विदेशी कर्ज के खिलाफ दावा करने वाली रास्वपा सरकार दो महीने में ही हुई कर्जदार
काठमांडू(नेत्र बिक्रम बिमली):
नेपाल सरकार द्वारा सरकारी कर्मचारियों के वेतन में २१ प्रतिशत की वृद्धि किए जाने के फैसले ने देश की अर्थव्यवस्था को गंभीर वित्तीय संकट में डाल दिया है। इस वेतन वृद्धि से सरकारी खजाने पर सालाना लगभग ४ हजार ५ सौ करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ने का अनुमान है। घरेलू राजस्व संग्रह कमजोर होने और चालू खर्चों में बेतहाशा वृद्धि के कारण सरकार को इस प्रशासनिक खर्च को संभालने के लिए एक बार फिर विदेशी ऋण और अनुदान का सहारा लेना पड़ रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक ध्यान खींचने वाली बात यह है कि चुनाव के समय विदेशी कर्ज का कड़ा विरोध करने वाली और आत्मनिर्भरता का दावा करने वाली राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (रास्वपा) के सरकार में शामिल होने के महज दो महीने के भीतर ही सरकार ने लगभग २ हजार करोड़ रुपये का विदेशी कर्ज स्वीकार कर लिया है। आर्थिक विश्लेषक इसे चुनावी वादों और सत्ता की व्यावहारिक आर्थिक मजबूरियों के बीच का बड़ा विरोधाभास मान रहे हैं।
आने वाले वित्तीय वर्ष में भी सरकार ने विभिन्न बहुपक्षीय और द्विपक्षीय एजेंसियों से कुल २ हजार ४७ करोड़ रुपये का विदेशी कर्ज और अनुदान जुटाने की तैयारी की है। बहुपक्षीय स्रोतों के तहत सबसे अधिक यानी १ हजार १६ करोड़ रुपये एशियाई विकास बैंक से मिलने की संभावना है, जबकि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से ६३० करोड़, जॉइंट पीपी से ४८४ करोड़, एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक से ४१२ करोड़, आईएफएडी से ३१३ करोड़, ओपेक से ४५ करोड़ और जीपीई से ३६ करोड़ रुपये ऋण के रूप में जुटाए जाएंगे। इसी तरह द्विपक्षीय व्यवस्था के तहत मित्र देशों से मिलने वाले अनुदान और ऋण में भारत से ४९२ करोड़, जर्मनी से ४६९ करोड़, चीन से २७६ करोड़ और फिनलैंड से १३६ करोड़ रुपये प्राप्त करने की योजना है।
आर्थिक विशेषज्ञों ने इस बात पर गहरी चिंता जताई है कि विकास परियोजनाओं और बुनियादी ढांचे में खर्च होने वाले विदेशी कर्ज का उपयोग सरकार अब कर्मचारियों के वेतन, भत्ते, पेंशन और सेवानिवृत्ति प्रबंधन जैसे प्रशासनिक खर्चों को पूरा करने के लिए कर रही है। उत्पादकता और पूंजी निर्माण बढ़ाए बिना केवल प्रशासनिक तंत्र चलाने के लिए वैश्विक कर्ज पर निर्भरता दीर्घकाल में नेपाल के लिए एक गंभीर ऋण जाल साबित हो सकती है।








