देवेंद्र किशोर ढुंगाना
भद्रपुर: नेपाल की उत्तरी सीमा पर स्थित लिपुलेख दर्रा एक बार फिर क्षेत्रीय राजनीति और कूटनीतिक संवेदनशीलता का केंद्र बनकर उभरा है। भारत द्वारा इसी मार्ग से चीन के साथ सीमा व्यापार पुनः शुरू करने की तैयारी की खबर सामने आने के बाद नेपाल सरकार “अध्ययन और चर्चा” के चरण में है, वहीं सत्ता में आने की दहलीज पर खड़ी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (रास्वपा) के लिए यह मुद्दा एक गंभीर राष्ट्रीय परीक्षा के रूप में सामने आया है।
यह केवल एक व्यापारिक मार्ग खोलने या बंद करने का विषय नहीं है; यह नेपाल की संप्रभुता, कूटनीतिक परिपक्वता और नए राजनीतिक नेतृत्व की क्षमता की बहुआयामी परीक्षा है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और विवाद की जड़:
लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी क्षेत्र का विवाद १८१६ की सुगौली संधि तक जाता है। इस संधि में महाकाली नदी को पश्चिमी सीमा माना गया था, लेकिन नदी के वास्तविक स्रोत की व्याख्या को लेकर मतभेद बना हुआ है। नेपाल लिम्पियाधुरा को महाकाली का स्रोत मानते हुए इस क्षेत्र पर अपना दावा करता है, जबकि भारत अलग व्याख्या के आधार पर कालापानी क्षेत्र को अपने प्रशासनिक नियंत्रण में रखे हुए है।
समय के साथ भारत ने इस क्षेत्र में बुनियादी ढांचा, सुरक्षा उपस्थिति और प्रशासनिक गतिविधियाँ बढ़ाई हैं। भारत का यह भी दावा है कि वह दशकों से चीन के साथ व्यापार के लिए लिपुलेख मार्ग का उपयोग करता आ रहा है। हालांकि, नेपाल को शामिल किए बिना भारत-चीन के बीच हुए समझौतों ने नेपाल की असंतुष्टि को और गहरा किया है।
नया परिदृश्य: व्यापार या रणनीति?
भारत द्वारा जून से सितंबर के बीच लिपुलेख मार्ग से चीन के साथ व्यापार पुनः शुरू करने की तैयारी केवल आर्थिक गतिविधि नहीं है, बल्कि हिमालय क्षेत्र में भारत-चीन संबंधों का एक रणनीतिक आयाम भी है।
नेपाल के लिए यह स्थिति और जटिल है—क्योंकि विवादित भूभाग का उपयोग कर तीसरे देश के साथ व्यापार करना अंतरराष्ट्रीय कानून और द्विपक्षीय संबंधों की दृष्टि से संवेदनशील विषय है।
ऐसी स्थिति में नेपाल सरकार की प्रारंभिक प्रतिक्रिया—“हम अध्ययन कर रहे हैं”—सावधानीपूर्ण तो है, लेकिन दीर्घकाल में स्पष्ट और दृढ़ कूटनीतिक रुख आवश्यक होगा।
रास्वपा का उदय और जिम्मेदारी:
हाल ही के चुनाव में व्यापक जनसमर्थन के साथ उभरी रास्वपा अब सरकार का नेतृत्व करने की स्थिति में है। उसने पारदर्शिता, राष्ट्रीय हित और प्रभावी कूटनीति का वादा किया है।
लिपुलेख का मुद्दा उसी वादे की परीक्षा ले रहा है।
रास्वपा ने अपने घोषणापत्र में सीमा विवादों को “तथ्य और प्रमाण के आधार पर उच्चस्तरीय कूटनीतिक संवाद” के माध्यम से हल करने की प्रतिबद्धता जताई है। साथ ही, पार्टी नेताओं ने यह स्पष्ट किया है संविधान और नेपाल के आधिकारिक नक्शे से बाहर कोई निर्णय नहीं लिया जाएगा।
लेकिन सैद्धांतिक रुख और व्यावहारिक कूटनीति अलग-अलग बातें हैं। सरकार में आने के बाद भावनात्मक राष्ट्रवाद और व्यावहारिक कूटनीतिक संतुलन के बीच समन्वय सबसे बड़ी चुनौती होगा।
कूटनीतिक संतुलन की आवश्यकता:
नेपाल दो बड़े पड़ोसियों—भारत और चीन—के बीच स्थित है। यह स्थिति अवसर भी देती है और चुनौती भी।
लिपुलेख मामले में नेपाल को तीन स्तरों पर काम करना होगा:
१. द्विपक्षीय संवाद (भारत के साथ):
नेपाल-भारत संबंध ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से गहरे हैं। इसलिए सीमा विवाद को उग्र बयानबाजी के बजाय संस्थागत वार्ता के माध्यम से हल करना आवश्यक है। विदेश सचिव स्तर की व्यवस्था को पुनः सक्रिय करना महत्वपूर्ण होगा।
२. त्रिपक्षीय संवेदनशीलता (चीन के संदर्भ में):
जब चीन लिपुलेख को भारत के साथ व्यापारिक मार्ग के रूप में स्वीकार करता है, तो नेपाल के दावे की अनदेखी का अनुभव होता है। नेपाल को चीन के साथ भी अपनी स्थिति स्पष्ट रूप से रखते रहना चाहिए।
३. अंतरराष्ट्रीय कानूनी आधार:
ऐतिहासिक संधियों, नक्शों और प्रमाणों को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने दावे को मजबूत करना आवश्यक है।
‘उपेक्षा’ की मनोविज्ञान और नेपाल की चुनौती:
भारत और चीन के बीच हुए पूर्व समझौतों में नेपाल की अनुपस्थिति को अक्सर एक छोटे राष्ट्र की ‘उपेक्षा’ के रूप में देखा गया है।
लेकिन केवल उपेक्षित होने की भावना व्यक्त करना पर्याप्त नहीं है। कूटनीति में प्रभाव निर्माण के लिए निरंतरता, स्पष्टता और संयम जरूरी होता है।
जैसा कि कूटनीतिज्ञ दिनेश भट्टराई कहते हैं, “उग्र नहीं, संयमित लेकिन दृढ़” दृष्टिकोण अधिक प्रभावी होता है।
आंतरिक राजनीति और बाहरी संदेश:
नेपाल में लिपुलेख जैसे मुद्दे अक्सर राष्ट्रवाद से जुड़े होते हैं और राजनीतिक दल इन्हें आंतरिक समर्थन जुटाने के लिए भी इस्तेमाल करते हैं।
लेकिन वर्तमान संदर्भ अलग है। यदि रास्वपा इस मुद्दे को केवल भावनात्मक भाषण तक सीमित रखती है, तो यह पुरानी राजनीति की पुनरावृत्ति होगी।
इसके बजाय, तथ्य-आधारित और दीर्घकालीन रणनीति के साथ स्पष्ट नीति प्रस्तुत करने पर ही वह स्वयं को एक ‘नए विकल्प’ के रूप में स्थापित कर सकती है।
संभावित कदम:
नेपाल निम्नलिखित कदमों पर विचार कर सकता है:
-औपचारिक कूटनीतिक नोट के माध्यम से स्पष्ट आपत्ति और संवाद का प्रस्ताव
-विदेश सचिव स्तर की वार्ता को पुनः सक्रिय करना
सीमा संबंधी प्रमाणों का -अद्यतन दस्तावेजीकरण
-सार्वजनिक कूटनीति के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय ध्यान आकर्षित करना
-आंतरिक राजनीतिक एकता (राष्ट्रीय सहमति) का निर्माण
निष्कर्ष: परीक्षा केवल सरकार की नहीं, राज्य की है:
लिपुलेख प्रकरण केवल नई सरकार या रास्वपा की परीक्षा नहीं है; यह नेपाल की समग्र राज्य-क्षमता, कूटनीतिक परिपक्वता और राष्ट्रीय एकता की भी परीक्षा है।
नेपाल को अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए दृढ़ रहना होगा, लेकिन इसके लिए अपनाई जाने वाली भाषा, शैली और रणनीति अधिक महत्वपूर्ण होगी।
यदि रास्वपा अपने वादों के अनुरूप तथ्य-आधारित, संयमित और परिणामोन्मुख कूटनीति अपनाती है, तो यह संकट एक अवसर में बदल सकता है। अन्यथा, लिपुलेख केवल भूगोल का विवाद नहीं, बल्कि राजनीतिक विश्वसनीयता का प्रश्न भी बन जाएगा।











