हर्क साम्पांग प्रवृत्ति, संसदीय मर्यादा और नई राजनीतिक शक्तियों की चुनौती
देवेन्द्र किशोर ढुंगाना
नेपाल की संघीय संसद इस समय केवल नीति निर्माण का मंच नहीं रह गई है, बल्कि जनआक्रोश, राजनीतिक असंतोष और व्यक्तिवादी शैली के सार्वजनिक प्रदर्शन का स्थल भी बनती जा रही है। प्रतिनिधि सभा में श्रम संस्कृति पार्टी के सांसदों और सभामुख के बीच हाल में दिखाई दिया टकराव इसी वास्तविकता को फिर उजागर करता है। विशेष रूप से पार्टी अध्यक्ष हर्क साम्पांग की शैली, अभिव्यक्ति और संसदीय व्यवहार ने वर्तमान राजनीतिक बहस को और तीव्र बना दिया है। सवाल केवल एक सांसद के व्यवहार का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति दृष्टिकोण, संसदीय संस्कार और नई राजनीतिक शक्तियों की जिम्मेदारी का भी है।
सभामुख द्वारा प्रतिनिधि सभा नियमावली २०७९ के नियम २० (झ) और २१ (क) का उल्लेख करते हुए सांसदों को चेतावनी देना केवल एक सामान्य प्रक्रियागत घटना नहीं है। यह संसद संस्था पर हो रही चुनौती के प्रति औपचारिक प्रतिक्रिया भी है। नियम ३० के अनुसार चेतावनी, नियम ३१ के अनुसार सदन से निष्कासन और नियम ३२ के अनुसार निलंबन तक की व्यवस्था मौजूद है। इस संदर्भ में यदि हर्क साम्पांग और उनके सहयोगी लगातार अवरोध, प्लेकार्ड प्रदर्शन और सभामुख के आदेश की अवहेलना जारी रखते हैं, तो उनके खिलाफ कार्रवाई की स्थिति बन सकती है।
लेकिन इस घटना का गहरा राजनीतिक अर्थ केवल नियम उल्लंघन तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में “हर्क साम्पांग शैली” की राजनीति है, ऐसी राजनीति जो स्वयं को “जनता की असली आवाज” के रूप में प्रस्तुत करना चाहती है, लेकिन व्यवहार में संस्थागत प्रक्रियाओं को कमजोर करने का जोखिम भी उठाती है।
हर्क साम्पांग नेपाली राजनीति में पारंपरिक दलों के प्रति बढ़ती निराशा की पृष्ठभूमि से उभरे नेता हैं। धरान की स्थानीय राजनीति से चर्चित हुए वे जनता के बीच “सिस्टम के खिलाफ बोलने वाले नेता” के रूप में स्थापित हुए। उनकी भाषा आक्रामक है, प्रस्तुति असंयमित दिखाई देती है और राजनीतिक अभिव्यक्ति भावनात्मक उत्तेजना से भरी रहती है। यही शैली उन्हें लोकप्रिय भी बनाती है। लेकिन संसद सड़क नहीं होती। संसद केवल आक्रोश व्यक्त करने का मंच नहीं, बल्कि तर्क, प्रक्रिया और संयम का संस्थागत केंद्र होती है। इसी सीमा को न समझ पाने से वर्तमान विवाद उत्पन्न हुआ है।
संसद में प्रश्न उठाना सांसद का अधिकार है। सरकार को जवाबदेह बनाना लोकतंत्र की मूल आवश्यकता है। लेकिन संसदीय नियमों और प्रक्रियाओं को अस्वीकार कर लगातार अवरोध पैदा करना लोकतांत्रिक प्रतिरोध नहीं, बल्कि संस्थागत असहिष्णुता है। प्रधानमंत्री के जवाब दिए बिना विरोध जारी रखने की हर्क साम्पांग की चेतावनी राजनीतिक रूप से आकर्षक लग सकती है, लेकिन व्यवहार में यह संसद को संवाद के मंच से टकराव के रंगमंच में बदलने का खतरा बढ़ाती है।
यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है, क्या हर्क साम्पांग वास्तव में जनता की आवाज उठा रहे हैं, या वे लगातार चर्चा में बने रहने वाले राजनीतिक पात्र बनते जा रहे हैं? हाल की घटनाओं को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि वे संस्थाओं को सुधारने से अधिक, उनसे टकराकर स्वयं को “विद्रोही नेता” के रूप में प्रस्तुत करने में रुचि रखते हैं। संसद में बार-बार नियम तोड़ना, सभामुख के निर्देशों को चुनौती देना और प्रक्रियाओं की उपेक्षा करना लोकतांत्रिक अभ्यास नहीं है। यह अंततः अराजकता को वैध ठहराने की मानसिकता को जन्म देता है।
राजनीति में विद्रोह आवश्यक हो सकता है, लेकिन विद्रोह की भी संवैधानिक और वैधानिक सीमाएँ होती हैं। लोकतंत्र संस्थाओं के भीतर रहकर सुधार की व्यवस्था है, संस्थाओं को निष्प्रभावी बनाने का खेल नहीं। संसद को पंगु बनाकर जनता की समस्याओं का समाधान नहीं किया जा सकता। उल्टा, संसद कमजोर होने पर लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति जनविश्वास भी कम होने लगता है। इसलिए सभामुख की चेतावनी को केवल प्रक्रियागत कदम नहीं, बल्कि संसदीय मर्यादा की रक्षा का प्रयास समझना चाहिए।
हर्क साम्पांग की राजनीति का एक और विरोधाभास भी सामने आता है। वे स्वयं को “पुराने दलों के विकल्प” के रूप में प्रस्तुत करते हैं, लेकिन व्यवहार में वही पुरानी राजनीतिक शैली दोहराते दिखाई देते हैं। अराजक नारेबाजी, संस्थाओं पर अविश्वास और भावनात्मक उत्तेजना नेपाली राजनीति में नई बात नहीं है। अतीत में भी ऐसी शैलियों को अल्पकालिक लोकप्रियता मिली, लेकिन वे दीर्घकालिक राजनीतिक विश्वास अर्जित नहीं कर सकीं। जनता अब केवल ऊँची आवाज नहीं, बल्कि परिणाम चाहती है।
इसी संदर्भ में राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी (रास्वपा) के उदय को अलग उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है। रास्वपा भी पुराने दलों के प्रति असंतोष की पृष्ठभूमि से उभरी, लेकिन उसने शुरुआत से ही संस्थागत राजनीति, वैकल्पिक नीतिगत बहस और प्रशासनिक सुधार की भाषा विकसित करने की कोशिश की। यद्यपि रास्वपा भी आलोचनाओं से मुक्त नहीं है, फिर भी उसके उदय ने यह स्पष्ट संकेत दिया कि नेपाली मतदाता अब केवल नारों की राजनीति नहीं, बल्कि परिणाममुखी विकल्प खोज रहे हैं।
रास्वपा की लोकप्रियता का एक कारण यह भी है कि उसने “पुराने दलों के खिलाफ आक्रोश” को “संस्थागत सुधार” से जोड़ने की कोशिश की। जबकि हर्क साम्पांग शैली की राजनीति अधिकतर व्यक्तिवादी और प्रतिक्रियात्मक दिखाई देती है। व्यक्तिवादी राजनीति क्षणिक रूप से चमक सकती है, लेकिन दीर्घकालिक राष्ट्रीय नेतृत्व का आधार बनना उसके लिए कठिन होता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब व्यक्ति संस्थाओं से बड़ा बनने की कोशिश करता है, तो अंततः पूरी व्यवस्था अस्थिर होने लगती है।
समकालीन नेपाली राजनीति में इस समय तीन स्पष्ट धाराएँ दिखाई देती हैं। पहली- पारंपरिक दलों की घटती नैतिक विश्वसनीयता। दूसरी- नई राजनीतिक शक्तियों के प्रति जनता की उम्मीद। और तीसरी- वैकल्पिक राजनीति के नाम पर बढ़ती उत्तेजनात्मक प्रवृत्ति। यही तीसरी प्रवृत्ति सबसे अधिक खतरनाक साबित हो सकती है, क्योंकि यह जनअसंतोष को संस्थागत सुधार की दिशा में ले जाने के बजाय लगातार अस्थिरता की ओर धकेल सकती है।
हर्क साम्पांग जैसे नेताओं की लोकप्रियता के पीछे सामाजिक कारण भी हैं। जनता में राज्य व्यवस्था के प्रति गहरी निराशा है। बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, कमजोर सेवा-प्रणाली और राजनीतिक संरक्षणवाद ने नागरिकों में आक्रोश पैदा किया है। इसी आक्रोश को तीखी भाषा में व्यक्त करने वाले नेता लोकप्रिय हो जाते हैं। लेकिन लोकप्रियता और राजनीतिक परिपक्वता एक ही चीज नहीं हैं। लोकतंत्र में नेतृत्व की वास्तविक परीक्षा संस्थाओं के भीतर रहकर समाधान देने की क्षमता से होती है।
यदि संसद में लगातार अवरोध जारी रहता है, तो सभामुख नियमावली के अनुसार निष्कासन या निलंबन की कार्रवाई कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में हर्क साम्पांग स्वयं को “व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष करने वाले नेता” के रूप में और अधिक प्रचारित कर सकते हैं। लेकिन दीर्घकाल में इससे उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता कमजोर भी हो सकती है। संसद में निर्वाचित होकर पहुँचा प्रतिनिधि यदि संसद की प्रक्रियाओं को ही अस्वीकार करने लगे, तो यह लोकतंत्र की विडंबना बन जाती है।
नेपाल इस समय संक्रमणकालीन राजनीतिक मनोविज्ञान से गुजर रहा है। पुराने दलों के प्रति निराशा है, लेकिन नई शक्तियों की स्थिरता पर भी पूर्ण भरोसा अभी नहीं बन पाया है। ऐसे समय में संयमित, नीतिमुखी और संस्थाओं के प्रति उत्तरदायी राजनीति की आवश्यकता है। आक्रोश चुनाव जिताने में मदद कर सकता है, लेकिन देश चलाने के लिए वह पर्याप्त नहीं होता।
अंततः संसद किसी व्यक्ति के आत्मप्रदर्शन का मंच नहीं है। वह जनादेश की साझा संस्था है। उसे अवरुद्ध करके नहीं, बल्कि मजबूत बनाकर ही लोकतंत्र को सशक्त किया जा सकता है। यदि हर्क साम्पांग की राजनीति इस सीमा को नहीं समझती, तो वे क्षणिक चर्चा का विषय तो बन सकते हैं, लेकिन दीर्घकालिक राष्ट्रीय राजनीति में भरोसेमंद शक्ति बन पाना उनके लिए कठिन होगा। नेपाली राजनीति आज ऊँची आवाज नहीं, बल्कि जिम्मेदार नेतृत्व की तलाश में है।










