झापा में सरकारी-सार्वजनिक जमीन अतिक्रमण: नीति, राजनीति और प्रबंधन की चुनौती

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देवेन्द्र किशोर

झापा जिले में सरकारी तथा सार्वजनिक जमीनों पर अतिक्रमण की समस्या पिछले कुछ वर्षों में गंभीर होती जा रही है। भूमि प्रशासन कार्यालय के पुराने अभिलेखों के अनुसार, वर्ष २००६ तक जिले के विभिन्न गाविस और नगरपालिकाओं में बड़ी मात्रा में सरकारी, ऐलानी तथा सार्वजनिक जमीन खाली अवस्था में मौजूद थी। लेकिन संरक्षण, निगरानी और स्पष्ट नीति के अभाव में इन जमीनों पर धीरे-धीरे अतिक्रमण बढ़ता गया। कई स्थानों पर राजनीतिक पहुँच, प्रशासनिक कमजोरी और भूमाफियाओं की मिलीभगत के कारण सार्वजनिक जमीन के निजीकरण तक के आरोप लगते रहे हैं।
कनकाई नगरपालिका, बुद्धशांति गाउँपालिका, कचनकवल गाउँपालिका, गौरिगंज, भद्रपुर, बिर्तामोड, दमक, झापा गाउँपालिका, अर्जुनधारा, मेचीनगर आदि पालिकाओं में सैकड़ों बीघा सरकारी तथा सार्वजनिक जमीन होने का उल्लेख अभिलेखों में मिलता है। इनमें से अधिकांश जमीनें नदी–नालों, खोला किनारों, वन क्षेत्रों, सड़क किनारे तथा संभावित शहरी विस्तार वाले इलाकों से जुड़ी थीं। जैसे-जैसे शहरीकरण तेज हुआ, इन क्षेत्रों की कीमत असामान्य रूप से बढ़ती गई और इसका लाभ उठाते हुए भूमाफिया, दलाल और प्रभावशाली समूह सक्रिय हो गए।
अतिक्रमण का स्वरूप भी हर जगह एक जैसा नहीं है। कहीं वास्तविक सुकुम्बासी (भूमिहीन) लोगों ने जीविकोपार्जन के लिए अस्थायी बसोबास किया है, तो कहीं करोड़ों रुपये मूल्य के पक्के भवन, व्यापारिक संरचनाएँ और प्लॉटिंग तक की गई है। नदी से निकली जमीन, पुरानी धाराओं तथा सार्वजनिक उपयोग की जमीनों पर राजनीतिक संरक्षण में निर्माण किए जाने का विषय स्थानीय स्तर से लेकर केंद्र तक चर्चा का विषय बना हुआ है। इससे यह स्पष्ट होता है कि वास्तविक भूमिहीनों और योजनाबद्ध भू-अतिक्रमण के बीच स्पष्ट भेद करना आवश्यक है।
सरकार ने हाल के समय में सार्वजनिक जमीन संरक्षण के लिए कुछ नीतिगत कदम उठाए हैं। डिजिटल नापी, अभिलेख अद्यावधिक, भू-उपयोग नीति तथा अतिक्रमण हटाने के अभियान सकारात्मक शुरुआत माने जा सकते हैं। लेकिन कार्यान्वयन पक्ष अभी भी कमजोर दिखाई देता है। स्थानीय तह, नापी कार्यालय, मालपोत, राजनीतिक नेतृत्व और सुरक्षा निकायों के बीच समन्वय की कमी के कारण प्रभावकारी नियंत्रण संभव नहीं हो पाया है। कई मामलों में प्रशासन पर यह आरोप भी लगता है कि वह केवल गरीबों की झोपड़ियों पर बुलडोजर चलाता है, जबकि प्रभावशाली व्यक्तियों की संरचनाओं को बचा लिया जाता है। इसी कारण आम जनता का राज्य व्यवस्था पर विश्वास कमजोर पड़ता जा रहा है।
वास्तविक समाधान के लिए सरकार को “एक समान मापदंड” की नीति लागू करनी होगी। सार्वजनिक जमीन पर कब्जा करने वाला व्यक्ति चाहे नेता हो, कर्मचारी, व्यापारी या आम नागरिक, सभी को कानूनी दायरे में लाया जाना चाहिए। नदी–नालों को अतिक्रमण कर बनाए गए भवनों और संरचनाओं पर निष्पक्ष कार्रवाई आवश्यक है। साथ ही वास्तविक भूमिहीन और सुकुम्बासी परिवारों की पहचान कर उन्हें व्यवस्थित आवास, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध कराई जानी चाहिए। अन्यथा “अतिक्रमण हटाओ अभियान” केवल कमजोर वर्गों के दमन के रूप में देखा जाने का खतरा बना रहेगा।
झापा का यह संदर्भ पूरे नेपाल में फैलती भूमि प्रबंधन संकट की एक प्रतिनिधि तस्वीर प्रस्तुत करता है। सार्वजनिक संपत्ति का संरक्षण केवल प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि सुशासन, राजनीतिक इच्छाशक्ति और सामाजिक न्याय से जुड़ा प्रश्न है। यदि अभी भी सरकारी तथा सार्वजनिक जमीनों के संरक्षण के लिए कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में राज्य के लिए अपनी ही संपत्ति वापस हासिल करना लगभग असंभव हो सकता है। इसलिए नीति सुधार के साथ-साथ निष्पक्ष कार्यान्वयन, पारदर्शिता और जनसहभागिता आज की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गई है।

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