कोलकाता: पश्चिम बंगाल के कोलकाता स्थित तारातला में एक निर्माणाधीन गोदाम के ढहने से हुए भीषण हादसे में टनों भारी मलबे के नीचे से जिंदा लौटे २८ वर्षीय मजदूर देबाशीष दास के लिए यह उनका दूसरा जन्म है। अस्पताल के बिस्तर पर लेटे देबाशीष जब उस खौफनाक मंजर को याद करते हैं, तो उनकी आंखें छलक आती हैं। उन्होंने बताया कि उस वक्त जिंदगी और मौत के बीच महज छह इंच का फासला रह गया था। कंक्रीट का भारी-भरकम स्लैब जब तेजी से नीचे गिरा, तब वे जमीन पर लेटे हुए थे और वह स्लैब उनके चेहरों से महज छह इंच ऊपर आकर अटक गया। इस दिल दहला देने वाले हादसे में अब तक १६ लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, लेकिन मलबे के नीचे से पांच जिंदगियों को सुरक्षित निकालना हाल के दिनों का सबसे रोमांचक और चुनौतीपूर्ण बचाव अभियान रहा है।
दुपहर करीब १२ बजे जब कंक्रीट के दो बड़े स्लैब ताश के पत्तों की तरह ढह गए, तो देबाशीष अपने चार अन्य साथियों के साथ मलबे के नीचे दफन हो गए थे। मोबाइल का कोई सिग्नल नहीं था और चारों तरफ सिर्फ दम घोंटने वाली धूल और गहरा अंधेरा था। बंद जगह होने के कारण ऑक्सीजन लगातार खत्म हो रही थी और प्यास से गला सूखा जा रहा था। ऊपर जमा अस्थिर मलबे के कभी भी कुचल देने के डर के बीच ये पांचों मजदूर कई घंटों तक चीखते-चिल्लाते रहे। दुपहर बाद जब एनडीआरएफ, दमकल विभाग और स्थानीय बचाव टीमों ने मलबे के भीतर हलचल महसूस की, तो बेहद सतर्कता के साथ राहत कार्य शुरू किया गया। जरा सी भी चूक नीचे दबे मजदूरों की जान ले सकती थी, इसलिए भारी मशीनों की जगह कटर का इस्तेमाल कर धीरे-धीरे कंक्रीट और मुड़े हुए स्टील के सरियों को काटा गया। देबाशीष ने भावुक होते हुए बताया कि जब बचावकर्मियों ने रास्ता बनाकर उन तक पानी पहुंचाया और एनडीआरएफ के जवानों को देखा, तो ऐसा लगा मानो साक्षात ईश्वर मिल गए हों।
श्यामनगर से केवल १,००० रुपये की दिहाड़ी के लालच पर यहाँ कंक्रीट डालने के काम पर आए देबाशीष ने निर्माण स्थल पर सुरक्षा व्यवस्था की गंभीर कमियों को उजागर किया है। उन्होंने बताया कि साइट पर काम करने वाले मजदूरों का कोई रिकॉर्ड या अटेंडेंस रजिस्टर ही नहीं था और सुरक्षा गार्ड सिर्फ संख्या पूछकर अंदर जाने देते थे। उनका मानना है कि निर्माण में जरूर कोई बड़ी तकनीकी खामी थी, अन्यथा पूरी इमारत इस तरह जमींदोज नहीं होती। इस हादसे ने देबाशीष को मानसिक रूप से इस कदर झकझोर दिया है कि उन्होंने अब कभी भी कंस्ट्रक्शन के काम में वापस न लौटने की कसम खाई है। हालांकि, उनकी पत्नी अन्नपूर्णा के सामने भविष्य का संकट खड़ा है, क्योंकि घर में कमाने वाले वे अकेले हैं और उनकी मां की किडनी की बीमारी के इलाज में परिवार की सारी जमा-पूंजी पहले ही खत्म हो चुकी है।
सिर, आंख और पैरों में आई चोटों के बावजूद देबाशीष खुद को भाग्यशाली मानते हैं, लेकिन उनके दिल में उन साथियों के लिए गहरा दर्द है जो अब इस दुनिया में नहीं हैं। उन्होंने कहा कि उनके दो मासूम बच्चे घर पर उनका इंतजार कर रहे थे, इसलिए वे लौट आए, लेकिन जो मारे गए उनके छोटे-छोटे बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो गया है। उन्होंने मांग की है कि उत्तरदायी लोगों को कड़ी सजा मिलने के साथ-साथ पीड़ित परिवारों को तुरंत आर्थिक मदद और सरकारी नौकरियां दी जानी चाहिए ताकि वे अपना गुजर-बसर कर सकें।











