पटना: प्राचीन वैदिक सभ्यता और सूर्य उपासना के प्रतीक के रूप में मनाया जाने वाला महान पर्व छठ शुरू हो चुका है। बिहार, झारखंड तथा उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों के साथ-साथ प्रवासी नेपाली भी इस पर्व को हर्षोल्लास के साथ मना रहे हैं। लगभग ३००० वर्ष पुराना इतिहास समेटे इस पर्व की प्राचीनता ऋग्वेद के सूर्य-सूक्तों और महाभारत काल में कर्ण तथा द्रौपदी द्वारा की गई सूर्य आराधना से प्रमाणित होती है।
बिना किसी लिखित पांडुलिपि या जटिल कर्मकांड के, इस अमूर्त सांस्कृतिक विरासत को जीवन्त रखने का पूरा श्रेय भोजपुरी, मैथिली और मगही बोलियों के पारंपरिक लोकगीतों को जाता है। पूजा के कड़े नियम, स्वच्छता के मानक, ‘कद्दू-भात’ से लेकर ‘उषा अर्घ्य’ तक के क्रम और इसमें प्रयुक्त होने वाली प्राकृतिक सामग्रियों का विस्तृत विवरण इन लोकगीतों ने ही पीढ़ियों तक सुरक्षित रखा है।
ऐतिहासिक तथा पौराणिक शोध के अनुसार, छठ पर्व की शुरुआत वैदिक काल (लगभग १५०० से ५०० ईसा पूर्व) से मानी जाती है। मध्यकाल तक आते-आते यह वैदिक सूर्य-उपासना बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश की क्षेत्रीय लोक परंपराओं के साथ जुड़कर व्यवस्थित रूप से स्थापित हो गई। कठिन ३६ घंटे के निर्जला व्रत के दौरान ये लोकगीत व्रतियों को मानसिक संबल और आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करते हैं।
आधुनिक तकनीक और डिजिटल क्रांति ने इस पर्व और इसके लोकसंगीत को वैश्विक मंच प्रदान किया है। विंध्यावासिनी देवी और पद्मभूषण शारदा सिन्हा जैसी प्रख्यात लोकगायिकाओं ने दशकों पहले ग्रामोफोन और रेडियो के माध्यम से जिन छठ गीतों को घर-घर पहुँचाया था, वे आज यूट्यूब, स्ट्रीमिंग ऐप्स और सोशल मीडिया के जरिए पूरी दुनिया में गूँज रहे हैं। इससे विदेशों में रहने वाली नई पीढ़ी भी अपनी जड़ों से जुड़ी हुई महसूस करती है।





