— देवेन्द्र किशोर
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा लंबे समय से चले आ रहे अमेरिका–ईरान संघर्ष को युद्धविराम के माध्यम से नियंत्रित करने की पहल के बाद वैश्विक राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। किंतु ईरान द्वारा अपने रणनीतिक रुख से पीछे हटने से इनकार किए जाने के कारण मध्यपूर्व का भू-राजनीतिक वातावरण और अधिक जटिल होता जा रहा है। युद्धविराम की घोषणा के बावजूद दोनों पक्षों के बीच अविश्वास, सैन्य तैयारियां और शक्ति प्रदर्शन जारी हैं, जिससे क्षेत्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन पर गंभीर प्रश्न खड़े होने लगे हैं।
अमेरिका और ईरान के बीच शत्रुतापूर्ण संबंध कोई नया विषय नहीं है। वर्ष १९७९ की इस्लामी क्रांति के बाद आरंभ हुई यह कटुता दशकों तक आर्थिक प्रतिबंधों, राजनीतिक दबाव, प्रॉक्सी युद्धों और सैन्य तनावों के रूप में विकसित होती रही है। हाल के घटनाक्रमों ने इस संघर्ष को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया है। विशेष रूप से इज़राइल के प्रत्यक्ष समर्थन से अमेरिका द्वारा ईरान पर दबाव बढ़ाए जाने के बाद क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों में व्यापक परिवर्तन देखने को मिला है।
डोनाल्ड ट्रम्प युद्धविराम को बनाए रखने तथा आगे की वार्ताओं के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करने का प्रयास कर रहे हैं। हालांकि यह प्रयास इतना सरल प्रतीत नहीं होता। विभिन्न विश्लेषणों के अनुसार, ईरान युद्धविराम को कमजोरी के रूप में नहीं, बल्कि पुनर्गठन, पुनर्निर्माण और रणनीतिक तैयारी के अवसर के रूप में देख रहा है। तेहरान लगातार यह संदेश देने का प्रयास कर रहा है कि वह अभी भी प्रभावी प्रतिरोध करने में सक्षम शक्ति है।
अमेरिकी दृष्टिकोण से वर्तमान परिस्थिति ट्रम्प प्रशासन के लिए राजनीतिक और रणनीतिक दोनों स्तरों पर चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। युद्ध की शुरुआत के समय अमेरिकी नेतृत्व ने जिस त्वरित सफलता की अपेक्षा की थी, वह प्राप्त नहीं हो सकी। ईरानी शासन व्यवस्था को कमजोर करने या उसे निर्णायक रूप से पराजित करने का उद्देश्य पूरा न होने के कारण व्हाइट हाउस दबाव में दिखाई दे रहा है। अमेरिकी जनमत भी लंबे समय तक चलने वाले युद्ध के पक्ष में नहीं है। आर्थिक प्रभाव, तेल बाजार में अस्थिरता तथा बढ़ते सैन्य व्यय ने अमेरिकी राजनीति के भीतर युद्ध-विरोधी भावनाओं को और मजबूत किया है।
इसी बीच, विश्व ऊर्जा सुरक्षा के केंद्र माने जाने वाले होर्मुज़ जलडमरूमध्य का प्रश्न सबसे संवेदनशील मुद्दा बन गया है। विश्व के बड़े हिस्से की तेल और गैस आपूर्ति इसी मार्ग से होती है, इसलिए इसके अवरुद्ध होने से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ा है। ऊर्जा कीमतों में वृद्धि ने उत्पादन, परिवहन और उपभोग के सभी क्षेत्रों पर दबाव बढ़ा दिया है। यद्यपि अमेरिका प्रत्यक्ष रूप से खाड़ी क्षेत्र के तेल पर निर्भर नहीं है, फिर भी वैश्विक बाजार में होने वाली मूल्यवृद्धि का असर उसकी अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है।
ईरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य को पूरी तरह खोलने से पहले आर्थिक प्रतिबंधों में राहत, जब्त की गई संपत्तियों की वापसी तथा अन्य राजनीतिक रियायतों की मांग रखी है। यही विषय वर्तमान में संभावित समझौते का केंद्र बिंदु बन गया है। अमेरिका के लिए इन मांगों को स्वीकार करना घरेलू राजनीति में आलोचना का कारण बन सकता है, जबकि इन्हें अस्वीकार करने से वार्ता विफल होने का खतरा भी बना हुआ है।
मध्यपूर्व के प्रमुख अरब राष्ट्र भी इस समय जटिल कूटनीतिक संतुलन साधने का प्रयास कर रहे हैं। तेल-संपन्न खाड़ी देशों ने लंबे समय तक अस्थिरता की कीमत चुकाई है। वे अपने आर्थिक परिवर्तन, विदेशी निवेश और विकास योजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए क्षेत्रीय स्थिरता चाहते हैं। इसी कारण कतर और पाकिस्तान जैसे देश अमेरिका और ईरान के बीच संवाद स्थापित करने तथा मध्यस्थ की भूमिका निभाने का प्रयास कर रहे हैं।
संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब ने इस संदर्भ में अलग-अलग रणनीतियां अपनाई हैं। अमीरात ने इज़राइल के साथ सुरक्षा सहयोग को और मजबूत करते हुए अपनी रक्षा क्षमताओं को बढ़ाने पर जोर दिया है। दूसरी ओर, सऊदी अरब ने अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए ईरान के साथ पूर्ण टकराव से दूरी बनाए रखने के संकेत दिए हैं। यह भिन्न दृष्टिकोण अरब जगत के भीतर किसी साझा रणनीति के अभाव को भी दर्शाता है।
राजनीतिक और रणनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो वर्तमान स्थिति केवल अमेरिका और ईरान के बीच का संघर्ष नहीं है। यह वैश्विक शक्ति संतुलन, ऊर्जा सुरक्षा, क्षेत्रीय गठबंधनों और नए कूटनीतिक समीकरणों की भी परीक्षा है। चीन और रूस जैसी शक्तियां प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इन घटनाक्रमों पर निकटता से नजर बनाए हुए हैं। पश्चिमी प्रभाव का मुकाबला करने की कोशिश कर रहे देशों के लिए ईरान का प्रतिरोध एक प्रतीकात्मक उदाहरण के रूप में भी प्रस्तुत किया जा रहा है।
आने वाले समय में तीन संभावित परिदृश्य सामने दिखाई देते हैं। पहला, युद्धविराम को स्थायी राजनीतिक समझौते में परिवर्तित करने के प्रयास सफल हो सकते हैं। दूसरा, सीमित सैन्य झड़पों के साथ तनावपूर्ण शांति की स्थिति बनी रह सकती है। तीसरा, किसी गलत आकलन या आकस्मिक घटना के कारण व्यापक सैन्य संघर्ष फिर से शुरू हो सकता है। इनमें से तीसरा विकल्प वैश्विक अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे अधिक खतरनाक सिद्ध होगा।
अंततः, ट्रम्प की युद्धविराम पहल ने कूटनीतिक संभावनाओं के नए द्वार अवश्य खोले हैं, लेकिन इसकी सफलता केवल अमेरिकी इच्छाशक्ति पर निर्भर नहीं है। ईरान की सुरक्षा चिंताओं, क्षेत्रीय शक्तियों के हितों, ऊर्जा बाजार की संवेदनशीलता और वैश्विक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के जटिल समीकरणों को संतुलित करना आवश्यक होगा। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए भले ही युद्ध रुका हुआ प्रतीत हो, किंतु वास्तविक और स्थायी शांति अभी भी दूर है। मध्यपूर्व की राजनीति एक ऐसे नए मोड़ पर खड़ी है, जहां लिया गया प्रत्येक निर्णय केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व व्यवस्था के भविष्य को भी प्रभावित कर सकता है।









