भारतीयों के लिए स्तन कैंसर का टीका बनाने की दस साल से कोशिश, आईआईटी मद्रास में क्या हो रहा है?

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चेन्नई: चेन्नई स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मद्रास के वैज्ञानिक भारतीय मरीजों के कैंसर ऊतकों से मिले आनुवंशिक आंकड़ों के आधार पर स्तन कैंसर के लिए मैसेंजर आरएनए (एमआरएनए) आधारित प्रायोगिक टीका विकसित करने में जुटे हैं। वर्ष २०१५ में स्थापित राष्ट्रीय कैंसर ऊतक जैवभंडार में अब तक लगभग दस हजार कैंसर ऊतक नमूने एकत्र किए जा चुके हैं। इन नमूनों की मदद से शोधकर्ता भारतीय मरीजों में पाए जाने वाले विशिष्ट ट्यूमर प्रतिजनों की पहचान कर रहे हैं। हालांकि, यह टीका अभी प्रयोगशाला अनुसंधान के चरण में है और चूहों पर इसके परीक्षण की तैयारी चल रही है। मनुष्यों में इसकी सुरक्षा और प्रभावकारिता साबित होने में अभी लंबा समय लग सकता है।
चेन्नई में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास के जैव प्रौद्योगिकी विभाग के प्रोफेसर एस. महालिंगम एक ऐसे ठंडे कक्ष में प्रवेश करते हैं, जहां चारों ओर फ्रीजर और स्टेनलेस स्टील के तरल नाइट्रोजन टैंक रखे हैं। वे इन टैंकों की ओर इशारा करते हुए बताते हैं कि इनमें कैंसर के हजारों ऊतक नमूने सुरक्षित रखे गए हैं। उनके अनुसार, चेन्नई के बारह से अधिक अस्पतालों से मरीजों के कैंसर ऊतकों के लगभग दस हजार नमूने एकत्र किए गए हैं। इन नमूनों को अत्यंत कम तापमान पर सुरक्षित रखा जाता है, जबकि रक्त के विभिन्न घटकों और ट्यूमर से निकाले गए डीएनए तथा आरएनए को अलग-अलग फ्रीजर में संरक्षित किया जाता है।
यह राष्ट्रीय कैंसर ऊतक जैवभंडार है, जिसकी स्थापना वर्ष २०१५ में आईआईटी मद्रास में की गई थी। जैवभंडार ऐसी वैज्ञानिक सुविधा होती है, जहां ऊतक, रक्त और आनुवंशिक सामग्री जैसे जैविक नमूनों को व्यवस्थित ढंग से सुरक्षित रखा जाता है। इनके साथ मरीजों की चिकित्सकीय जानकारी भी उपलब्ध रहती है, ताकि वैज्ञानिक भविष्य में कैंसर के कारणों, उसके विकास और उपचार के प्रभावों का अध्ययन कर सकें।
लगभग एक दशक से विकसित हो रहे इस बुनियादी ढांचे का इस्तेमाल अब स्तन कैंसर के लिए एक प्रायोगिक टीका तैयार करने में किया जा रहा है। इस परियोजना का उद्देश्य भारतीय मरीजों के ट्यूमर में पाए जाने वाले ऐसे विशिष्ट प्रतिजनों की पहचान करना है, जिन्हें निशाना बनाकर शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को कैंसर कोशिकाओं के विरुद्ध सक्रिय किया जा सके।
प्रोफेसर महालिंगम के अनुसार, उनकी टीम ने ट्यूमर के ऐसे प्रतिजनों की पहचान की है, जिनका उल्लेख अन्य आबादी समूहों से संबंधित उपलब्ध आंकड़ों में पहले नहीं हुआ था। इसके साथ ही उन प्रतिजनों की भी पहचान की गई है, जिनके बारे में पहले से वैज्ञानिक जानकारी मौजूद है। टीम इन निष्कर्षों के आधार पर एमआरएनए टीके का प्रारूप तैयार कर रही है।
एमआरएनए तकनीक से कैंसर के विरुद्ध प्रतिरक्षा तैयार करने की कोशिश
एमआरएनए आधारित टीकों की तकनीक कोविड-१९ महामारी के दौरान व्यापक रूप से चर्चा में आई थी। इस तकनीक में शरीर की कोशिकाओं को एक विशेष प्रोटीन बनाने के लिए आनुवंशिक निर्देश दिए जाते हैं। इसके बाद प्रतिरक्षा प्रणाली उस प्रोटीन को पहचानना सीख सकती है और उसके अनुरूप प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया विकसित कर सकती है।
कैंसर के संदर्भ में इस तकनीक का उद्देश्य थोड़ा अलग है। यहां टीके को ऐसे ट्यूमर प्रतिजनों के आधार पर तैयार किया जाता है, जिन्हें कैंसर कोशिकाओं की पहचान करने के लिए उपयोगी माना जाता है। जब शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली इन प्रतिजनों को पहचानना सीखती है, तो वह संबंधित कैंसर कोशिकाओं के विरुद्ध प्रतिक्रिया कर सकती है।
ट्यूमर प्रतिजन ऐसे प्रोटीन या प्रोटीन के अंश होते हैं, जिन्हें प्रतिरक्षा प्रणाली पहचान सकती है। कैंसर कोशिकाओं में आनुवंशिक बदलाव होने पर कुछ प्रोटीन बदल जाते हैं या नए प्रोटीन बन सकते हैं। इनसे बनने वाले विशिष्ट प्रतिजनों को नवप्रतिजन कहा जाता है। ऐसे प्रतिजन कैंसर के लिए व्यक्तिगत या मरीज-विशिष्ट टीके विकसित करने का आधार बन सकते हैं।
आईआईटी मद्रास की परियोजना की विशेषता यह है कि इसमें भारतीय मरीजों के ट्यूमर नमूनों से प्राप्त जानकारी का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसका उद्देश्य उन प्रतिजनों की पहचान करना है, जो भारतीय मरीजों में प्रासंगिक हो सकते हैं और जिनके आधार पर प्रभावी प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया विकसित करने की संभावना की जांच की जा सके।
हालांकि, केवल किसी प्रतिजन की पहचान कर लेना प्रभावी टीका तैयार हो जाने के बराबर नहीं है। वैज्ञानिकों को यह भी साबित करना होगा कि चुने गए प्रतिजन शरीर में पर्याप्त प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया उत्पन्न करते हैं, यह प्रतिक्रिया कैंसर कोशिकाओं को निशाना बना सकती है और इससे सामान्य कोशिकाओं को अनावश्यक नुकसान नहीं पहुंचता।
प्रोफेसर महालिंगम ने बताया कि उनकी टीम टीके का प्रारूप तैयार करने के अंतिम चरण में है। फिलहाल इसकी आनुवंशिक संरचना का विवरण सार्वजनिक नहीं किया जा सकता, क्योंकि इस पर पेटेंट के लिए आवेदन किया गया है। शोधकर्ता अब स्तन कैंसर से प्रभावित चूहों के मॉडल पर इसके परीक्षण की तैयारी कर रहे हैं। यदि प्रयोगशाला और पशु-अध्ययनों के परिणाम उत्साहजनक रहते हैं, तो आगे चलकर मनुष्यों में परीक्षण की संभावना पर विचार किया जा सकता है।
इसलिए फिलहाल इसे स्तन कैंसर का उपलब्ध टीका या प्रमाणित उपचार कहना उचित नहीं होगा। यह एक शुरुआती वैज्ञानिक प्रयास है, जिसकी वास्तविक उपयोगिता आगे होने वाले परीक्षणों से ही स्पष्ट होगी।
भारतीय मरीजों के नमूनों की जरूरत क्यों पड़ी?
राष्ट्रीय कैंसर ऊतक जैवभंडार बनाने का विचार वर्ष २०१३ में सामने आया था। उस समय प्रोफेसर महालिंगम को अपने प्रयोगशाला अनुसंधान के निष्कर्षों की पुष्टि करने के लिए वास्तविक कैंसर ऊतक नमूनों की जरूरत थी। लेकिन उन्हें ऐसी सार्वजनिक सुविधा खोजने में कठिनाई हुई, जहां से शोध के लिए पर्याप्त और उपयुक्त नमूने मिल सकें।
उन्होंने महसूस किया कि भारत में कैंसर मरीजों और शोधकर्ताओं की बड़ी संख्या होने के बावजूद कैंसर ऊतकों को व्यवस्थित रूप से एकत्र करने, संरक्षित रखने और वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए उपलब्ध कराने वाली सुविधाओं की कमी थी। इसके बाद उन्होंने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग से संपर्क किया, जिसने इस पहल के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की।
वर्ष २०१५ में दो अस्पतालों के सहयोग से शुरू हुआ यह जैवभंडार अब बारह से अधिक अस्पतालों के नेटवर्क तक पहुंच चुका है। यहां देश के विभिन्न हिस्सों से नमूने एकत्र किए गए हैं। प्रोफेसर महालिंगम के अनुसार, कुल नमूनों में लगभग पचास से साठ प्रतिशत तमिलनाडु के बाहर से आए हैं।
इस सुविधा में स्तन कैंसर के अलावा पाचन तंत्र, यकृत और रक्त से संबंधित कैंसर सहित कई प्रकार के कैंसर के नमूने सुरक्षित रखे गए हैं। कुछ मरीजों के नमूने उपचार के अलग-अलग चरणों में एकत्र किए जाते हैं। विशेष रूप से ल्यूकेमिया से पीड़ित बच्चों के नमूनों का समय-समय पर अध्ययन करने से वैज्ञानिक बीमारी में होने वाले आनुवंशिक बदलावों को समझ सकते हैं।
इस तरह के नमूने शोधकर्ताओं को एक महत्वपूर्ण सवाल का जवाब खोजने में मदद करते हैं। आखिर एक जैसी उम्र, समान प्रकार के ट्यूमर और लगभग एक जैसा उपचार पाने वाले कुछ मरीज ठीक होने लगते हैं, जबकि दूसरे मरीजों में वही उपचार अपेक्षित असर क्यों नहीं दिखाता?
प्रोफेसर महालिंगम ने स्तन कैंसर के ऐसे दस मरीजों का उदाहरण दिया, जिन्हें समान प्रकार की कीमोथेरेपी दी गई थी। कुछ मरीजों में उपचार का अच्छा असर हुआ, जबकि कुछ ने अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं दी। उनके अनुसार, इस तरह के अंतर के पीछे आनुवंशिक या जीनोमिक भिन्नताएं हो सकती हैं। हालांकि, इन भिन्नताओं और उपचार के परिणामों के बीच संबंध स्थापित करने के लिए विस्तृत अध्ययन आवश्यक है।
पश्चिमी देशों के आंकड़ों से आगे बढ़ने की जरूरत
कैंसर की आनुवंशिक संरचना को समझने के लिए लंबे समय तक यूरोपीय मूल की आबादी से प्राप्त आंकड़ों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। इन अध्ययनों से कैंसर के कई प्रकारों, उनके जोखिम और उपचार से संबंधित उपयोगी जानकारियां मिली हैं। लेकिन अलग-अलग आबादी समूहों में आनुवंशिक विविधता होने के कारण इन निष्कर्षों से भारतीय मरीजों की सभी विशेषताओं को समझ पाना संभव नहीं है।
इसी वजह से भारतीय मरीजों के नमूनों पर आधारित शोध महत्वपूर्ण हो जाता है। इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि भारतीय आबादी में कौन-से आनुवंशिक बदलाव अधिक आम हैं, किन बदलावों का संबंध कैंसर के विकास से हो सकता है और वे उपचार के प्रति मरीजों की प्रतिक्रिया को किस प्रकार प्रभावित करते हैं।
प्रोफेसर महालिंगम ने स्तन कैंसर के जोखिम से जुड़े बीआरसीए-१ और बीआरसीए-२ जीन का उल्लेख किया। इन जीन में कुछ हानिकारक आनुवंशिक बदलाव स्तन और अंडाशय के कैंसर का जोखिम बढ़ा सकते हैं।
उनकी टीम ने स्तन कैंसर के लगभग एक हजार नमूनों का विश्लेषण किया। इस अध्ययन में करीब चार प्रतिशत मरीजों में इन जीन से जुड़े उत्परिवर्तन पाए गए। शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया है कि ऐसे आंकड़ों की तुलना अलग-अलग अध्ययनों से करते समय नमूनों के चयन, मरीजों की विशेषताओं और जांच की पद्धतियों को ध्यान में रखना जरूरी है। केवल एक प्रतिशत के अंतर से किसी आबादी में कैंसर का जोखिम कम या अधिक होने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
टीम ने आरईसीक्यूएल-१ सहित अन्य जीन में भी आनुवंशिक भिन्नताएं देखीं। यह जीन क्षतिग्रस्त डीएनए की मरम्मत से संबंधित प्रक्रियाओं में भूमिका निभाता है। प्रोफेसर महालिंगम के अनुसार, इस जीन में एक विशेष आनुवंशिक बदलाव भारतीय आबादी के लगभग ३.६ से ३.९ प्रतिशत लोगों में पाया गया, जबकि कुछ अन्य आंकड़ों में इसका अनुपात एक प्रतिशत से कम था।
हालांकि, किसी आनुवंशिक बदलाव का आबादी में अधिक पाया जाना अपने आप यह साबित नहीं करता कि वह कैंसर का कारण है या किसी मरीज के उपचार को प्रभावित करता है। इसके चिकित्सकीय महत्व को समझने के लिए अतिरिक्त अध्ययन और स्वतंत्र वैज्ञानिक पुष्टि जरूरी है।
नमूने से जीनोमिक जानकारी तक की वैज्ञानिक प्रक्रिया
कैंसर ऊतक एकत्र करना अनुसंधान की शुरुआत भर है। इसके बाद नमूनों को सुरक्षित रखने, उनसे आनुवंशिक सामग्री निकालने, उसकी अनुक्रमण जांच करने और प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण करने जैसे कई चरण पूरे करने पड़ते हैं।
राष्ट्रीय कैंसर ऊतक जैवभंडार में ट्यूमर के ऊतकों को तरल नाइट्रोजन की मदद से लगभग माइनस १९६ डिग्री सेल्सियस तापमान पर सुरक्षित रखा जाता है। यहां सात टैंक हैं और प्रत्येक में लगभग तेरह हजार शीशियां रखी जा सकती हैं। इसके अतिरिक्त, रक्त के विभिन्न घटकों को माइनस ८० डिग्री सेल्सियस पर रखे फ्रीजर में संरक्षित किया जाता है। ट्यूमर से निकाले गए डीएनए और आरएनए को भी भविष्य के अध्ययन के लिए सुरक्षित रखा जाता है।
जैवभंडार के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. जॉन पीटर के अनुसार, नमूनों को तैयार करने और उनसे आनुवंशिक सामग्री निकालने का काम नियंत्रित प्रयोगशाला परिस्थितियों में किया जाता है। इससे बाहरी पदार्थों से नमूनों के दूषित होने की आशंका कम करने में मदद मिलती है।
इसके बाद नमूनों की आनुवंशिक अनुक्रमण जांच की जाती है। संपूर्ण जीनोम अनुक्रमण में किसी जीव की आनुवंशिक सामग्री का व्यापक अध्ययन किया जाता है, जबकि संपूर्ण एक्सोम अनुक्रमण में मुख्य रूप से डीएनए के उन हिस्सों पर ध्यान दिया जाता है, जिनमें प्रोटीन बनाने के निर्देश होते हैं। आरएनए अनुक्रमण से यह समझने में सहायता मिलती है कि किसी नमूने में कौन-से जीन सक्रिय हैं।
डॉ. पीटर के अनुसार, एक अनुक्रमण प्रक्रिया से लगभग डेढ़ से तीन टेराबाइट तक आंकड़े प्राप्त हो सकते हैं। इतनी बड़ी मात्रा में जानकारी को सुरक्षित रखने, व्यवस्थित करने और उसका विश्लेषण करने के लिए विशेष कंप्यूटर प्रणालियों तथा प्रशिक्षित वैज्ञानिकों की आवश्यकता होती है।
किसी मरीज के ट्यूमर के नमूने की तुलना उसी मरीज के सामान्य ऊतक या रक्त से करने पर वैज्ञानिक उन आनुवंशिक बदलावों की पहचान कर सकते हैं, जो कैंसर कोशिकाओं में उत्पन्न हुए हैं। इससे कैंसर से संबंधित बदलावों और जन्म से मौजूद आनुवंशिक भिन्नताओं के बीच अंतर समझने में मदद मिलती है। रक्त के नमूनों के माध्यम से माता-पिता से विरासत में मिले उन बदलावों का भी अध्ययन किया जा सकता है, जिनका संबंध कैंसर के जोखिम से हो सकता है।
कुछ कैंसर में उपचार के अलग-अलग चरणों में एकत्र किए गए नमूनों की तुलना भी उपयोगी साबित होती है। इससे समय के साथ ट्यूमर की आनुवंशिक संरचना में होने वाले बदलावों और उपचार के प्रति उसके बदलते व्यवहार को समझने में मदद मिल सकती है।
इस तरह की जानकारी भविष्य में ऐसे संकेतकों की पहचान करने में सहायक हो सकती है, जिनसे अनुमान लगाया जा सके कि किसी विशेष मरीज को किसी खास दवा से लाभ होने की संभावना कितनी है। लेकिन इस प्रकार के अनुमान को नियमित चिकित्सकीय इस्तेमाल में लाने से पहले व्यापक परीक्षण और स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक होगी।
भारतीय कैंसर जीनोम एटलस से बढ़ रही उम्मीदें
कैंसर ऊतक जैवभंडार में सुरक्षित नमूने भारत में कैंसर की आनुवंशिक विशेषताओं का विस्तृत डिजिटल अभिलेख तैयार करने के प्रयासों से भी जुड़े हैं। इसी दिशा में कार्किनोस हेल्थकेयर के सहयोग से भारत कैंसर जीनोम एटलस तैयार किया गया, जिसे वर्ष २०२४ में शुरू किया गया था।
प्रोफेसर महालिंगम के अनुसार, इस एटलस में स्तन कैंसर, ल्यूकेमिया, अग्न्याशय के कैंसर और बृहदान्त्र के कैंसर सहित विभिन्न प्रकार के कैंसर से संबंधित लगभग दो हजार जीनोमिक प्रोफाइल शामिल हैं। उनकी टीम तीन हजार से अधिक नमूनों की अनुक्रमण जांच कर चुकी है और अतिरिक्त आंकड़ों को भी इस संग्रह में शामिल करने का काम चल रहा है।
इस प्रकार के डिजिटल अभिलेखों का उद्देश्य कैंसर से जुड़े आनुवंशिक बदलावों की पहचान करना और अलग-अलग मरीजों के आंकड़ों की तुलना करना है। इससे शोधकर्ताओं को कैंसर के विभिन्न रूपों, उनके विकास और उपचार के प्रति प्रतिक्रिया के बारे में बेहतर जानकारी मिल सकती है।
हालांकि, इस जानकारी तक पहुंच नियंत्रित है। शोधकर्ताओं को उपलब्ध नियमों के अनुसार उत्परिवर्तन से संबंधित कुछ आंकड़े देखने की अनुमति मिल सकती है, जबकि मूल जीनोमिक आंकड़ों और मरीजों की पहचान से जुड़ी जानकारी पर प्रतिबंध रहता है। ऊतक के वास्तविक नमूनों का इस्तेमाल करने के लिए आवश्यक नैतिक मंजूरियां भी लेनी होती हैं। इससे मरीजों की निजता और जैविक नमूनों के जिम्मेदार उपयोग को सुनिश्चित करने में मदद मिलती है।
महंगा है कैंसर अनुसंधान का बुनियादी ढांचा
कैंसर ऊतक जैवभंडार और जीनोमिक एटलस जैसी सुविधाएं विकसित करना तथा उन्हें लंबे समय तक संचालित रखना खर्चीला काम है। आईआईटी मद्रास में राष्ट्रीय कैंसर ऊतक जैवभंडार की स्थापना के लिए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग से २७.८१ करोड़ रुपये और आईआईटी मद्रास से अतिरिक्त ३.९ करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता मिली थी। इस प्रकार स्थापना के लिए कुल ३१.७१ करोड़ रुपये की राशि उपलब्ध कराई गई।
यह सुविधा अधिकतम पच्चीस हजार कैंसर ऊतक नमूनों को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से तैयार की गई है। इसके संचालन के लिए विशेष भंडारण व्यवस्था, कम तापमान बनाए रखने वाले उपकरण, प्रयोगशालाएं और आंकड़ों के विश्लेषण के लिए कंप्यूटिंग सुविधाएं आवश्यक हैं।
नमूनों को सुरक्षित रखने की प्रक्रिया भी उनकी प्रकृति के अनुसार अलग-अलग होती है। कुछ ऊतकों को अत्यंत कम तापमान पर रखा जाता है, जबकि अन्य नमूनों को फॉर्मेलिन जैसे परिरक्षक में सुरक्षित करके पैराफिन में जमाया जाता है। इसके बाद पैराफिन में रखे ऊतकों की पतली परतें काटकर सूक्ष्मदर्शी से जांच की जा सकती हैं।
जीनोमिक अनुक्रमण पर भी काफी खर्च आता है। प्रोफेसर महालिंगम के अनुमान के अनुसार, संपूर्ण जीनोम अनुक्रमण के लिए एक नमूने पर लगभग एक लाख रुपये खर्च हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त, आंकड़ों को सुरक्षित रखने, उनका विश्लेषण करने और विशेषज्ञों की सेवाएं लेने पर भी संसाधन खर्च होते हैं।
ऐसे में अनुसंधान के लिए केवल प्रारंभिक अनुदान पर्याप्त नहीं होता। जैवभंडार को लंबे समय तक चलाने, नमूनों की गुणवत्ता बनाए रखने, नई तकनीक अपनाने और वैज्ञानिक कर्मचारियों को उपलब्ध कराने के लिए निरंतर वित्तीय सहायता जरूरी है।
रोगी के ट्यूमर से प्रयोगशाला में उपचार की जांच
आईआईटी मद्रास की टीम कैंसर ऊतक जैवभंडार के साथ-साथ मरीजों के ट्यूमर से ऑर्गेनॉइड विकसित करने पर भी काम कर रही है। ऑर्गेनॉइड प्रयोगशाला में तैयार किए गए त्रिआयामी जैविक मॉडल होते हैं, जो मूल ऊतक की कुछ महत्वपूर्ण विशेषताओं को बनाए रख सकते हैं।
प्रोफेसर महालिंगम के अनुसार, उनकी टीम यकृत कैंसर के लिए ऐसे मॉडल तैयार कर चुकी है और स्तन तथा अग्न्याशय के कैंसर के मॉडल विकसित करने पर काम कर रही है।
इन मॉडलों का उपयोग प्रयोगशाला में विभिन्न दवाओं के प्रति ट्यूमर की प्रतिक्रिया का अध्ययन करने के लिए किया जा सकता है। यदि किसी मरीज के ट्यूमर से तैयार ऑर्गेनॉइड पर अलग-अलग दवाओं का परीक्षण किया जाए, तो शोधकर्ताओं को यह समझने में मदद मिल सकती है कि कौन-से उपचार आगे जांच के योग्य हैं।
भविष्य में इस तरह के मॉडल व्यक्तिगत उपचार की दिशा में उपयोगी साबित हो सकते हैं। इसे वैयक्तिकृत चिकित्सा कहा जाता है, जिसमें उपचार संबंधी निर्णय मरीज की जैविक और चिकित्सकीय विशेषताओं के आधार पर लेने का प्रयास किया जाता है। हालांकि, प्रयोगशाला में किसी दवा का अच्छा असर दिखाई देना यह सुनिश्चित नहीं करता कि वही दवा मरीज के शरीर में भी उतनी ही प्रभावी होगी। इसलिए ऐसे परिणामों की चिकित्सकीय पुष्टि आवश्यक है।
भारत में कैंसर का बढ़ता बोझ और व्यापक अनुसंधान की जरूरत
भारत में कैंसर के मामलों की बढ़ती संख्या ने रोकथाम, शीघ्र पहचान, उपचार और अनुसंधान को महत्वपूर्ण बना दिया है। अंतरराष्ट्रीय कैंसर अनुसंधान एजेंसी के ग्लोबोकैन अनुमानों के अनुसार, वर्ष २०२२ में भारत में स्तन कैंसर के लगभग एक लाख बानवे हजार नए मामले दर्ज किए गए थे। यह महिलाओं में सबसे अधिक पाया जाने वाला कैंसर था। उपलब्ध आंकड़े कैंसर की रोकथाम और प्रभावी उपचार के लिए अधिक वैज्ञानिक निवेश की जरूरत को रेखांकित करते हैं।
आईआईटी मद्रास की परियोजना इसी व्यापक चुनौती का एक हिस्सा है। भारतीय मरीजों के नमूनों से प्राप्त जानकारी का इस्तेमाल करके शोधकर्ता यह समझने का प्रयास कर रहे हैं कि देश की विभिन्न आबादी में कैंसर की आनुवंशिक विशेषताएं कैसी हैं और इन विशेषताओं का उपचार पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।
प्रोफेसर महालिंगम का मानना है कि इस तरह के अनुसंधान को व्यापक स्तर पर आगे बढ़ाने के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों में अधिक कैंसर जैवभंडार और अनुक्रमण सुविधाएं स्थापित करने की जरूरत है। केवल एक क्षेत्र से एकत्र नमूनों के आधार पर पूरे भारत की आबादी में किसी आनुवंशिक बदलाव की व्यापकता का विश्वसनीय अनुमान लगाना कठिन है।
उनके अनुसार, अस्पतालों, अनुसंधान संस्थानों और इंजीनियरिंग संस्थानों के बीच सहयोग के साथ-साथ सरकारी निवेश भी बढ़ाया जाना चाहिए। इससे अधिक नमूने एकत्र करने, विभिन्न आबादी समूहों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने और शोध के निष्कर्षों को मजबूत वैज्ञानिक प्रमाणों में बदलने में सहायता मिलेगी।
प्रोफेसर महालिंगम को याद है कि जब उन्होंने पहली बार कैंसर ऊतक जैवभंडार स्थापित करने का प्रस्ताव रखा था, तब उनके कुछ सहयोगियों ने इसके निर्माण और लंबे समय तक संचालन की कठिनाइयों को लेकर चिंता जताई थी। इसके बावजूद उन्होंने इस पहल को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया।
उनका मानना है कि भारत में कैंसर के बढ़ते बोझ से निपटने के लिए अपने मरीजों पर आधारित वैज्ञानिक प्रमाण तैयार करना जरूरी है। स्तन कैंसर के लिए एमआरएनए आधारित प्रायोगिक टीके की दिशा में जारी काम इसी प्रयास का हिस्सा है।
फिलहाल इस अनुसंधान से किसी प्रमाणित टीके या तत्काल उपचार की उम्मीद करना जल्दबाजी होगी। लेकिन भारतीय मरीजों के ट्यूमर की आनुवंशिक विशेषताओं को समझने, संभावित प्रतिरक्षा लक्ष्यों की पहचान करने और भविष्य के उपचारों के लिए आधार तैयार करने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम है। इसकी वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि आगे के प्रयोगों में टीका कितना सुरक्षित और प्रभावी साबित होता है तथा क्या उसके लाभ मनुष्यों में किए जाने वाले परीक्षणों से प्रमाणित हो पाते हैं।

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