देवेन्द्र के. ढुंगाना
भद्रपुर: हाल ही में संपन्न चुनावों ने नेपाली राजनीति में केवल सत्ता परिवर्तन का संकेत नहीं दिया है, बल्कि इसने नागरिकों और राजनीतिक दलों के बीच संबंधों के गहरे पुनर्गठन की आवश्यकता को भी उजागर किया है। लंबे समय से स्थापित पारंपरिक दलों के प्रति जनविश्वास का क्रमशः क्षीण होना और नई शक्तियों के प्रति बढ़ता आकर्षण स्पष्ट संदेश देता है- अब की राजनीति पुराने ढर्रे पर नहीं चल सकती।
यह परिणाम आकस्मिक नहीं है। वर्षों से संचित असंतोष, भ्रष्टाचार के प्रति वितृष्णा, सेवा-प्रवाह की कमजोरी और नेतृत्व की उत्तरदायित्वहीनता ने जनमानस में गहरी निराशा पैदा की है। नागरिकों ने लोकतंत्र पर विश्वास नहीं खोया है, लेकिन उसके अभ्यास पर गंभीर प्रश्न उठाए हैं। यही कारण है कि मतदाताओं ने विकल्प चुना है—यह विकल्प केवल नए दल का नहीं, बल्कि नई सोच, नई शैली और नई राजनीतिक संस्कृति की खोज भी है।
लेकिन यहाँ सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—यदि पारंपरिक दल अब भी नहीं सुधरे, तो नागरिकों और दलों के बीच संबंध कैसे रहेंगे?
इसका सीधा उत्तर है: दूरी और बढ़ेगी। राजनीतिक दल जनता के प्रतिनिधि नहीं, बल्कि सत्ता-केंद्रित समूह के रूप में देखे जाने लगेंगे। जब नागरिकों को यह महसूस होता है कि उनके मत से परिवर्तन संभव नहीं है, तो वे या तो निराश होकर राजनीति से दूर हो जाते हैं, या वैकल्पिक शक्तियों की ओर और अधिक आकर्षित होते हैं। दोनों ही स्थितियाँ लोकतंत्र के लिए जोखिमपूर्ण हैं—पहली जनसहभागिता को घटाती है, दूसरी अस्थिरता की संभावना बढ़ाती है।
युवा पीढ़ी की भूमिका को यहाँ विशेष रूप से समझना आवश्यक है। आज का युवा केवल नारों और भावनाओं तक सीमित नहीं है; वह सूचना-प्रौद्योगिकी से जुड़ा, वैश्विक दृष्टिकोण रखने वाला और प्रश्न करने का साहस रखने वाला वर्ग है। वह अब वंश, विचारधारा या ऐतिहासिक योगदान के आधार पर ही दलों को स्वीकार नहीं करता; वह परिणाम, पारदर्शिता और ईमानदारी की अपेक्षा करता है। यही पीढ़ी पारंपरिक दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। यदि दलों ने इस संकेत को समय रहते नहीं समझा, तो उनका संगठनात्मक आधार कमजोर होता जाएगा।
नई राजनीतिक शक्तियों का उदय आशा जगाता है, लेकिन यह आशा स्वतः स्थायी नहीं होती। इतिहास ने दिखाया है कि केवल सत्ता परिवर्तन से व्यवस्था नहीं बदलती। यदि नया नेतृत्व भी पुरानी शैली अपनाता है, तो जनता का विश्वास फिर टूटेगा। इसलिए वर्तमान चुनौती केवल पुराने दलों के लिए ही नहीं, बल्कि नई शक्तियों के लिए भी समान रूप से गंभीर है।
पारंपरिक दलों के संदर्भ में सुधार की पहली शर्त है—ईमानदार आत्मसमीक्षा। अतीत की गलतियों को स्वीकार किए बिना सुधार संभव नहीं है। नेतृत्व चयन में पारदर्शिता, नीतिगत स्पष्टता और कार्यान्वयन में दृढ़ता आवश्यक है। दलों के भीतर गुटबंदी, स्वार्थ-केंद्रित राजनीति और संरक्षणवादी संस्कृति को तोड़े बिना कोई भी सुधार सतही ही रहेगा।
भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई इस प्रक्रिया के केंद्र में होनी चाहिए। कानूनी कार्रवाई केवल विरोधियों पर नहीं, बल्कि अपने दल के दोषियों पर भी समान रूप से लागू होनी चाहिए। जब तक न्याय निष्पक्ष और प्रभावी नहीं होगा, तब तक लोकतंत्र पर जनविश्वास पुनर्स्थापित नहीं हो सकता।
इसके साथ ही सेवा-प्रवाह में सुधार अत्यंत आवश्यक है। जब तक नागरिकों के दैनिक जीवन में परिवर्तन महसूस नहीं होगा, तब तक राजनीतिक प्रतिबद्धताएँ केवल भाषण तक सीमित रहेंगी। स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और बुनियादी सेवाओं में सुधार लाकर ही राजनीति को जनोन्मुख बनाया जा सकता है।
दूसरी ओर, नागरिक समाज और कार्यकर्ताओं की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। अंध-समर्थन की संस्कृति अब टिकाऊ नहीं है। कार्यकर्ताओं को पार्टी के प्रति निष्ठावान रहते हुए भी सत्य और नैतिकता के पक्ष में खड़ा होना चाहिए। यही संस्कृति दलों को भीतर से मजबूत बनाएगी।
नेतृत्व का पीढ़ीगत परिवर्तन भी एक अनिवार्य पहलू है। वही पुराने चेहरों के इर्द-गिर्द घूमती राजनीति अब लंबे समय तक टिक नहीं सकती। नई पीढ़ी को अवसर देना केवल विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता है। लेकिन यह परिवर्तन केवल उम्र के आधार पर नहीं, बल्कि क्षमता, दृष्टि और नैतिकता के आधार पर होना चाहिए।
अंततः, वर्तमान स्थिति संकट और अवसर दोनों है। यदि दल समय के संकेतों को समझकर स्वयं को रूपांतरित करते हैं, तो नागरिकों और दलों के बीच संबंध पुनः विश्वास पर आधारित हो सकते हैं। अन्यथा, यह दूरी इतनी बढ़ सकती है कि दलों का अस्तित्व ही संकट में पड़ जाए।
नेपाली राजनीति इस समय एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। यहाँ से आगे जाने के केवल दो रास्ते हैं- सुधार और पुनर्जागरण, या पतन और विस्थापन। निर्णय दलों के हाथ में है, लेकिन परिणाम अंततः जनता ही तय करेगी।











