नई दिल्ली: नई दिल्ली के संसद मार्ग पर स्थित ऐतिहासिक जंतर-मंतर एक बार फिर धरना-प्रदर्शनों और नागरिक आंदोलनों का प्रमुख केंद्र बन गया है। ३०० साल से भी अधिक पुराना इतिहास रखने वाला यह स्थल आज भले ही लोकतांत्रिक आवाजों का प्रतीक बन चुका है, लेकिन मूल रूप से यह भारत की महान खगोलीय और वैज्ञानिक विरासत का हिस्सा रहा है।
सन १७२४ में मुगल सम्राट मोहम्मद शाह के शासनकाल के दौरान जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने इस खगोलीय वेधशाला का निर्माण कराया था। सूर्य, चंद्रमा और ग्रहों की चाल तथा समय की सटीक गणना के लिए बनाई गई इस वेधशाला में पत्थर के १३ प्रमुख खगोलीय उपकरण स्थापित हैं। इनमें ‘सम्राट यंत्र’ (दुनिया का सबसे बड़ा घड़ी यंत्र) सबसे प्रसिद्ध है।
साल १९९३ से जंतर-मंतर दिल्ली का प्रमुख धरना स्थल बन गया। यहां २०११ में अन्ना हजारे का जनलोकपाल आंदोलन, २०१२ का निर्भया न्याय आंदोलन, २०१९-२० का सीएए-एनआरसी विरोधी प्रदर्शन और २०२३ का पहलवानों का आंदोलन जैसे बड़े लोकतांत्रिक प्रदर्शन हो चुके हैं।
वर्तमान में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा संरक्षित यह जंतर-मंतर भारत के प्राचीन ज्ञान-विज्ञान और आधुनिक लोकतंत्र के एक अनोखे मेल को दर्शाता है।










