मधेश की नई बहस: ‘एक मधेश’ का सपना, ‘दो राज्य’ का प्रस्ताव और संघीय भविष्य का प्रश्न

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काठमांडू(देवेन्द्र किशोर ढुंगाना): नेपाल की समकालीन राजनीति में एक बार फिर मधेश केंद्र में आ गया है। संविधान संशोधन की बहस के साथ ही मधेश केंद्रित राजनीतिक दलों ने पूरे तराई–मधेश क्षेत्र को ‘पूर्वी मधेश’ और ‘पश्चिमी मधेश’ नामक दो प्रांतों में पुनर्संरचना करने का प्रस्ताव आगे बढ़ाया है। इसके बाद संघीयता की संरचना, राष्ट्रीय एकता, क्षेत्रीय पहचान और विकास की दिशा को लेकर गंभीर बहस शुरू हो गई है। यह केवल प्रशासनिक सीमांकन का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह मधेश की ऐतिहासिक पीड़ा, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, आत्मपहचान और राज्यसत्ता के साथ उसके संबंध की पुनर्परिभाषा का विमर्श भी है।
सन् २००७ के मधेश आंदोलन ने नेपाल को संघीयता की राह पर धकेला था। ‘एक मधेश, एक प्रदेश’ उस समय का सबसे शक्तिशाली राजनीतिक नारा बना। मधेशी समुदाय ने स्वयं को राज्य संरचना से बहिष्कृत महसूस करते हुए समान अधिकार, समावेशिता और पहचान की मांग उठाई। उस आंदोलन ने मधेश को राष्ट्रीय राजनीति में निर्णायक शक्ति बना दिया। लेकिन संविधान निर्माण के अंतिम चरण में मधेश को विभाजित कर विभिन्न प्रांतों में समेटने का निर्णय होने पर मधेशी दलों ने इसे ‘राजनीतिक अन्याय’ और ‘पहचान पर हमला’ बताते हुए विरोध किया।
आज वही बहस नए रूप में फिर सामने आई है। कुछ मधेशवादी दलों का तर्क है कि वर्तमान मधेश प्रदेश, जिसमें केवल आठ जिले शामिल हैं, पूरे मधेश का प्रतिनिधित्व नहीं करता। उनके अनुसार झापा, मोरंग, सुनसरी, चितवन, नवलपरासी, कैलाली, कंचनपुर जैसे तराई क्षेत्रों को अन्य प्रांतों में रखना मधेशी और थारू समुदाय की भावनाओं का अपमान है। इसलिए पूरे तराई भूभाग को पूर्वी और पश्चिमी मधेश के रूप में पुनः सीमांकित करने की मांग उठ रही है।
लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—क्या केवल प्रांतों की सीमाओं में बदलाव कर देने से मधेश की समस्याओं का समाधान हो जाएगा? अतीत का अनुभव इतना सरल निष्कर्ष नहीं देता। मधेश आंदोलन के बाद मधेशवादी दल कई बार सत्ता में पहुंचे, सरकार का नेतृत्व तक किया, संघीय संसद से लेकर प्रांतीय सरकारों तक प्रभावशाली उपस्थिति बनाए रखी। फिर भी मधेश में शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग, कृषि, रोजगार और आधारभूत संरचना के क्षेत्र में अपेक्षित परिवर्तन दिखाई नहीं दिया। जनता आज भी बेरोजगारी, गरीबी, भ्रष्टाचार, अव्यवस्था और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रही है।
यह स्थिति मधेशी राजनीति के एक अन्य यथार्थ को उजागर करती है—पहचान की राजनीति को विकास और सुशासन से जोड़ने में असफल रहने के कारण आंदोलन की भावनात्मक शक्ति धीरे-धीरे कमजोर होती गई। आम तौर पर यह आलोचना सुनने को मिलती है कि कई मधेशवादी नेता सत्ता साझेदारी और व्यक्तिगत राजनीतिक स्वार्थ तक सीमित हो गए। आंदोलन के मूल उद्देश्य की जगह सरकार में हिस्सेदारी, मंत्री पद और शक्ति संरक्षण प्राथमिकता बनते गए, जिससे जनता में निराशा बढ़ी।
इसी कारण आज की बहस केवल ‘एक मधेश’ या ‘दो मधेश’ तक सीमित नहीं है। यह इस बात का प्रश्न है कि अब मधेशी राजनीति किस दिशा में जाएगी। यदि संघीयता केवल राजनीतिक पदों के बंटवारे का माध्यम बनकर रह जाती है, तो केवल प्रांतों की संख्या बढ़ाने से परिवर्तन संभव नहीं होगा। लेकिन यदि संघीयता स्थानीय आवश्यकताओं, सांस्कृतिक पहचान और आर्थिक विकास का प्रभावी माध्यम बन सकती है, तो उसकी पुनर्समीक्षा आवश्यक भी हो सकती है।
रणनीतिक दृष्टि से भी मधेश अत्यंत संवेदनशील भूभाग है। नेपाल के अधिकांश व्यापारिक नाके, कृषि उत्पादन, औद्योगिक संभावनाएँ और जनसंख्या का बड़ा हिस्सा मधेश में केंद्रित है। भारत के साथ खुली सीमा होने के कारण यहाँ की राजनीतिक स्थिरता राष्ट्रीय सुरक्षा से भी प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हुई है। इसलिए मधेश के प्रश्न को केवल क्षेत्रीय राजनीति के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय रणनीतिक प्रश्न के रूप में देखा जाना चाहिए। मधेश को असंतुष्ट रखकर न तो संघीयता मजबूत हो सकती है और न ही राष्ट्रीय एकता दीर्घकालीन रूप से सुरक्षित रह सकती है।
संविधान संशोधन की बहस में एक और महत्वपूर्ण पक्ष निर्वाचन प्रणाली का है। मधेशवादी दलों ने प्रांत को निर्वाचन क्षेत्र मानते हुए पूर्ण समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली अपनाने का सुझाव दिया है। इसका उद्देश्य समावेशी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि पूर्ण समानुपातिक प्रणाली राजनीतिक अस्थिरता बढ़ा सकती है और प्रत्यक्ष जनउत्तरदायित्व को कमजोर कर सकती है। इसलिए नेपाल के सामने आज भी स्थिरता और समावेशिता के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती बनी हुई है।
आज आवश्यकता भावनात्मक नारों से अधिक व्यवहारिक राजनीतिक दृष्टिकोण की है। मधेश को विभाजित करना है या एकीकृत रखना है, इसका निर्णय केवल राजनीतिक समझौतों के आधार पर नहीं, बल्कि गहन सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक अध्ययन के आधार पर होना चाहिए। मधेश के भीतर की विविधता भी एक वास्तविकता है—मधेशी, थारू, मुस्लिम, दलित, जनजाति और पहाड़ी समुदायों के सहअस्तित्व को ध्यान में रखे बिना कोई भी सीमांकन दीर्घकालिक समाधान नहीं बन सकता।
भविष्य का मधेश कैसा होगा, यह प्रश्न अब केवल मधेशवादी दलों तक सीमित नहीं रह गया है। यह पूरे नेपाली राजनीतिक नेतृत्व के सामने खड़ा राष्ट्रीय प्रश्न बन चुका है। संघीयता को बचाना है या कमजोर करना है, पहचान को सम्मान देना है या फिर केंद्रीकरण की ओर लौटना है, इन सभी निर्णयों पर नेपाल का भविष्य निर्भर करेगा।
अंततः, मधेश का मुद्दा सीमाओं से अधिक विश्वास का मुद्दा है। यदि राज्य मधेश को समान सम्मान और अवसर देने में असफल रहता है, तो असंतोष फिर से उभर सकता है। लेकिन मधेशी नेतृत्व को भी आत्मसमीक्षा करनी होगी और आंदोलन को सत्ता प्राप्ति का साधन नहीं, बल्कि जनता के जीवन में परिवर्तन लाने का अभियान बनाना होगा। तभी ‘एक मधेश’ या ‘दो मधेश’ की बहस से ऊपर उठकर समृद्ध, समावेशी और स्थिर मधेश की रूपरेखा तैयार की जा सकती है।

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