– देवेंद्र के. ढुंगाना
भद्रपुर : प्राकृतिक आपदा से नेपाल और चीन के बीच प्रमुख व्यापारिक नाका ग्यिरोंग बंदरगाह के गंभीर रूप से प्रभावित होने के बाद चीन की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के तहत प्रस्तावित तिब्बत–काठमांडू रेल परियोजना को लेकर भी नए सवाल उठने लगे हैं।
गत 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन से नेपाल के विभिन्न क्षेत्रों में भारी क्षति होने की बात सामने आई है। इस आपदा में बड़े पैमाने पर जनधन की क्षति के साथ-साथ पहाड़ी सड़कें, पुल और बस्तियां तबाह हुई हैं। इससे चीन–नेपाल के बीच महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग भी प्रभावित हुआ है।
ग्यिरोंग नाका केवल चीन और नेपाल के बीच व्यापार के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि कैलाश–मानसरोवर यात्रा के लिए भी यह एक प्रमुख मार्ग है। नाका और आसपास के बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान से नेपाल के व्यापार, पर्यटन और समग्र अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ने की चिंता बढ़ गई है।
तिब्बत–काठमांडू रेल : वर्षों से कागजों तक सीमित परियोजना
चीन से नेपाल की राजधानी काठमांडू तक रेलमार्ग विस्तार की अवधारणा वर्ष 2016 से ही चर्चा में है। प्रस्तावित तिब्बत–काठमांडू रेलमार्ग लगभग 550 किलोमीटर लंबा होगा और इसमें नेपाल की ओर का हिस्सा करीब 72 किलोमीटर होने की बात कही गई है।
हिमालय की अत्यंत कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण परियोजना के बड़े हिस्से का निर्माण सुरंगों और पुलों के माध्यम से करना पड़ेगा। लगभग 5.5 अरब अमेरिकी डॉलर की अनुमानित लागत वाली इस परियोजना को तकनीकी और आर्थिक दोनों दृष्टियों से बेहद चुनौतीपूर्ण माना जाता है।
विशेष रूप से भूकंपीय जोखिम, कमजोर भूगर्भीय संरचना, तीव्र ढलान, भूस्खलन और बाढ़ की आशंका वाले हिमालयी क्षेत्र में इतनी बड़ी रेल अवसंरचना का निर्माण अपने आप में जटिल विषय है। हाल की प्राकृतिक आपदाओं ने ऐसी परियोजनाओं की दीर्घकालीन सुरक्षा और टिकाऊपन को लेकर बहस को और तेज कर दिया है।
ग्यिरोंग की तबाही से मिला चेतावनी का संदेश
हिमालयी क्षेत्र में सड़क, पुल, सुरंग या रेलमार्ग जैसी बड़ी अवसंरचनाओं का निर्माण करते समय स्थानीय भूगोल और पर्यावरणीय संवेदनशीलता को पर्याप्त महत्व देने की आवश्यकता पर विशेषज्ञ लगातार जोर देते रहे हैं।
अपर्याप्त भूगर्भीय अध्ययन, अव्यवस्थित निर्माण और प्राकृतिक जोखिमों का सही आकलन किए बिना आगे बढ़ाई गई अवसंरचनात्मक परियोजनाएं आपदा के समय भारी नुकसान का कारण बन सकती हैं। ग्यिरोंग क्षेत्र में दिखाई दी तबाही ने यह सवाल और महत्वपूर्ण बना दिया है कि हिमालय में बड़े बुनियादी ढांचे का निर्माण केवल ‘किया जा सकता है या नहीं’ तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि यह भी देखा जाना चाहिए कि वह ‘दीर्घकालीन रूप से सुरक्षित और टिकाऊ होगा या नहीं’।
इस परियोजना के संभावित पर्यावरणीय और रणनीतिक प्रभाव केवल नेपाल तक सीमित नहीं रहने की बात भी उठाई जाती रही है। हिमालय से निकलने वाली नदी प्रणालियों और निचले तटीय क्षेत्रों पर संभावित प्रभाव के कारण भारत सहित निचले भूभाग वाले देश भी ऐसी परियोजनाओं पर करीब से नजर रखते हैं।
चीन का निवेश और नेपाल की अपेक्षा
नेपाल चीन से रेल परियोजना को अनुदान के माध्यम से निर्माण कराने की अपेक्षा रखता आया है। लेकिन परियोजना की विशाल लागत, कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और संभावित आर्थिक प्रतिफल को देखते हुए चीन की ओर से अब तक बड़े वित्तीय निवेश की सार्वजनिक रूप से कोई स्पष्ट प्रतिबद्धता सुनिश्चित नहीं हुई है।
ऐसे में प्राकृतिक आपदा और उससे हुए बुनियादी ढांचे के नुकसान से परियोजना की लागत, निर्माण अवधि और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां और जटिल हो सकती हैं।
ग्यिरोंग नाका चीन–नेपाल के बीच व्यापारिक संबंधों का एक महत्वपूर्ण प्रवेशद्वार है। इसलिए यहां हुए नुकसान ने तत्कालीन व्यापारिक गतिविधियों के साथ-साथ भविष्य में प्रस्तावित बड़ी अवसंरचना परियोजनाओं की व्यवहार्यता और प्राथमिकता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
अब चीन और नेपाल को पुनर्विचार करने का समय?
हिमालय की संवेदनशील भौगोलिक परिस्थितियों में तीव्र आर्थिक विकास के लक्ष्य और प्राकृतिक पर्यावरण के बीच संतुलन कायम करना सबसे बड़ी चुनौती है।
केवल तत्काल आर्थिक लाभ और रणनीतिक उद्देश्यों के आधार पर बड़ी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के बजाय भूगर्भीय जोखिम, पर्यावरणीय प्रभाव, जलवायु परिवर्तन, आपदा प्रबंधन, निर्माण लागत और दीर्घकालीन आर्थिक संभावनाओं का समग्र मूल्यांकन आवश्यक दिखाई देता है।
ग्यिरोंग में हुई तबाही ने एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है—हिमालय में अवसंरचना निर्माण के दौरान यदि प्रकृति की अनदेखी की गई, तो उसकी कीमत बेहद महंगी पड़ सकती है।
इसलिए तिब्बत–काठमांडू रेल परियोजना को आगे बढ़ाने या न बढ़ाने का निर्णय केवल चीन और नेपाल के रणनीतिक संबंधों का विषय नहीं रह गया है। यह प्राकृतिक सुरक्षा, पर्यावरणीय स्थिरता और भावी पीढ़ियों के हित से जुड़ा विषय भी बन चुका है।
प्राकृतिक आपदा से मिली इस चेतावनी को गंभीरता से लेते हुए चीन और नेपाल को परियोजना की व्यवहार्यता तथा जोखिमों के संबंध में एक बार फिर गहन अध्ययन करना आवश्यक दिखाई देता है। अन्यथा हिमालय की संवेदनशील भौगोलिक परिस्थितियों में आज के विकास का सपना कल की किसी बड़ी आपदा का कारण बन सकता है—इस जोखिम को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।





