नई दिल्ली(देवेंद्र के ढुंगाना): अमेरिका में जेनेटिक (वंशानुगत) श्रवण शक्ति खोने की समस्या के इलाज के लिए दुनिया की पहली जीन थेरेपी दवा ‘ओटारमेनी (Otarmeni)’ को २३ अप्रैल को नियामक मंजूरी मिल गई है। यह दवा अमेरिकी बायोफार्मास्युटिकल कंपनी रेनेरन (Regeneron) ने विकसित की है। इस सफलता को चिकित्सा विज्ञान में एक बड़ी क्रांति माना जा रहा है, क्योंकि यह पहली बार कुछ प्रकार की वंशानुगत बहरेपन को ठीक करने की संभावना को वास्तविक बनाती है।
ओटारमेनी कैसे काम करती है?
यह दवा मुख्य रूप से ओटीओएफ जीन में होने वाले परिवर्तन (म्यूटेशन) के कारण होने वाली श्रवण समस्या के इलाज के लिए उपयोग होती है। सामान्य स्थिति में यह जीन “ओटोफेरलिन” नामक प्रोटीन बनाता है, जो कान से आने वाले ध्वनि संकेतों को मस्तिष्क तक पहुंचाने में मदद करता है। लेकिन जब यह जीन खराब हो जाता है, तो कान ध्वनि को महसूस तो करता है, लेकिन संकेत मस्तिष्क तक नहीं पहुंचता, जिससे व्यक्ति सुनने में असमर्थ हो जाता है।
ओटारमेनी को कान के अंदर शल्यक्रिया के माध्यम से सीधे प्रवेश कराया जाता है। इसमें एडेनो-एसोसिएटेड वायरस (एएवि) का उपयोग करके स्वस्थ ओटीओएफ जीन को कान के अंदर पहुंचाया जाता है। वैज्ञानिक इस प्रक्रिया को “डबल एएवि तकनीक” कहते हैं, जिसमें जीन के दो हिस्सों को जोड़कर सक्रिय किया जाता है।
क्लिनिकल परीक्षणों में शामिल लगभग ८० प्रतिशत मरीजों में श्रवण क्षमता में उल्लेखनीय सुधार देखा गया है। कुछ बच्चों ने पहली बार अपनी मां की आवाज सुनी, संगीत पर प्रतिक्रिया दी और सामान्य जीवन के अनुभव प्राप्त किए।
दुनिया और भारत में श्रवण समस्या:
दुनिया भर में जन्मजात श्रवण हानि के लगभग 2–8 प्रतिशत मामले ओटीओएफ जीन से जुड़े होते हैं, जिससे लगभग २ लाख लोग प्रभावित हैं।
भारत में लगभग ६.३ करोड़ लोग श्रवण समस्या से पीड़ित हैं। यहां जन्मजात बहरेपन की दर प्रति १,००० जन्मों पर ४–६ मामलों की है, जो वैश्विक औसत से दोगुनी है। विशेषज्ञों के अनुसार भारत में ५०–६० प्रतिशत जन्मजात श्रवण हानि के मामले आनुवंशिक कारणों से होते हैं।
भारत में जीजेबि २ जीन भी बहरेपन का एक प्रमुख कारण माना जाता है। कुछ क्षेत्रों में रिश्तेदारों के बीच विवाह (कंसैंग्विनियस मैरिज) के कारण भी आनुवंशिक रोगों के मामले बढ़ते हैं।
भारत में परीक्षण और चुनौतियाँ:
भारत में अभी तक नवजात शिशुओं की श्रवण जांच को राष्ट्रीय स्तर पर अनिवार्य नहीं बनाया गया है। केवल कर्नाटक, तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे कुछ राज्यों में आंशिक कार्यक्रम चल रहे हैं। देश में यह स्क्रीनिंग कवरेज २० प्रतिशत से भी कम है, जबकि अमेरिका और यूरोप में यह ८५–९७ प्रतिशत तक है।
श्रवण जांच के लिए ओएइ (ऑटोअकूस्टिक एमिशन) और बिइआरए (ब्रेनस्टेम इवोक्ड रिस्पॉन्स ऑडियोमेट्री) जैसी तकनीकों का उपयोग किया जाता है। लेकिन वास्तविक आनुवंशिक कारण जानने के लिए जीन परीक्षण आवश्यक होता है, जिसकी लागत ८,०००से ४०,००० रुपये तक हो सकती है। यह ग्रामीण और निम्न आय वर्ग के लिए बड़ी चुनौती है।
जीन थेरेपी की संभावनाएं और भारत की स्थिति:
विशेषज्ञों के अनुसार जीन थेरेपी सभी प्रकार की श्रवण समस्याओं के लिए उपयुक्त नहीं है। यह मुख्य रूप से ओ टीओएफ जैसे कुछ विशिष्ट जीन मामलों में ही प्रभावी है। अन्य जीन संबंधी जटिलताओं पर अभी भी शोध जारी है।
भारत में जीन थेरेपी का फोकस मुख्य रूप से रक्त संबंधी रोगों—थैलेसीमिया, हीमोफीलिया और सिकल सेल एनीमिया—पर है। सिकल सेल रोग देश में एक बड़ी स्वास्थ्य समस्या है, इसलिए इस क्षेत्र में तेजी से शोध हो रहा है।
सीएमसी वेल्लोर सहित कई संस्थानों ने हाल ही में हीमोफीलिया ए के लिए सफल जीन थेरेपी परीक्षण किए हैं। वहीं सिएसआईआर -I जीआईबि ने सिकल सेल रोग के लिए ‘बिआईआरएसए -१०१’ नामक सिआरआईएसपिआर आधारित थेरेपी विकसित की है, जो अभी क्लिनिकल ट्रायल चरण में है।
निष्कर्ष:
ओटारमेनी की सफलता चिकित्सा विज्ञान में एक नए युग की शुरुआत है, जिसमें आनुवंशिक बहरेपन के इलाज की उम्मीद जगी है। लेकिन भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती अभी भी शुरुआती स्क्रीनिंग, जीन परीक्षण की पहुंच और अनुसंधान ढांचे का विकास है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत समय पर नीति, शोध और तकनीकी विकास पर ध्यान दे, तो आने वाले वर्षों में जीन थेरेपी के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धियां हासिल कर सकता है।









