ऋतब्रत बनर्जी बने पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता

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ममता बनर्जी का राजनीतिक करियर संकट मे

काेलकाता: ​दो दिन पहले तृणमूल कांग्रेस से निष्कासित किए गए बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता बन गए हैं। विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बसु ने बागी विधायकों की ओर से सौंपे गए समर्थन पत्र को स्वीकार करते हुए विपक्ष के नेता के लिए आवंटित कक्ष की चाबी ऋतब्रत को सौंप दी है। ऋतब्रत बनर्जी ने मीडिया से बात करते हुए दावा किया कि तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतने वाले दो-तिहाई विधायक पूरी तरह एकजुट हैं और उन्हें कुल साठ विधायकों का समर्थन प्राप्त है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका समूह १८वीं विधानसभा में एक जिम्मेदार मुख्य विपक्ष की भूमिका निभाएगा और सदन में भाजपा का मजबूती से सामना करेगा। इस बीच, ऋतब्रत ने तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी से संसदीय दल का मुख्य सलाहकार बनने और मार्गदर्शन देने की अपील भी की है। इस नए राजनीतिक समीकरण के तहत बागी गुट ने अखरूजम्माँ को विधानसभा में पार्टी का मुख्य सचेतक नियुक्त किया है, जबकि जावेद अहमद खान, सबीना यास्मीन, शिउली साहा और संदीपन साहा को उपनेता चुना गया है।
​दूसरी ओर, इस बड़े सियासी घटनाक्रम के बीच कोलकाता नगर निगम के मेयर फिरहाद हकीम ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, ममता बनर्जी के आवास पर हुई एक महत्वपूर्ण बैठक के दौरान हकीम ने इस्तीफे की मंशा जताई थी, जिसे पार्टी सुप्रीमो की सहमति के बाद सौंप दिया गया। पार्टी नेता कुणाल घोष ने इस संबंध में बताया कि राज्य सरकार द्वारा नगर निगम को व्यावहारिक रूप से निष्क्रिय बनाए जाने के कारण वरिष्ठ नेता फिरहाद हकीम ने अपनी गरिमा और प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए यह कदम उठाया है। फिलहाल ममता बनर्जी अपने आवास पर अभिषेक बनर्जी, कुणाल घोष और पूर्व मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य के साथ आगामी रणनीति को लेकर गहन मंथन कर रही हैं, क्योंकि इससे ठीक पहले उन्होंने पार्टी की सभी समितियों और संगठनों को भंग कर दिया था।
​लगातार पंद्रह वर्षों तक पश्चिम बंगाल की सत्ता में रहने के बाद हालिया विधानसभा चुनाव में मिली हार ने ममता बनर्जी के राजनीतिक करियर के सामने सबसे बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। चुनाव नतीजों के बाद से ही तृणमूल कांग्रेस में बगावत, असंतोष और इस्तीफों का दौर तेज हो गया है, जिसने राजनीतिक हलकों में यह बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या बंगाल में भी वर्ष २०२२ का महाराष्ट्र मॉडल दोहराया जाएगा और शिवसेना की तरह तृणमूल कांग्रेस भी बिखर जाएगी। सत्ता हाथ से निकलते ही पार्टी नेतृत्व और कामकाज के तरीके पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठने लगे हैं। कथित फर्जी हस्ताक्षर घोटाला और कई पुराने नेताओं की नाराजगी ने ममता बनर्जी के सिरदर्द को और बढ़ा दिया है। हाल ही में लोकसभा में पार्टी की मुख्य सचेतक के पद से हटाई गईं चार बार की सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने भी सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी जाहिर की थी। इन तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद, तृणमूल कांग्रेस के जमीनी नेताओं का मानना है कि ममता बनर्जी एक संघर्षशील नेत्री हैं और वह इस बार भी हार न मानकर पार्टी को बचाने की मजबूत रणनीति पर काम कर रही हैं।

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