देवेन्द्र किशोर
सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जिसे प्रायः ‘चिकन नेक’ कहा जाता है, दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक मानचित्र पर एक अत्यंत संवेदनशील और रणनीतिक दृष्टि से निर्णायक भू-भाग है। लगभग 28 किलोमीटर चौड़ी यह संकरी भूमि पट्टी भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को शेष भारत से जोड़ने वाली एकमात्र स्थलीय जीवनरेखा की तरह कार्य करती है। नेपाल, भूटान और बांग्लादेश जैसे तीन महत्वपूर्ण पड़ोसी देशों की निकटता तथा चीन के रणनीतिक प्रभाव क्षेत्र से जुड़ी भू-राजनीतिक परिस्थितियाँ इसे केवल भौगोलिक ही नहीं, बल्कि सुरक्षा और कूटनीतिक दृष्टि से भी अत्यंत जटिल बनाती हैं।
हाल ही में उत्तर बंगाल विकास मंत्री निशीथ प्रमाणिक द्वारा इस कॉरिडोर की सुरक्षा संरचना को पूरी तरह पुनर्गठित करने की घोषणा के बाद यह मुद्दा फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में आ गया है। सीमापार घुसपैठ रोकने, आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने तथा पूर्वोत्तर भारत के साथ निर्बाध संपर्क बनाए रखने के उद्देश्य से की गई यह घोषणा केवल प्रशासनिक योजना नहीं, बल्कि एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश भी है। विशेष रूप से ४५ दिनों के भीतर भूमि अधिग्रहण और सीमा पर तारबंदी को तेज करने संबंधी पश्चिम बंगाल सरकार के निर्देश ने राज्य और केंद्र के बीच सुरक्षा सहयोग और प्राथमिकताओं को उजागर किया है।
चिकन नेक के ऐतिहासिक संदर्भ पर नजर डालें तो यह क्षेत्र हमेशा से रणनीतिक जोखिम का केंद्र रहा है। १९७५ में सिक्किम के भारत में विलय, नेपाल और बांग्लादेश के साथ खुली एवं संवेदनशील सीमाएँ, तथा उत्तर दिशा में भूटान की भौगोलिक स्थिति ने इस क्षेत्र को केवल त्रिकोणीय नहीं, बल्कि बहुआयामी सुरक्षा चिंताओं का केंद्र बना दिया है। यही कारण है कि यहाँ होने वाला कोई भी बुनियादी ढाँचा विकास या सुरक्षा पुनर्संरचना केवल स्थानीय मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय महत्व का विषय बन जाता है।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो चिकन नेक हमेशा विभिन्न दलों के सुरक्षा, विकास और जनसांख्यिकीय चिंतन से जुड़ा मुद्दा रहा है। वर्तमान सरकार का दृष्टिकोण इसे सीमापार घुसपैठ नियंत्रण और जनसांख्यिकीय स्थिरता से जोड़कर प्रस्तुत करता है। लेकिन इस संवेदनशील विषय को केवल राजनीतिक विमर्श तक सीमित न रखकर दीर्घकालिक विकास, सामाजिक समावेशन और क्षेत्रीय सहयोग के दृष्टिकोण से देखना अधिक आवश्यक है। क्योंकि सीमा सुरक्षा केवल तारबंदी से सुनिश्चित नहीं होती; यह आर्थिक विकास, स्थानीय विश्वास और कूटनीतिक संतुलन से भी गहराई से जुड़ी होती है।
इसी बीच विकास के दृष्टिकोण से भी नई योजनाओं की चर्चा तेज हुई है। उत्तर बंगाल को केंद्र में रखकर बुनियादी ढाँचे का विस्तार, सड़क नेटवर्क में सुधार और सीमा प्रबंधन को प्राथमिकता दिए जाने के संकेत मिल रहे हैं। यदि इन योजनाओं को पारदर्शी और प्रभावी ढंग से लागू किया गया, तो यह क्षेत्र केवल सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील भू-भाग न रहकर पूर्वोत्तर भारत के आर्थिक प्रवेशद्वार के रूप में भी उभर सकता है।
हालाँकि विकास के इस उत्साह के साथ कई चुनौतियाँ भी स्पष्ट हैं। भूमि अधिग्रहण में स्थानीय सहमति, पर्यावरणीय प्रभाव और सीमावर्ती समुदायों की जीवनशैली पर पड़ने वाले असर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। साथ ही नेपाल, भूटान और बांग्लादेश के साथ संबंधों को ध्यान में रखते हुए किसी भी भौतिक सुरक्षा संरचना के निर्माण में कूटनीतिक संवेदनशीलता बनाए रखना अत्यंत आवश्यक होगा।
समग्र रूप से देखें तो चिकन नेक केवल एक भूगोल नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय एकता, सुरक्षा नीति और क्षेत्रीय कूटनीतिक संतुलन का प्रतीक है। इसे अभेद्य बनाने का प्रयास केवल सैन्य या भौतिक संरचनाओं तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि बहुआयामी दृष्टिकोण पर आधारित होना चाहिए—जहाँ सुरक्षा, विकास और सहयोग एक साथ आगे बढ़ें। यदि सरकार की वर्तमान पहल को दीर्घकालिक योजना, पारदर्शिता और क्षेत्रीय समन्वय के साथ जोड़ा गया, तो चिकन नेक वास्तव में संकट का नहीं, बल्कि अवसर का मार्ग बन सकता है।











