देबेन्द्र किशोर
नेपाल की राजनीतिक इतिहास में सत्ता, राज्य संसाधनों और सार्वजनिक नैतिकता का प्रश्न हमेशा विवाद के घेरे में रहा है। हाल के समय में केपी शर्मा ओली के विदेश उपचार तथा उससे जुड़े सरकारी खर्चों के सार्वजनिक विवरणों ने एक बार फिर राज्यकोष के उपयोग, राजनीतिक विशेषाधिकार और जनउत्तरदायित्व पर गंभीर बहस खड़ी कर दी है।
राजनीति में नेतृत्व केवल भाषण, राष्ट्रवाद या चुनावी जीत से नहीं मापा जाता; यह इस बात से भी तय होता है कि वह जनता के कर से संचालित राज्य के प्रति कितना जिम्मेवार है। जब किसी नेता के उपचार, विदेश यात्रा, सुरक्षा तथा अन्य सुविधाओं पर करोड़ों रुपये राज्यकोष से खर्च होने की जानकारी सार्वजनिक होती है, तब स्वाभाविक रूप से नागरिक समाज यह प्रश्न उठाता है— क्या राज्य केवल शक्तिशाली व्यक्तियों की सुविधा सुनिश्चित करने का माध्यम है, या आम नागरिकों के साझा विश्वास का केंद्र?
नेपाल में पिछले कई सरकारों के दौरान सत्ता और राज्यकोष के बीच की दूरी लगातार कमजोर होती गई है। उपचार खर्च से लेकर राजनीतिक नियुक्तियों तक, कार्यकर्ता व्यवस्थापन से प्रशासनिक संरक्षण तक, राज्य संयंत्र को दलगत प्रभाव में चलाए जाने की अनुभूति जनता में गहरी होती गई है। यही कारण है कि वर्तमान पीढ़ी पुरानी राजनीतिक संस्कृति के प्रति गहरा असंतोष व्यक्त कर रही है।
राजनीतिक दल स्वयं को लोकतंत्र का संरक्षक बताते रहे हैं, लेकिन व्यवहार में अधिकांश नेतृत्व पर राज्य को “सत्ता बचाने का औजार” बनाने का आरोप लगता रहा है। कोई भी नेता जब अपने पद और प्रभाव का उपयोग कर विशेष सुविधाएँ प्राप्त करता है, तब लोकतांत्रिक समानता की भावना कमजोर होती है। एक ओर आम नागरिक उपचार न मिलने पर अस्पतालों की लाइन में खड़े रहने को मजबूर हों, विदेश जाने के लिए ऋण खोजते फिरें, और दूसरी ओर शक्तिशाली नेताओं के लिए राज्यकोष सहज रूप से खुला हो— यह लोकतांत्रिक संवेदनशीलता का गंभीर विषय है।
हालाँकि, ऐसे मुद्दों की आलोचना करते समय तथ्यों, कानूनी स्थिति और संवैधानिक प्रक्रियाओं को संतुलित रूप से देखना भी आवश्यक है। कुछ खर्च मंत्रिपरिषद के निर्णय अनुसार हुए हो सकते हैं, कुछ उस समय के कानूनी प्रावधानों के तहत वैध भी रहे होंगे। लेकिन केवल कानूनी वैधता ही नैतिक उत्तरदायित्व का अंतिम मापदंड नहीं होती। जनता पारदर्शिता, जवाबदेही और समान व्यवहार चाहती है।
नेपाल की राजनीतिक संस्कृति का सबसे बड़ा संकट यही है— नेतृत्व द्वारा राज्य को अपने विशेषाधिकार की निरंतरता मानने की प्रवृत्ति। इसी प्रवृत्ति ने बिचौलिया संस्कृति, भूमाफियाओं से साँठगाँठ, प्रशासनिक संरक्षणवाद और नीतिगत भ्रष्टाचार को मजबूत किया है। जब सत्ता जनसेवा के बजाय शक्ति संरक्षण पर केंद्रित हो जाती है, तब लोकतंत्र की आत्मा कमजोर पड़ती है।
आज देश आर्थिक संकट, बेरोजगारी, युवाओं के पलायन और जनविश्वास के गहरे संकट से गुजर रहा है। ऐसे समय में जनता नई राजनीतिक संस्कृति की तलाश में है— जहाँ राज्य संसाधनों का उपयोग पारदर्शी हो, नेता व्यक्तिगत सुविधाओं से अधिक सार्वजनिक उत्तरदायित्व के प्रति प्रतिबद्ध दिखाई दें, और सरकार जनता के जीवनस्तर सुधारने पर केंद्रित हो।
वर्तमान सरकार के प्रति जनता में उम्मीद होने का मुख्य कारण भी यही है। अब जनता भाषण से अधिक व्यवहार को देखने लगी है। लोग ऐसी शासन व्यवस्था चाहते हैं जहाँ मंत्री, प्रधानमंत्री या उच्च पदस्थ व्यक्ति राज्यकोष का उपयोग करते समय स्पष्ट मानदंडों का पालन करें; जहाँ उपचार खर्च, भ्रमण खर्च और विशेष सुविधाएँ सार्वजनिक परीक्षण के दायरे में रहें; और जहाँ सत्ता पहुँच का माध्यम नहीं, बल्कि सेवा की जिम्मेदारी बने।
नई राजनीतिक धारा का सार केवल नए चेहरे नहीं, बल्कि नया चरित्र है। यदि नई पीढ़ी की राजनीतिक शक्तियाँ और वर्तमान सरकार वास्तव में परिवर्तन का दावा करती हैं, तो उन्हें अतीत की गलतियों को न दोहराने का स्पष्ट संकेत देना होगा। राज्यकोष के पारदर्शी उपयोग, संपत्ति विवरण के सार्वजनिक परीक्षण, सार्वजनिक पदों पर नैतिक आचरण, और भ्रष्टाचार पर निष्पक्ष कार्रवाई के माध्यम से ही जनविश्वास पुनर्स्थापित किया जा सकता है।
नेपाल के नागरिक अब “नेताओं के लिए देश” नहीं, बल्कि “देश के लिए नेतृत्व” चाहते हैं। यही चेतना नई राजनीतिक बहस को जन्म दे रही है। यदि राजनीतिक नेतृत्व अब भी राज्य को व्यक्तिगत सुविधा और शक्ति संरक्षण का साधन बनाए रखेगा, तो जनता की निराशा और गहरी होगी। लेकिन यदि वर्तमान सरकार और नई राजनीतिक धारा पारदर्शिता, सुशासन और जनउत्तरदायित्व को व्यवहार में लागू करने में सफल होती है, तो यही क्षण नेपाली राजनीति में नए अध्याय की शुरुआत बन सकता है।
इतिहास ने हमेशा एक बात सिद्ध की है— सत्ता स्थायी नहीं होती, लेकिन जनता की स्मृति और मूल्यांकन दीर्घकालीन होते हैं। इसलिए आज की आवश्यकता प्रतिशोध की राजनीति नहीं, बल्कि उत्तरदायी राजनीतिक संस्कृति की स्थापना है। नेपाल को अब शक्ति-केंद्रित नहीं, बल्कि नागरिक-केंद्रित शासन प्रणाली की आवश्यकता है। यही रास्ता लोकतंत्र को विश्वसनीय, न्यायपूर्ण और जनमुखी बना सकता है।









