पुराने घरों में छोटे और नीचे दरवाजे बनाने के पीछे छिपे व्यावहारिक और सांस्कृतिक रहस्य

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नई दिल्ली:आज के आधुनिक दौर में घरों के दरवाजे काफी ऊंचे और भव्य बनाए जाते हैं, ताकि बिना किसी बाधा के आवागमन हो सके। इसके विपरीत, यदि हम पुराने पारंपरिक मकानों को देखें, तो वहां के दरवाजे काफी छोटे और नीचे हुआ करते थे। इन दरवाजों की ऊंचाई इतनी कम होती थी कि किसी भी व्यक्ति को घर के भीतर कदम रखने के लिए अपनी कमर और सिर को झुकाना ही पड़ता था। पहली नजर में यह केवल एक पुरानी वास्तुकला प्रतीत हो सकती है, लेकिन पुराने समय के समाज और रहन-सहन के लिहाज से इस विशिष्ट डिजाइन के पीछे कई ठोस वैज्ञानिक, सुरक्षात्मक और सामाजिक कारण मौजूद थे।
​उस दौर में आज की तरह चौबीसों घंटे बिजली, एयर कन्डिसनर (एसी) या हीटर जैसी आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। इसलिए प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर घर को रहने योग्य बनाए रखने के लिए दरवाजों का आकार छोटा रखा जाता था। यह वास्तुकला घर के भीतर का तापमान नियंत्रित रखने में थर्मल इंसुलेटर की तरह काम करती थी। गर्मी के दिनों में छोटे दरवाजों के कारण बाहर की तपती लू और गर्म हवाएं घर के भीतर नहीं आ पाती थीं, वहीं कड़ाके की ठंड के मौसम में घर के अंदर की गर्माहट बाहर नहीं निकल पाती थी, जिससे घर का वातावरण हमेशा अनुकूल बना रहता था।
​सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी ये नीचे दरवाजे किसी अभेद्य रक्षा कवच या ढाल से कम नहीं थे। पुराने जमाने में चोरी, डकैती और बाहरी आक्रमणों का खतरा हमेशा बना रहता था। छोटे और नीचे दरवाजे की यह विशेषता थी कि उससे एक समय में केवल एक ही व्यक्ति, वह भी पूरी तरह झुककर ही भीतर प्रवेश कर सकता था। ऐसी स्थिति में यदि कोई लुटेरा या शत्रु बलपूर्वक घर में घुसने का प्रयास भी करता, तो वह अपनी पूरी शारीरिक शक्ति के साथ अचानक हमला नहीं कर पाता था, जिससे घर के भीतर मौजूद लोग सतर्क हो जाते थे और उन्हें आत्मरक्षा का पर्याप्त समय मिल जाता था।
​इस डिजाइन के पीछे एक महत्वपूर्ण संरचनात्मक और तकनीकी कारण भी था। पुराने समय में घरों के किवाड़ बेहद मजबूत और भारी-भरकम लकड़ियों से बनाए जाते थे ताकि उन्हें आसानी से तोड़ा न जा सके। हालांकि, उस समय की दीवारें सीमेंट की नहीं, बल्कि मिट्टी, चूने या पत्थरों की होती थीं। यदि दरवाजे बहुत बड़े और ऊंचे बनाए जाते, तो किवाड़ के अत्यधिक वजन के कारण दीवारें ढह सकती थीं या फिर दरवाजे की चौखट के धंसने का डर रहता था। दीवारों पर इस भारी वजन के दबाव को संतुलित करने के लिए ही दरवाजों का आकार छोटा और सीमित रखा जाता था।
​सामाजिक ताने-बाने और पारिवारिक गोपनीयता (प्राइभेसी) को बनाए रखने में भी इन दरवाजों का बड़ा योगदान था। दरवाजों का आकार छोटा होने के कारण रास्ते से गुजरने वाला कोई भी राहगीर सीधे घर के कमरों या आंगन के भीतर नहीं झांक सकता था। इससे घर की महिलाओं को बिना किसी हिचकिचाहट के अपने घरेलू काम करने की पूरी प्राइभेसी और सहजता प्राप्त होती थी।
​इन सभी व्यावहारिक और भौतिक कारणों के साथ-साथ इस वास्तुकला के पीछे एक अत्यंत सुंदर सांस्कृतिक और नैतिक सोच भी काम कर रही थी। ऐसा माना जाता था कि जब कोई व्यक्ति सिर झुकाकर किसी के घर की दहलीज पार करता है, तो वह अपने भीतर के अहंकार और घमंड को चौखट के बाहर ही छोड़ आता है। यह अनूठी परंपरा घर और उसमें रहने वाले लोगों के प्रति सम्मान, विनम्रता और आत्मीयता को प्रदर्शित करने का एक मूक जरिया थी।

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