राज्य के अपनत्व और संरक्षण की परीक्षा
काठमांडू(देवेंद्र के. ढुंगाना): भोटेकोशी: त्रिशूली क्षेत्र में आई भीषण बाढ़ ने न केवल जन-धन की भारी क्षति पहुँचाई, बल्कि अनेक बच्चों से उनके अभिभावक, घर, विद्यालय और सुरक्षित वातावरण भी छीन लिया। विशेष रूप से रसुवा सहित प्रभावित जिलों में माता-पिता को खो चुके तथा अपने परिजनों से अलग हुए बच्चों की स्थिति इस समय मानवीय संवेदना से जुड़ा सबसे गंभीर प्रश्न बन गई है। प्राकृतिक आपदा के तत्काल राहत और बचाव के बाद अब सबसे बड़ी चुनौती इन बच्चों के जीवन की सुरक्षा, पालन-पोषण, शिक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और भविष्य को सुनिश्चित करना है।
राष्ट्रीय बाल अधिकार परिषद के प्रारंभिक अध्ययन के अनुसार बाढ़ में दोनों अभिभावकों को खो चुके बच्चों की संख्या १०२ तक पहुँच गई है। इसी तरह प्रभावित क्षेत्रों के लगभग ३० होल्डिंग सेंटरों में माता-पिता के साथ रह रहे बच्चों की संख्या ६९२ है, जबकि प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित बच्चों की संख्या १,२३३ बताई गई है। इनमें दिव्यांग बच्चे भी शामिल हैं। ये आँकड़े बताते हैं कि आपदा का वास्तविक प्रभाव केवल घरों के ढहने या भौतिक संरचनाओं के नष्ट होने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर बच्चों के जीवन और भविष्य पर कहीं अधिक गहरा पड़ा है।
बाढ़ के बाद होल्डिंग सेंटरों में रह रहे बच्चों में गुमसुम रहना, बातचीत करने से बचना, डरना और मानसिक रूप से कमजोर दिखाई देना जैसी समस्याएँ देखी गई हैं। अधिकारियों और बाल अधिकार के क्षेत्र में कार्यरत संस्थाओं के अनुसार अभिभावकों की मृत्यु या लापता होने से उत्पन्न पीड़ा के साथ-साथ अपने घर और समुदाय से विस्थापन, विद्यालय बंद होना तथा अपरिचित वातावरण में रहने की मजबूरी ने उनके मानसिक स्वास्थ्य पर अतिरिक्त प्रभाव डाला है। इसलिए राहत के नाम पर केवल खाद्य सामग्री और कपड़े उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। उन्हें सुरक्षित संबंध, भावनात्मक सहारा, मनोसामाजिक परामर्श और नियमित दिनचर्या की भी आवश्यकता है।
इस संदर्भ में सरकार द्वारा बच्चों के संरक्षण को राहत कार्य की एक अलग प्राथमिकता के रूप में आगे बढ़ाना सकारात्मक कदम है। विशेष रूप से बच्चों को कोई व्यक्ति मनमाने ढंग से कहीं और नहीं ले जा सके, बाल कल्याण अधिकारी तथा स्थानीय निकाय की सिफारिश के आधार पर अस्थायी संरक्षण केंद्र स्थापित करने की तैयारी और उनके दीर्घकालीन पुनर्वास के संबंध में अध्ययन की जिम्मेदारी राष्ट्रीय बाल अधिकार परिषद को सौंपना राज्य की संवेदनशील भूमिका का संकेत है।
इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि अभिभावक खो चुके बच्चों को आवासीय सुविधा के साथ उच्च माध्यमिक स्तर तक निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराने का बागमती प्रदेश सरकार का निर्णय यह दर्शाता है कि राज्य उनके भविष्य की जिम्मेदारी लेने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। हालांकि संस्थागत संरक्षण को पहला विकल्प नहीं बनाया जाना चाहिए। जहाँ तक संभव हो, निकट संबंधियों, भाई-बहनों या सुरक्षित पारिवारिक वातावरण में बच्चों का पुनर्वास करना उनके सर्वोत्तम हित में होगा। इसके लिए पारिवारिक स्थिति, सुरक्षा, आर्थिक क्षमता और स्वयं बच्चों की इच्छा का भी अध्ययन किया जाना आवश्यक है।
विद्यालयों का पुनः संचालन भी पुनर्वास का एक महत्वपूर्ण आधार है। विद्यालय बच्चों के लिए केवल शिक्षा प्राप्त करने का स्थान नहीं है, बल्कि सामान्य जीवन में लौटने का सामाजिक और मनोवैज्ञानिक आधार भी है। इसलिए अस्थायी शिक्षण केंद्रों की व्यवस्था, शैक्षिक सामग्री उपलब्ध कराना और धीरे-धीरे बच्चों को नियमित विद्यालयों में वापस लाने के कार्य को राहत कार्यक्रम का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
राज्य की वास्तविक परीक्षा केवल आपदा के समय बचाव और राहत पहुँचाने में नहीं होती; बल्कि आपदा से प्रभावित नागरिकों को फिर से सम्मानजनक जीवन में लौटाने की क्षमता में होती है। विशेष रूप से अभिभावकविहीन बच्चों के लिए राज्य को अभिभावक की भूमिका निभानी पड़ सकती है। उनके नाम पर घोषित कार्यक्रमों के कार्यान्वयन में पारदर्शिता, दीर्घकालीन बजट, नियमित निगरानी और बाल अधिकारों की सुनिश्चितता आवश्यक है।
रसुवा की बाढ़ से मिली पीड़ा को तत्काल भुलाया नहीं जा सकता। लेकिन इसी पीड़ा के बीच यदि राज्य अभिभावक खो चुके बच्चों के संरक्षण, शिक्षा और भविष्य की गारंटी लेते हुए उन्हें अपनत्व प्रदान करता है, तो यह आपदा के बाद पुनर्निर्माण का एक मानवीय उदाहरण बन सकता है। राहत आज जीवन बचाती है, लेकिन शिक्षा, संरक्षण और राज्य का निरंतर साथ उनके भविष्य का निर्माण करता है। इसलिए इन बच्चों को दया के पात्र के रूप में नहीं, बल्कि राज्य की जिम्मेदारी और अधिकारों से संपन्न नागरिक के रूप में देखना ही आज की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है।





