारी से राजनीतिक पुनर्जन्म नहीं होता। जनता का विश्वास फिर से अर्जित करने के लिए आत्ममंथन, जवाबदेही, नेतृत्व में परिवर्तन और व्यवहारगत सुधार अनिवार्य हैं। अन्यथा, आज गूंज रही वाम एकता की आवाज कल नेपाली राजनीति में समय द्वारा अस्वीकार की जा चुकी एक पुरानी प्रतिध्वनि बनकर रह जाएगी। और उस स्थिति में नेपाल की राजनीति का केंद्र किसी पुराने ध्रुवीकरण पर नहीं, बल्कि जनता द्वारा खोजे जा रहे उत्तरदायी, मध्यमार्गी और परिणामोन्मुख राजनीतिक विकल्प पर टिकेगा।

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