देवेन्द्र के. ढुंगाना
नेपाल और भारत के बीच संबंध ऐतिहासिक रूप से निकट रहे हैं, लेकिन समय–समय पर संवेदनशील मुद्दों ने इन्हें प्रभावित किया है। हाल के दिनों में लिपुलेख के रास्ते कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए भारत–चीन समझौते के बाद सीमा विवाद एक बार फिर तेज हो गया है। इस घटनाक्रम ने न केवल द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित किया है, बल्कि नेपाल की आंतरिक राजनीति और कूटनीतिक रणनीति पर भी गहरा असर डाला है। इसी संदर्भ में बालेन्द्र शाह (बालेन शाह) की प्रस्तावित भारत यात्रा भी अनिश्चितता में पड़ गई है।
ऐतिहासिक संबंध: निकटता और विवाद का द्वंद्व:
नेपाल–भारत संबंधों की नींव १८१६ की सुगौली संधि पर आधारित है, जिसने दोनों देशों के बीच सीमा निर्धारण किया था। संधि के अनुसार महाकाली नदी को पश्चिमी सीमा माना गया, लेकिन इसके वास्तविक स्रोत को लेकर विवाद ने कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख क्षेत्रों में दीर्घकालीन समस्या उत्पन्न कर दी है।
खुली सीमा, सांस्कृतिक निकटता, धार्मिक संबंध और आर्थिक निर्भरता जैसे पहलुओं ने दोनों देशों को जोड़कर रखा है, लेकिन सीमा विवाद जैसे मुद्दे समय–समय पर तनाव पैदा करते रहे हैं।
आधुनिक विवाद: नक्शा, सड़क और यात्रा की राजनीति:
२०१९ में भारत द्वारा जारी नए राजनीतिक नक्शे में विवादित क्षेत्रों को शामिल किए जाने के बाद नेपाल में व्यापक विरोध हुआ। इसके जवाब में २०२० में नेपाल ने नया नक्शा जारी करते हुए उन क्षेत्रों को अपने भूभाग के रूप में शामिल किया। इससे कूटनीतिक संबंधों में ठंडापन आ गया।
भारत द्वारा लिपुलेख के रास्ते सड़क निर्माण किए जाने से विवाद और गहरा हो गया। अब कैलाश मानसरोवर यात्रा फिर से शुरू करने की घोषणा के बाद नेपाल ने इसे एकतरफा कदम बताते हुए कूटनीतिक विरोध दर्ज कराया है। नेपाल ने स्पष्ट किया है कि उसके भूभाग के उपयोग से संबंधित किसी भी गतिविधि के लिए उसकी सहमति आवश्यक है।
भारत और चीन की भूमिका: त्रिपक्षीय संवेदनशीलता:
लिपुलेख एक त्रिदेशीय सीमा क्षेत्र से जुड़ा होने के कारण यहाँ होने वाली कोई भी गतिविधि नेपाल, भारत और चीन—तीनों के लिए संवेदनशील है। लेकिन नेपाल को शामिल किए बिना भारत और चीन के बीच हुए समझौतों ने उसकी संप्रभुता पर प्रश्न खड़े किए हैं।
नेपाल ने दोनों देशों से अपने भूभाग का सम्मान करने की अपील करते हुए कूटनीतिक माध्यमों से समाधान खोजने पर जोर दिया है। भारत ने हालांकि नेपाल के दावे को अस्वीकार करते हुए अपना रुख दोहराया है, लेकिन संवाद के लिए तैयार रहने की बात भी कही है।
आंतरिक दबाव: सरकार पर बढ़ती अपेक्षाएँ:
सीमा विवाद ने नेपाल के भीतर राजनीतिक और जनस्तर पर व्यापक प्रतिक्रिया उत्पन्न की है। छात्र संगठनों के प्रदर्शन, पूर्व राजदूतों के संयुक्त बयान और राजनीतिक हलकों में जारी बहस ने सरकार पर सक्रिय कूटनीतिक पहल का दबाव बढ़ा दिया है।
विशेष रूप से, सरकार की शुरुआती चुप्पी ने कूटनीतिक हलकों में सवाल खड़े किए थे। हालांकि बाद में विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक रुख स्पष्ट किया।
बालेन शाह की भारत यात्रा: कूटनीतिक संकेत और अनिश्चितता:
इसी बीच बालेन्द्र शाह की प्रस्तावित भारत यात्रा भी विवाद के कारण अनिश्चित हो गई है। प्रारंभ में इस यात्रा का उद्देश्य द्विपक्षीय सहयोग, शहरी विकास और सांस्कृतिक आदान–प्रदान को बढ़ावा देना था। लेकिन सीमा विवाद के तेज होने के साथ ही यात्रा के समय और महत्व को लेकर प्रश्न उठने लगे हैं।
ऐसे संवेदनशील समय में उच्चस्तरीय यात्राओं को कूटनीतिक संकेत के रूप में देखा जाता है। यदि यात्रा स्थगित या रद्द होती है, तो इसे दोनों देशों के संबंधों में आई ठंडक के संकेत के रूप में देखा जा सकता है। वहीं, यदि यात्रा जारी रहती है, तो इसे संवाद के अवसर के रूप में भी लिया जा सकता है।
कूटनीतिक चुनौती: संतुलन और रणनीति:
नेपाल के लिए वर्तमान स्थिति कूटनीतिक संतुलन की परीक्षा है। एक ओर भारत के साथ पारंपरिक संबंध, तो दूसरी ओर चीन के साथ बढ़ता सहयोग—इन दोनों के बीच संतुलन बनाए रखते हुए राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना एक बड़ी चुनौती है।
नेपाल को तथ्यों, प्रमाणों और ऐतिहासिक आधारों के साथ अपने दावे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत करना होगा। साथ ही, द्विपक्षीय संवाद को जारी रखते हुए समाधान की दिशा में आगे बढ़ना आवश्यक है।
निष्कर्ष:
लिपुलेख के रास्ते कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर पैदा हुआ विवाद नेपाल–भारत संबंधों में एक नया तनाव लेकर आया है। ऐतिहासिक विवाद, आधुनिक राजनीतिक फैसले और त्रिपक्षीय संवेदनशीलता ने इस मुद्दे को जटिल बना दिया है।
इसी बीच बालेन शाह की भारत यात्रा का अनिश्चित होना वर्तमान कूटनीतिक स्थिति का प्रतिबिंब है। अब नेपाल को स्पष्ट रुख, प्रभावी कूटनीति और राष्ट्रीय एकता के आधार पर आगे बढ़ना होगा।
अंततः, सीमा विवाद का समाधान केवल भूगोल का प्रश्न नहीं है—यह विश्वास, पारस्परिक सम्मान और दीर्घकालीन कूटनीतिक परिपक्वता की परीक्षा भी है।









