नेत्र विक्रम विमली
भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास में साहित्य, संस्कृति और भाषाई एकता के प्रतीक के रूप में आदिकवि भानुभक्त आचार्य का नाम सबसे चमकदार सितारे की तरह लिया जाता है। विक्रम संवत १८७१ (१४ जुलाई १८१४) को जन्मे भानुभक्त का अवदान केवल किसी एक देश की भौगोलिक सीमा तक सीमित नहीं है। भारत के दार्जिलिंग, सिक्किम, असम, डूआर्स, देहरादून से लेकर दुनिया भर में फैले नेपाली भाषी समुदाय को एक सूत्र में पिरोने का ऐतिहासिक काम भानुभक्त की कृतियों ने किया है।
भानुभक्त का जन्म एक संभ्रांत और शिक्षित परिवार में हुआ था। उनके दादा श्रीकृष्ण आचार्य अपने समय के प्रकांड विद्वान थे, जिनकी देखरेख में भानुभक्त ने बचपन में ही संस्कृत व्याकरण, साहित्य और पूर्वी दर्शन का गहन अध्ययन किया।
भाषाई एकीकरण की ऐतिहासिक आवश्यकता
भानुभक्त के साहित्यिक अवदान को समझने के लिए उस दौर की सामाजिक स्थिति को देखना जरूरी है। उस समय समाज भाषाई रूप से बिखरा हुआ था। अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय बोलियों का प्रभाव था। ज्ञान, धर्म और साहित्य का एकमात्र माध्यम संस्कृत भाषा थी, जो आम जनता की पहुँच से बहुत दूर थी। ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में भानुभक्त आचार्य का उदय हुआ, जिन्होंने लोकभाषा को सम्मान दिलाया और उसे जन-जन के दिलों तक पहुँचाया।
एक साधारण ‘घासी’ से मिला जीवन का मंत्र
भानुभक्त के जीवन को साहित्य की ओर मोड़ने वाली एक बेहद प्रसिद्ध और प्रेरक घटना है, जिसे ‘घासी (घास काटने वाला) और भानुभक्त का संवाद’ कहा जाता है। युवावस्था में एक दिन भानुभक्त ने एक गरीब घासी को कड़ी मेहनत करते देखा। कौतुहलवश जब भानुभक्त ने उससे पूछा कि वह इस मेहनत की कमाई का क्या करेगा, तो घासी ने उत्तर दिया- “मैं तो गरीब हूँ, मरने के बाद साथ कुछ नहीं जाएगा। इसलिए घास बेचकर जुटाए पैसों से राहगीरों के लिए एक कुआँ खुदवाना चाहता हूँ, ताकि मेरे न रहने पर भी लोग मुझे याद रखें।”

एक साधारण और निर्धन व्यक्ति के इस परोपकारी विचार ने भानुभक्त को झकझोर दिया। उन्हें आत्मग्लानि हुई कि इतना सक्षम होने के बाद भी उन्होंने समाज के लिए कुछ नहीं किया। इसी प्रेरणा ने उनके जीवन की दिशा बदल दी और उन्होंने अपना जीवन मातृभाषा की सेवा में समर्पित करने का संकल्प लिया।
रामायण: मिट्टी की सौंध और लोक संस्कृति
भानुभक्त आचार्य ने नेपाली साहित्य के भंडार को समृद्ध करने के लिए कई महत्वपूर्ण कृतियों की रचना की, जिसमें उनकी कीर्ति का मुख्य स्तंभ ‘अध्यात्म रामायण’ का काव्यात्मक अनुवाद है। उन्होंने संस्कृत की रामायण को सात कांडों में बेहद सरल और मधुर लोक-छंदों (मुख्यतः अनुष्टुप) में रूपांतरित किया। यह केवल एक अनुवाद नहीं था, बल्कि इसमें इस क्षेत्र की मिट्टी की सौंध, यहाँ के समाज के रहन-सहन और जनजीवन की मौलिक झलक थी।
रामायण के अलावा उन्होंने पारिवारिक मर्यादा सिखाने वाली ‘वधुशिक्षा’, ईश्वर भक्ति पर आधारित ‘भक्तमाला’ और व्यावहारिक दर्शन से भरपूर ‘प्रश्नोत्तर’ जैसी कृतियों की रचना की। सरकारी दफ्तरों में होने वाली लेत-लतीफ़ी और भ्रष्टाचार पर भी उन्होंने कड़ा व्यंग्य किया, जो आज के समय में भी उतना ही प्रासंगिक है।
’आदिकवि’ की उपाधि और भारत से ऐतिहासिक नाता
भानुभक्त को ‘आदिकवि’ इसलिए कहा गया क्योंकि उन्होंने नेपाली भाषा को एक निश्चित मानक, व्याकरण सम्मत रूप और व्यापक स्वीकार्यता प्रदान की। उनके इस योगदान को इतिहास के पन्नों से निकालकर दुनिया के सामने लाने का श्रेय भारतीय भूमि और यहाँ के मनीषियों को जाता है।
१८६८ ईस्वी में भानुभक्त के निधन के बाद उनकी कृतियाँ हस्तलिखित प्रतियों तक ही सीमित थीं। लेकिन १८८४ ईस्वी के आसपास युवा कवि मोतीराम भट्ट ने इन पांडुलिपियों को इकट्ठा किया और भारत के सांस्कृतिक केंद्र बनारस (वाराणसी) से इन्हें प्रकाशित करवाकर जन-जन तक पहुँचाया।
भारत का दार्जिलिंग और सिक्किम वह ऐतिहासिक क्षेत्र है, जहाँ भानुभक्त को जाति और भाषाई गौरव के प्रतीक के रूप में स्थापित किया गया। सूर्यविक्रम ज्ञवाली, धरणीधर कोइराला और पारसमणि प्रधान (जिन्हें साहित्य में ‘सूधपा’ की त्रयी कहा जाता है) ने दार्जिलिंग में भानुभक्त के विचारों को भाषाई आंदोलन का आधार बनाया। दार्जिलिंग में भानुभक्त की भव्य प्रतिमा की स्थापना और भानु जयंती को एक उत्सव के रूप में मनाने की शुरुआत ने भारतीय नेपाली समाज को अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने की नई ऊर्जा दी।
भारतीय समाज और भानु जयंती का महत्व
आज भानुभक्त आचार्य की जयंती (१३-१४ जुलाई) केवल एक साहित्यिक आयोजन नहीं है। भारत के दार्जिलिंग, कालिम्पोंग, खरसाँग, सिक्किम, असम, डूआर्स और देहरादून में यह एक महान सांस्कृतिक उत्सव बन चुका है। दार्जिलिंग और सिक्किम में तो इस दिन आधिकारिक अवकाश रहता है और भव्य सांस्कृतिक भव्य शोभायात्राएँ निकाली जाती हैं। भारत जैसे बहुभाषी और विविधता से भरे देश में अपनी भाषा, भेष-भूषा और मौलिक पहचान को जीवित रखने तथा नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने में ‘भानु जयंती’ एक मजबूत कड़ी का काम करती है।
निष्कर्ष
आदिकवि भानुभक्त आचार्य भाषाई जागरण के दूत और सांस्कृतिक एकता के प्रणेता हैं। भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में नेपाली भाषा को शामिल कराया जाना और इस भाषाई समाज का गौरवपूर्ण अस्तित्व, कहीं न कहीं भानुभक्त की उसी साहित्यिक नींव पर टिका है जो उन्होंने दो सौ साल पहले रखी थी। बहुसांस्कृतिक भारत में अपनी मातृभाषा का सम्मान करना, उसका सही प्रयोग करना और अपनी संस्कृति को सँजोकर रखना ही इस महान विभूति के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।










