संपत्ति शुद्धिकरण और संगठित अपराध के आरोप हटे, अब आगे क्या?
काठमांडू(नेत्र बिक्रम बिमली): सहकारी धोखाधड़ी मामले में पिछले कुछ समय से भारी कानूनी और राजनीतिक दबाव झेल रहे सत्तारूढ़ राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (रास्वपा) के अध्यक्ष रवि लामिछाने को कास्की जिला अदालत से बड़ी कानूनी राहत मिली है। अदालत ने शुक्रवार को लामिछाने के खिलाफ सूर्यदर्शन बचत एवं ऋण सहकारी धोखाधड़ी मामले में लगाए गए आरोपों में से सबसे गंभीर माने जाने वाले ‘संपत्ति शुद्धिकरण’ (मनी लॉन्ड्रिंग) और ‘संगठित अपराध’ के आरोपों को हटाने का आदेश दिया है।
अदालत के इस आदेश के बाद अब लामिछाने और अन्य सह-आरोपियों के खिलाफ केवल सहकारी धोखाधड़ी (को-ऑपरेटिव फ्रॉड) का मामला ही कायम रहेगा।
कास्की जिला अदालत के स्रेस्तेदार (रजिस्ट्रार) राजन खनाल के अनुसार, यह संशोधन केवल लामिछाने के लिए नहीं, बल्कि इस मामले के अन्य मुख्य आरोपियों गितेन्द्रबाबू (जीबी) राई और छविलाल जोशी के हक में भी लागू होगा। खनाल ने कहा, “जिन आरोपियों के खिलाफ संपत्ति शुद्धिकरण और संगठित अपराध से जुड़े आरोप थे, उन सभी के अभियोगों को संशोधित कर दिया गया है।”
राजनीतिक और कानूनी रूप से कितनी बड़ी राहत?
कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक, यह आदेश रवि लामिछाने के लिए राजनीतिक और कानूनी दोनों ही दृष्टिकोण से एक ‘लाइफलाइन’ साबित हो सकता है। लामिछाने के खिलाफ संपत्ति शुद्धिकरण का मामला केवल कास्की जिला अदालत में ही लंबित था, जबकि संगठित अपराध का मामला काठमांडू, रूपेन्देही और पर्सा में भी चल रहा है।
यही कारण है कि कास्की से संपत्ति शुद्धिकरण का आरोप हटना लामिछाने के लिए सबसे बड़ी राहत की बात है। इससे पहले इसी मामले के कारण संपत्ति शुद्धिकरण अधिनियम के प्रावधानों के तहत लामिछाने को प्रतिनिधि सभा (सांसद) के पद से निलंबित कर दिया गया था। सार्वजनिक पद धारण करने की उनकी योग्यता पर जब गंभीर नैतिक और कानूनी सवाल उठ रहे थे, तब अदालत के इस आदेश ने उन्हें एक मजबूत राजनीतिक ढाल प्रदान की है।
लामिछाने की ओर से पैरवी कर रहे एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा, “अदालत में संपत्ति शुद्धिकरण का मामला न रहने का सीधा मतलब यह है कि उनके सिर पर लटकी सबसे बड़ी कानूनी तलवार हट गई है। इससे उन्हें संसद और राजनीति में अपनी छवि सुधारने में बड़ी मदद मिलेगी।”
कानूनी जानकारों का मानना है कि इस आदेश के बाद अब लामिछाने की रोकी गई पैतृक संपत्ति और उनकी पत्नी निकिता पौडेल के नाम पर फ्रीज किए गए बैंक खातों व संपत्तियों को भी बहाल (डी-फ्रीज) करने का रास्ता साफ हो गया है।
सुशीला कार्की सरकार की पहल और ‘राजनीतिक’ कनेक्शन
इन आरोपों के वापस लिए जाने की पृष्ठभूमि को देखा जाए तो इसमें मौजूदा सत्ता समीकरण की परछाई साफ नजर आती है। सुशीला कार्की के नेतृत्व में नई सरकार के गठन के तुरंत बाद, महान्यायाधिवक्ता कार्यालय ने लामिछाने के खिलाफ संपत्ति शुद्धिकरण और संगठित अपराध के आरोपों को वापस लेने या संशोधित करने की आंतरिक प्रक्रिया शुरू कर दी थी।
चूंकि रास्वपा मौजूदा सत्ता गठबंधन का एक बेहद मजबूत और अहम हिस्सा है, इसलिए विपक्षी खेमे ने सरकार पर महान्यायाधिवक्ता कार्यालय के जरिए लामिछाने को ‘राहत’ देने का आरोप लगाना शुरू कर दिया है। हालांकि, तकनीकी रूप से अदालत ने सबूतों की कमी या क्षेत्राधिकार की व्याख्या करते हुए इस अभियोग को संशोधित करने का आदेश जारी किया है।
चुनौतियां अभी भी बाकी: चार जिलों के मामलों का क्या होगा?
कास्की अदालत के इस फैसले ने रवि लामिछाने को तात्कालिक रूप से बहुत बड़ी राहत जरूर दी है, लेकिन उनका कानूनी संकट अभी पूरी तरह से टला नहीं है। लामिछाने के खिलाफ वर्तमान में देश के चार अलग-अलग जिलों— कास्की, काठमांडू, रूपेन्देही और चितवन में सहकारी धोखाधड़ी और बचतकर्ताओं की रकम की हेराफेरी के मामले अभी भी विचाराधीन हैं।
कास्की में भले ही संपत्ति शुद्धिकरण का मामला हट गया हो, लेकिन काठमांडू और रूपेन्देही में उन पर संगठित अपराध का मामला अब भी बरकरार है। ऐसी स्थिति में, लामिछाने के वकील कास्की अदालत के इस आदेश को एक नजीर (नजिर) के रूप में पेश कर अन्य जिलों में भी इसी तरह की राहत पाने के लिए कानूनी दांव-पेंच शुरू करेंगे, यह तय है।
अदालत के इस फैसले से जहां रास्वपा खेमे और उनके समर्थकों में भारी उत्साह है, वहीं सहकारी पीड़ित और विपक्षी दल सरकार के दबाव में मामले को कमजोर करने का आरोप लगाते हुए असंतोष जता रहे हैं। अब देखना यह होगा कि अन्य जिला अदालतें कास्की के इस आदेश को किस रूप में लेती हैं और रवि लामिछाने का राजनीतिक भविष्य क्या करवट लेता है।









