सर्जिकल स्ट्राइक या संरचनात्मक सुधार?—वाग्ले के कदम का अर्थ और अपेक्षाएँ

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देवेंद्र के. ढुंगाना

भद्रपुर: नवनियुक्त वित्त मंत्री डॉ. स्वर्णिम वाग्ले ने पदभार संभालते ही जिस सक्रियता और साहस का प्रदर्शन किया है, उसने नेपाली अर्थव्यवस्था में एक नई बहस का द्वार खोल दिया है। वर्षों से नीतिगत जटिलताओं, अव्यवस्थित नियमन और कमजोर कार्यान्वयन के कारण जकड़ी हुई अर्थव्यवस्था को “सर्जिकल स्ट्राइक” शैली में सुधारने का संकेत कोई सामान्य प्रशासनिक कदम नहीं है—यह राजनीतिक इच्छाशक्ति, तकनीकी समझ और जोखिम उठाने की प्रवृत्ति का संयुक्त अभिव्यक्ति है।
पहले ही निर्णय में १५ पुराने कानूनों को समाप्त करने के अध्ययन की पहल केवल कानूनी सफाई नहीं, बल्कि एक स्पष्ट आर्थिक दर्शन की घोषणा भी है। नेपाल की अर्थव्यवस्था लंबे समय से “ओवर-रेगुलेशन” के बोझ तले दबती रही है, जहाँ निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन देने के बजाय नियंत्रण की मानसिकता हावी रही है। ऐसे में अप्रासंगिक हो चुके कानूनों को हटाने का प्रयास निवेश वातावरण को सुधारने की संभावना रखता है। लेकिन यहाँ एक सावधानी आवश्यक है—सिर्फ कानून हटाना पर्याप्त नहीं होता; उसकी जगह आधुनिक, पारदर्शी और जवाबदेह नियामक संरचना का निर्माण भी उतना ही जरूरी है। अन्यथा “डिरेगुलेशन” के नाम पर अव्यवस्था पैदा होने का खतरा बना रहता है।
राजस्व अनुसंधान विभाग जैसे निकायों की समीक्षा का संकेत भी राज्य की भूमिका को लेकर नई बहस को जन्म देता है। कर प्रशासन को प्रभावी बनाने के नाम पर अतीत में व्यवसायियों में भय का वातावरण देखा गया है। यदि वाग्ले का कदम कर प्रणाली को विश्वास-आधारित, पारदर्शी और पूर्वानुमेय दिशा में ले जाता है, तो यह दीर्घकाल में राजस्व वृद्धि और आर्थिक अनुशासन दोनों को मजबूत कर सकता है। हालांकि, इसके साथ कर चोरी नियंत्रण कमजोर पड़ने का जोखिम भी जुड़ा हुआ है, जिसे संतुलित नीति के माध्यम से संभालना होगा।
दूसरी महत्वपूर्ण पहल—आर्थिक श्वेतपत्र—वास्तविकता से सामना करने का प्रयास है। अतीत में सरकारों पर अर्थव्यवस्था की स्थिति को आंशिक या राजनीतिक रूप से सजाकर प्रस्तुत करने के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे में तथ्य-आधारित, स्पष्ट और निष्पक्ष श्वेतपत्र नीति-निर्माण की नींव को मजबूत कर सकता है। यह न केवल जनता में विश्वास बहाल करेगा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को भी यह संदेश देगा कि नेपाल अपनी आर्थिक वास्तविकता के प्रति ईमानदार है। हालांकि, श्वेतपत्र केवल समस्याओं की सूची तक सीमित नहीं रहना चाहिए; इसमें समाधान का स्पष्ट रोडमैप भी होना आवश्यक है, अन्यथा यह औपचारिक दस्तावेज बनकर रह जाएगा।
तीसरी पहल, चुनावी घोषणापत्र को सरकारी कार्ययोजना में रूपांतरित करना, राजनीतिक जवाबदेही का सकारात्मक संकेत है। जहाँ अक्सर चुनावी वादे केवल घोषणाओं तक सीमित रह जाते हैं, वहाँ उन्हें संस्थागत प्रक्रिया में शामिल करना लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन यहाँ भी चुनौती कम नहीं है—लोकप्रियता के लिए किए गए वादों और आर्थिक यथार्थ के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं होता। यदि घोषणापत्र का कार्यान्वयन आर्थिक अनुशासन के विरुद्ध गया, तो यह दीर्घकालिक स्थिरता को प्रभावित कर सकता है।
वाग्ले का यह कथन—“बैंकों में पैसा जमा है, लेकिन बाजार में उत्साह नहीं”—वर्तमान आर्थिक समस्या के मूल कारण की ओर संकेत करता है। तरलता की कमी नहीं है, लेकिन निवेश का माहौल कमजोर है, उपभोग घटा है और विश्वास का संकट गहरा गया है—यह आज की वास्तविकता है। ऐसे में केवल नीतिगत सुधार पर्याप्त नहीं होंगे; विश्वास की पुनर्स्थापना के लिए ठोस परिणाम दिखाने होंगे। बड़े परियोजनाओं को आगे बढ़ाना, निजी क्षेत्र को सुरक्षा देना और नीतिगत स्थिरता सुनिश्चित करना ही इस विश्वास को वापस ला सकता है।
प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह के नेतृत्व और वाग्ले की तकनीकी दक्षता के बीच तालमेल ने शुरुआती तौर पर सकारात्मक संकेत दिए हैं। लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि नेपाल में सुधार के कई प्रयास घोषणाओं तक ही सीमित रह गए और उनका प्रभावी कार्यान्वयन नहीं हो सका। इसलिए इस “उत्साहजनक शुरुआत” को वास्तविक परिणामों में बदलना ही सबसे बड़ी परीक्षा होगी।
अंततः, वाग्ले की “सर्जिकल स्ट्राइक” शैली प्रणालीगत सुधार का मार्ग खोल सकती है, लेकिन इसकी सफलता दो प्रमुख बातों पर निर्भर करेगी—संतुलित कार्यान्वयन और निरंतरता। सुधार के नाम पर जल्दबाजी अस्थिरता ला सकती है, जबकि धीमापन अवसरों को नष्ट कर सकता है। इसलिए आवश्यक है—दूरदर्शी योजना, संस्थागत मजबूती और पारदर्शी कार्यशैली।
नेपाल की अर्थव्यवस्था इस समय एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है, जहाँ साहसिक निर्णयों की आवश्यकता है। वाग्ले के कदम ने उस साहस का परिचय दिया है। अब सवाल यह है—क्या यह साहस स्थायी संरचनात्मक परिवर्तन में बदलेगा, या फिर एक बार फिर उम्मीद और वास्तविकता के बीच की दूरी बढ़ाने वाली कहानी बनेगा? इसका उत्तर आने वाले समय में स्पष्ट होगा।

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