३००० सैनिकों की तैनाती का रास्ता साफ, अमेरिका को कड़ा संदेश
नई दिल्ली: भारत और रूस के बीच रणनीतिक साझेदारी अब एक नए और शक्तिशाली दौर में प्रवेश कर चुकी है। जनवरी २०२६ से प्रभावी हुए ‘रिलोस’ (RELOS) समझौते के तहत दोनों देश अब एक-दूसरे के सैन्य ठिकानों का उपयोग कर सकेंगे। इस ऐतिहासिक रक्षा सौदे के अनुसार, भारत और रूस परस्पर ३,००० सैनिक, ५ युद्धपोत और १० सैन्य विमान एक-दूसरे के क्षेत्रों में तैनात कर सकते हैं, जो हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन को पूरी तरह बदल सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ को मजबूत करता है और रूस को हिंद महासागर तक सीधी पहुंच प्रदान करता है। एयर मार्शल अनिल चोपड़ा (रिटायर्ड) के अनुसार, यह पैक्ट रूस के लिए आर्कटिक से लेकर हिंद महासागर तक के गर्म पानी के बंदरगाहों तक पहुंचने का जरिया बनेगा, वहीं भारत को आर्कटिक शिपिंग रूट और वहां मौजूद ऊर्जा संसाधनों तक सीधी पहुंच मिलेगी। यह केवल बंदरगाहों पर जहाजों के रुकने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे दोनों देशों की सेनाओं के बीच आपसी तालमेल और तकनीकी सहयोग में भी भारी वृद्धि होगी।
यह समझौता भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय सेना के लगभग ६०-७० प्रतिशत साजो-सामान रूसी मूल के हैं। रिलोस के जरिए इन उपकरणों का रखरखाव और भविष्य के साझा प्रोजेक्ट्स जैसे ब्रह्मोस, सुखोई-३० एमकेआई और एस-४०० के अपग्रेडेशन में आसानी होगी। जानकारों का कहना है कि अमेरिका द्वारा पाकिस्तान की ओर झुकाव बढ़ाने के बीच, भारत और रूस का यह सैन्य गठबंधन वाशिंगटन के लिए एक बड़ा भू-राजनीतिक संदेश है। इस समझौते से भारतीय नौसेना और वायुसेना की ऑपरेशनल पहुंच अब सुदूर आर्कटिक और प्रशांत क्षेत्रों तक विस्तारित हो जाएगी।










