नई दिल्ली: युद्धक्षेत्र में थल सेना की रीढ़ माने जाने वाले मुख्य युद्धक टैंकों (एमबीटी) की कीमतों में हाल के वर्षों में भारी उछाल आया है। रक्षा अनुबंधों और आधुनिक तकनीक के आधार पर तैयार की गई रिपोर्ट के अनुसार, जर्मनी का लियोपार्ड २ए८ वर्तमान में दुनिया का सबसे महंगा टैंक बनकर उभरा है, जिसकी प्रति यूनिट कीमत लगभग ३१ मिलियन डॉलर (करीब २९.२ मिलियन यूरो) है। इस वैश्विक सूची में अमेरिका और पश्चिमी देशों का पूरी तरह दबदबा देखा जा सकता है, जबकि भारत या पाकिस्तान का कोई भी टैंक इसमें जगह नहीं बना पाया है।
सूची में दूसरे स्थान पर अमेरिका का शक्तिशाली एम१ए२ एसईपीवी३ अब्राम्स है, जिसकी कीमत विभिन्न विदेशी सैन्य सौदों के आधार पर २४ मिलियन से ४७ मिलियन डॉलर प्रति टैंक तक पहुंच जाती है। तीसरे स्थान पर दक्षिण कोरिया का के२ ब्लैक पैंथर है, जिसकी औसत कीमत १८.७ मिलियन डॉलर है। इसके बाद फ्रांस का एएमएक्स-५६ लेक्लेर १६ मिलियन डॉलर, तुर्की का स्वदेशी अल्ताय ११.७५ से १३.७५ मिलियन डॉलर और इटली का आरिएते सी२ एएमवी (अपग्रेड संस्करण) १०.३ मिलियन डॉलर की लागत के साथ शामिल हैं।
जापान का टाइप १० टैंक ८.५ से १०.७ मिलियन डॉलर के बीच आता है, जबकि ब्रिटेन का चैलेंजर ३ टैंक अपग्रेड लागत के हिसाब से ७.५ मिलियन डॉलर प्रति यूनिट पड़ता है। सूची के अंतिम दो स्थानों में रूस का अत्याधुनिक टी-१४ अरमाटा (५ से ९ मिलियन डॉलर) और इजरायल का प्रसिद्ध मर्कवा मार्क ४ (६ मिलियन डॉलर) शामिल हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, टैंकों की कीमतें उनके निर्माण, आधुनिक फायर कंट्रोल सिस्टम, माइन प्रोटेक्शन और संबंधित देशों के साथ हुए खरीद समझौतों की शर्तों पर निर्भर करती हैं।










