कानपुर: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर के शोधकर्ताओं ने नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो. डेविड बेकर की प्रयोगशाला के सहयोग से कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का उपयोग करके एक नई प्रोटीन तकनीक विकसित की है। वाशिंगटन विश्वविद्यालय के प्रो. बेकर और आईआईटी कानपुर की संयुक्त टीम ने छोटे प्रोटीन (मिनीप्रोटीन) तैयार करने की एक नई विधि खोजी है, जो दवा निर्माण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण ‘जी प्रोटीन-युग्मित रिसेप्टर्स’ (जीपीसीआर) को प्रभावी ढंग से लक्षित कर सकती है।प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका ‘नेचर’ में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार, एआई की मदद से विशिष्ट जीपीसीआर से जुड़कर उनकी कार्यप्रणाली को प्रभावित करने वाले छोटे प्रोटीन तेजी से तैयार किए जा सकते हैं। कोशिका की सतह पर मौजूद जीपीसीआर बाहरी संकेतों को कोशिका के भीतर पहुंचाने वाले ‘स्विच’ के रूप में काम करते हैं। मानव शरीर की कई जैविक प्रक्रियाओं को नियंत्रित करने के कारण अधिकांश आधुनिक दवाएं इन्हीं रिसेप्टर्स को लक्षित करके बनाई जाती हैं।आमतौर पर किसी नए रिसेप्टर को लक्षित करने वाले अणु की खोज के लिए प्रयोगशाला में लाखों रासायनिक यौगिकों का परीक्षण करना पड़ता है, जिसे काफी खर्चीला और जटिल माना जाता है। नई विधि में शोधकर्ताओं ने शुरुआत में ही एआई की सहायता से लक्षित रिसेप्टर से जुड़ने की उच्च संभावना वाले प्रोटीन कंप्यूटर पर डिजाइन किए। इसके बाद केवल उत्कृष्ट पाए गए चुनिंदा प्रोटीनों का ही प्रयोगशाला में परीक्षण किया गया। इस प्रकार कंप्यूटर आधारित डिजाइन और प्रयोगशाला परीक्षण को साथ जोड़ने से नई दवा की खोज के शुरुआती चरण में लगने वाला समय और लागत काफी कम होने की संभावना है।इस तकनीक का उपयोग करते हुए अनुसंधान दल ने कैंसर और एचआईवी जैसी जटिल बीमारियों से जुड़े ‘सीएक्ससीआर४’ और ‘सीएक्सीआर५’ रिसेप्टर्स को लक्षित करने वाले मिनीप्रोटीन तैयार कर लिए हैं। आईआईटी कानपुर ने ‘क्रायो-इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी’ (क्रायो-ईएम) तकनीक का उपयोग करके यह समझने में मुख्य भूमिका निभाई कि तैयार किया गया मिनीप्रोटीन ‘सीएक्ससीआर४’ रिसेप्टर से किस प्रकार जुड़ता है और उसकी कार्यप्रणाली को कैसे बदलता है।वर्ष २०२४ के रसायन विज्ञान के नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो. बेकर के नेतृत्व में हुए इस शोध में आईआईटी कानपुर के प्रो. अरुण के. शुक्ला सहित शोधकर्ता डॉ. रामानुज बनर्जी, मणिशंकर गांगुली, अन्नू दलाल, सुधा मिश्रा और शाची सिन्हा शामिल थे। इस अनुसंधान को भारत के अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (एएनआरएफ), जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) और लेडी टाटा मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा वित्तीय सहायता प्रदान की गई है।अध्ययन एआई आधारित प्रोटीन डिजाइन को दवा खोज के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी कदम के रूप में प्रस्तुत करता है। हालांकि, अध्ययन में तैयार किए गए ये प्रोटीन तुरंत दवा के रूप में उपयोग योग्य नहीं हैं। मानव उपचार में इनके इस्तेमाल से पहले अभी कई वर्षों तक विस्तृत परीक्षणों की आवश्यकता होगी। फिर भी, यह शोध उन रिसेप्टर्स के लिए प्रोटीन आधारित प्रभावी उपचार विकसित करने की दिशा में एक नया रास्ता खोलता है, जिन्हें पारंपरिक दवाओं से लक्षित करना कठिन माना जाता रहा है।





