रसुवा बाढ़ के बाद अभिभावकविहीन बच्चे : संरक्षण के साथ भविष्य सुनिश्चित करने में सरकार की भूमिका आवश्यक

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देवेन्द्र के. ढुंगाना

भद्रपुर : रसुवा में आई विनाशकारी बाढ़ ने केवल घर, संपत्ति और बुनियादी ढाँचे को ही नहीं बहाया, बल्कि कई परिवारों के आधारस्तंभों को भी छीन लिया। बाढ़ और उसके बाद आई आपदा में माता-पिता को खो चुके तथा बेसहारा हुए बच्चों का भविष्य अब गंभीर सामाजिक और राज्य के सरोकार का विषय बन गया है। वे कहाँ रहेंगे, उनकी देखभाल कौन करेगा, उन्हें शिक्षा कैसे मिलेगी और आपदा के मानसिक आघात से वे कैसे बाहर निकलेंगे—इन सवालों के जवाब खोजने में देरी करना एक और जोखिम को जन्म देना है।

इसी संवेदनशील स्थिति को ध्यान में रखते हुए बागमती प्रदेश सरकार ने अभिभावक खो चुके बच्चों को आवासीय सुविधा के साथ प्लस टू स्तर तक निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराने का नीतिगत निर्णय लिया है। प्रदेश सरकार ने अनुमान लगाया है कि आवश्यकता के अनुसार करीब एक हजार बच्चों को संरक्षण की जरूरत पड़ सकती है। उनके भोजन, आवास, शैक्षिक सामग्री और अध्ययन का खर्च राज्य द्वारा वहन करने की प्रतिबद्धता अपने आप में एक सकारात्मक पहल है।

लेकिन संरक्षण का अर्थ केवल बच्चों को किसी आवासीय विद्यालय या बालगृह में रख देना नहीं है। उनके सर्वोत्तम हित को सुनिश्चित करना इसके केंद्र में होना चाहिए। राष्ट्रीय बाल अधिकार परिषद ने भी सरकार का ध्यान इसी संवेदनशील पक्ष की ओर आकर्षित किया है। परिषद का मानना है कि बच्चों को तत्काल किसी अन्य स्थान पर स्थानांतरित करने से पहले उनके निकट संबंधियों, पारिवारिक वातावरण और स्थानीय समुदाय में ही सुरक्षित पुनर्स्थापना की संभावना तलाशनी चाहिए।

पारिवारिक पुनर्मिलन पहली प्राथमिकता

आपदा के बाद असहाय हुए बच्चों के लिए राज्य का पहला दायित्व उन्हें सुरक्षित रखना है। लेकिन सुरक्षित रखने का अर्थ उन्हें परिवार से अलग करना नहीं है। यदि बच्चों के मामा, मामी, चाचा, चाची, दादा-दादी या अन्य निकट संबंधी उन्हें सुरक्षित वातावरण प्रदान करने की स्थिति में हैं, तो ऐसे विकल्प को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

बाल अधिकारों से संबंधित कानूनी व्यवस्था भी पारिवारिक पुनर्मिलन को प्राथमिकता देती है। यदि तीन पीढ़ियों के भीतर के संबंधी संरक्षकत्व लेना चाहते हैं, तो कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से इसकी व्यवस्था की जा सकती है। हालांकि, किसी अपरिचित व्यक्ति को अपनी इच्छा से बच्चों को संरक्षण में लेने की अनुमति नहीं है। यह व्यवस्था बच्चों को आगे होने वाले जोखिम, मानव तस्करी, अवैध ओसार-पसार, हिंसा और शोषण से बचाने के लिए आवश्यक है।

इसलिए सोशल मीडिया या समाचारों के आधार पर किसी व्यक्ति द्वारा व्यक्तिगत रूप से ‘अभिभावक’ बनने की होड़ समाधान नहीं है। इसके बजाय इससे संकट में फँसे बच्चे और अधिक असुरक्षित हो सकते हैं।

प्रदेश की प्रतिबद्धता, कार्यान्वयन की चुनौती

बागमती प्रदेश में वर्तमान में सीमित संख्या में ही आवासीय विद्यालय हैं। इन विद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या पहले से ही अधिक है। ऐसे में बड़ी संख्या में नए बच्चों को तत्काल समायोजित करने के लिए बुनियादी ढाँचे, जनशक्ति और प्रबंधन क्षमता का विस्तार करना आवश्यक दिखाई देता है। प्रदेश ने कुछ मॉडल विद्यालयों को भी संभावित विकल्प के रूप में आगे बढ़ाया है।

इसके लिए नीतिगत निर्णय के साथ-साथ स्पष्ट कार्यविधि, बजट, अभिभावकत्व की कानूनी प्रक्रिया, मनोसामाजिक परामर्श, स्वास्थ्य सेवाएँ, शिक्षा और सुरक्षा प्रणाली आवश्यक होगी। बच्चों की उम्र, पारिवारिक स्थिति, मानसिक स्वास्थ्य, शिक्षा की निरंतरता और उनकी व्यक्तिगत इच्छा को भी ध्यान में रखते हुए प्रत्येक बच्चे के लिए अलग-अलग संरक्षण योजना बनाई जानी चाहिए।

राज्य का दायित्व : राहत से आगे पुनर्स्थापना

आपदा के तत्काल चरण में राहत और आश्रय महत्वपूर्ण होते हैं। लेकिन बच्चों के मामले में राहत की तुलना में दीर्घकालीन पुनर्स्थापना अधिक महत्वपूर्ण है। जिन बच्चों ने अपना घर और अभिभावक खो दिए हैं, उन्हें वर्षों तक अस्थायी संरक्षण में रखकर ही राज्य अपने दायित्व से मुक्त नहीं हो सकता।

जिन बच्चों को परिवार में रखा जा सकता है, उनके संबंधियों को आर्थिक, शैक्षिक और सामाजिक सहयोग उपलब्ध कराया जा सकता है। आवश्यकता पड़ने पर स्थानीय स्तर पर नियमित निगरानी की व्यवस्था की जा सकती है, प्रदेश सरकार शिक्षा और स्वास्थ्य की जिम्मेदारी ले सकती है तथा संघीय सरकार कानूनी और नीतिगत समन्वय कर सकती है। इस प्रकार तीनों स्तरों की सरकारों के बीच स्पष्ट जिम्मेदारी का विभाजन होना चाहिए।

मनोवैज्ञानिक पुनर्स्थापना को भी प्राथमिकता

माता-पिता को खोना अपने आप में बच्चों के जीवन में गहरा मानसिक आघात है। इसलिए उन्हें भोजन और शिक्षा उपलब्ध कराकर ही संरक्षण की जिम्मेदारी पूरी नहीं होती। नियमित मनोसामाजिक परामर्श, सुरक्षित वातावरण, आत्मीय संबंध और परिवार के साथ निरंतर संपर्क आवश्यक है।

यूनिसेफ के प्रारंभिक आकलन में बाढ़ से बड़ी संख्या में बच्चों का जीवन प्रभावित होने की बात सामने आने के संदर्भ में यह विषय और भी गंभीर हो गया है। आपदा के बाद प्रभावित होने वाली इस पीढ़ी को केवल ‘पीड़ित’ के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य का निर्माण करने वाले नागरिकों के रूप में देखना जरूरी है।

अब आगे का रास्ता

रसुवा की आपदा ने सरकार को एक महत्वपूर्ण अवसर भी दिया है—आपदा में प्रभावित बच्चों के संरक्षण के लिए दीर्घकालीन और व्यवस्थित राष्ट्रीय प्रणाली का निर्माण करने का। बागमती प्रदेश की पहल इस दिशा में एक सकारात्मक शुरुआत बन सकती है, यदि इसे कानूनी प्रक्रिया, पारिवारिक पुनर्मिलन और बाल अधिकारों के सर्वोत्तम हित से जोड़कर आगे बढ़ाया जाए।

आज राज्य को उनका हाथ थामना चाहिए, लेकिन उनका भविष्य स्वयं तय नहीं कर देना चाहिए। सुरक्षित परिवार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, मनोसामाजिक सहयोग और सम्मानजनक जीवन का अवसर उपलब्ध कराना राज्य, स्थानीय समुदाय, परिवार और सभी संबंधित पक्षों की साझा जिम्मेदारी है।

रसुवा के बाढ़ प्रभावित बच्चों का संरक्षण केवल तत्कालीन संवेदना का विषय नहीं है। यह राज्य की मानवीयता, कानूनी दायित्व और भविष्य के प्रति प्रतिबद्धता की परीक्षा भी है। इसलिए राहत के बाद पुनर्स्थापना, संरक्षण के बाद सशक्तीकरण और आश्रय के बाद आत्मनिर्भर भविष्य के निर्माण की दिशा में योजनाबद्ध कदम उठाना अब अपरिहार्य आवश्यकता है।

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