रावलपिंडी: पाकिस्तानी सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने पिछले वर्ष भारत के साथ हुए चार दिवसीय सैन्य संघर्ष को ‘दो विचारधाराओं के बीच की लड़ाई’ करार दिया है। रावलपिंडी स्थित सैन्य मुख्यालय में ‘मारका-ए-हक’ की पहली वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित एक समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने दावा किया कि यह केवल दो सेनाओं के बीच का पारंपरिक युद्ध नहीं, बल्कि एक वैचारिक निर्णायक युद्ध था। पाकिस्तान ने पिछले साल ६ से १० मई के बीच हुए इस सैन्य तनाव को ‘मारका-ए-हक’ का नाम दिया है। मुनीर ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि संघर्ष के दौरान पाकिस्तान की रणनीति भारत की तुलना में श्रेष्ठ थी और पाकिस्तान ने अपनी संप्रभुता के उल्लंघन का जवाब राष्ट्रीय एकता और सैन्य शक्ति के साथ दिया।
भविष्य की सैन्य चुनौतियों पर चर्चा करते हुए सेना प्रमुख मुनीर ने कहा कि अब आने वाले समय में युद्ध बहु-आयामी (मल्टी-डोमेन) होंगे, जिसके लिए पाकिस्तान अपनी सैन्य तकनीक, हार्डवेयर और प्रशिक्षण को लगातार आधुनिक बना रहा है। उन्होंने क्षेत्र में शांति बनाए रखने के लिए ‘विश्वसनीय प्रतिरक्षा’ पर जोर दिया और हेंगोर-श्रेणी की पनडुब्बियों, नए रॉकेट बल तथा लड़ाकू विमानों की खरीद जैसे रक्षा आधुनिकीकरण कार्यक्रमों का भी उल्लेख किया।
इसी बीच, पाकिस्तान के ऊर्जा मंत्री अली परवेज मलिक द्वारा खुद को प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर की टीम का एक ‘साधारण कार्यकर्ता’ बताए जाने पर नया विवाद खड़ा हो गया है। आलोचकों का तर्क है कि एक लोकतांत्रिक सरकार के मंत्री द्वारा सेना प्रमुख को अपना नेता मानना पाकिस्तान की राजनीति में सैन्य हस्तक्षेप और ‘हाइब्रिड’ शासन व्यवस्था को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। सोशल मीडिया पर भी लोग इसे लोकतांत्रिक मर्यादा के खिलाफ और सैन्य प्रतिष्ठान को खुश करने की कोशिश बता रहे हैं, जबकि दूसरी ओर खैबर पख्तुनख्वा विधानसभा में मुनीर और शरीफ को नोबेल शांति पुरस्कार देने की मांग वाला प्रस्ताव भी पेश किया गया है।









