दक्षिण एशिया में बढ़ता ऊर्जा जोखिम और समाधान की संभावनाएँ
देवेन्द्र के. ढुंगाना
अमेरिका द्वारा ईरान पर लगाए गए नए और कड़े प्रतिबंधों के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में पैदा हुआ जोखिम उस भारत को भी प्रभावित कर सकता है, जो फिलहाल ईरान से कच्चा तेल नहीं खरीद रहा है। पहली नजर में भारत का इस संकट से सीधा संबंध दिखाई नहीं देता, क्योंकि अमेरिकी प्रतिबंधों के जोखिम के कारण भारतीय रिफाइनरियां लंबे समय से ईरानी कच्चे तेल की खरीद से काफी हद तक दूर रही हैं। लेकिन वैश्विक तेल बाजार एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। इसलिए किसी महत्वपूर्ण तेल उत्पादक देश की आपूर्ति में कमी आने पर उसका असर दूसरे स्रोतों से तेल खरीदने वाले देशों पर भी पड़ता है। यही वजह है कि भारत के लिए यह संकट प्रत्यक्ष से अधिक अप्रत्यक्ष और दीर्घकालिक हो सकता है।
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का करीब 85 प्रतिशत आयात के जरिए पूरा करता है। ऐसी स्थिति में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। यदि ईरान के तेल निर्यात पर और अधिक रोक लगती है, तो इसका सबसे बड़ा असर चीन पर पड़ सकता है, क्योंकि चीन ईरानी कच्चे तेल का प्रमुख खरीदार है। अगर चीन को ईरान से पर्याप्त तेल नहीं मिल पाता है, तो उसे रूस, सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात और अन्य उत्पादक देशों से अधिक तेल खरीदना पड़ेगा। इससे भारत और चीन के बीच समान तेल स्रोतों के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। मांग बढ़ने पर अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में तेजी आने की संभावना होगी और इसका सीधा असर भारत के तेल आयात बिल पर पड़ेगा।
इस समस्या का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू आपूर्ति व्यवस्था है। ईरान के तेल निर्यात में बड़ी गिरावट और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास जारी अस्थिरता से वैश्विक बाजार में और अधिक अनिश्चितता पैदा हो सकती है। खाड़ी क्षेत्र से विश्व बाजार में जाने वाली बड़ी मात्रा में तेल इसी समुद्री मार्ग से जुड़ी हुई है। इसलिए यदि इस क्षेत्र में लंबे समय तक किसी तरह की बाधा या सुरक्षा संबंधी जोखिम बना रहता है, तो केवल तेल की कीमत ही नहीं, बल्कि परिवहन और बीमा लागत भी बढ़ सकती है। इसके परिणामस्वरूप भारत को समान मात्रा में तेल खरीदने के लिए पहले की तुलना में अधिक विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ सकती है।
भारत के लिए एक अन्य चुनौती रूस से बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का मौजूदा आयात है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने रूसी कच्चे तेल पर अपनी निर्भरता काफी बढ़ाई है। लेकिन यदि ईरान के खिलाफ अमेरिकी दबाव और व्यापक होता है, तो प्रतिबंधों का दायरा रूस से जुड़े कारोबार तक फैलने का जोखिम भी पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। ऐसी स्थिति में भारत को अपेक्षाकृत सस्ते रूसी तेल के विकल्प तलाशने पड़ सकते हैं। इससे ऊर्जा लागत और रणनीतिक अनिश्चितता दोनों बढ़ सकती हैं।
इस संकट का असर केवल तेल की कीमतों तक सीमित नहीं रहेगा। कच्चे तेल के महंगा होने पर पेट्रोल, डीजल, विमान ईंधन, पेट्रोकेमिकल और परिवहन लागत बढ़ सकती है। इसका प्रभाव खाद्य पदार्थों से लेकर औद्योगिक उत्पादन तक दिखाई देगा। भारत में मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ने पर केंद्रीय बैंक के लिए मौद्रिक नीति का प्रबंधन भी अधिक कठिन हो सकता है। आयात बिल बढ़ने से चालू खाते का घाटा बढ़ सकता है और अमेरिकी डॉलर की मांग बढ़ने के कारण भारतीय रुपये पर भी दबाव पड़ सकता है।
यह संकट केवल भारत तक सीमित नहीं रहेगा। दक्षिण एशिया के नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका और पाकिस्तान जैसे देश भी अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा कीमतों में वृद्धि से प्रभावित होंगे। इन देशों की ऊर्जा जरूरतें बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर हैं। भारत दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और एक महत्वपूर्ण पेट्रोलियम रिफाइनिंग तथा व्यापार केंद्र है। इसलिए भारत में ईंधन की लागत बढ़ने का प्रभाव क्षेत्रीय बाजारों पर भी पड़ सकता है। विशेष रूप से नेपाल जैसे स्थलरुद्ध देश के लिए, जो भारतीय बाजार और आपूर्ति व्यवस्था पर काफी निर्भर है, ईंधन की कीमत बढ़ने से परिवहन, उत्पादन, कृषि और दैनिक उपभोग की वस्तुओं की कीमतों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
हालांकि, इस संकट का कोई समाधान नहीं है—ऐसा नहीं है। पहला कदम भारत द्वारा कच्चे तेल के आयात स्रोतों में और अधिक विविधता लाना होना चाहिए। मध्य पूर्व, रूस, अमेरिका, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका सहित विभिन्न स्रोतों से संतुलित तरीके से तेल खरीदने पर किसी एक देश या क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता कम की जा सकती है। दूसरा, भारत को रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार की क्षमता बढ़ानी चाहिए, ताकि आपूर्ति में अचानक बाधा आने पर कुछ समय के लिए बाजार को स्थिर रखा जा सके।
दीर्घकालीन समाधान जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करना है। भारत यदि सौर और पवन ऊर्जा, जलविद्युत, इलेक्ट्रिक वाहनों तथा हरित हाइड्रोजन जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ाता है, तो अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार के झटकों से अर्थव्यवस्था को धीरे-धीरे सुरक्षित किया जा सकता है। साथ ही, दक्षिण एशियाई देशों को भी क्षेत्रीय ऊर्जा सहयोग, बिजली व्यापार और नवीकरणीय ऊर्जा के विकास को प्राथमिकता देनी होगी।
अंततः ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध भारत के लिए केवल ईरान से तेल खरीदने में असमर्थता की समस्या नहीं है; यह वैश्विक आपूर्ति और मूल्य संरचना से जुड़ा एक बड़ा आर्थिक जोखिम है। भारत भले ही ईरान से तेल नहीं खरीद रहा हो, लेकिन चीन की मांग में बदलाव, खाड़ी क्षेत्र में आपूर्ति बाधित होने, अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में वृद्धि और संभावित वित्तीय प्रतिबंधों का असर उसके तेल आयात बिल पर पड़ सकता है।
इसलिए भारत के लिए तत्काल प्राथमिकता वैकल्पिक तेल आपूर्ति सुनिश्चित करना होनी चाहिए। इसके साथ ही दीर्घकालीन रणनीति के तहत आयात स्रोतों का विविधीकरण, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का विस्तार, ऊर्जा दक्षता में सुधार और स्वच्छ ऊर्जा की ओर तेज बदलाव जरूरी है। ऐसी बहुआयामी रणनीति अपनाकर ही भारत भविष्य के ऊर्जा संकट का सामना कर सकता है और उस संकट की लहर से प्रभावित होने वाली दक्षिण एशियाई अर्थव्यवस्थाओं को भी अपेक्षाकृत सुरक्षित रख सकता है।









