पहली बार हार की पीड़ा और दूसरी बार संतोष के साथ विदा हुए लियोनल मेसी

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​नई दिल्ली: फुटबॉल जगत में कुछ संन्यास केवल एक खिलाड़ी के जाने की खबर न होकर एक पूरे युग के समापन का अहसास कराते हैं। लियोनल मेसी द्वारा अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल से दूसरी बार संन्यास लेना भी वैसा ही एक क्षण है। लगभग एक दशक के अंतराल में मेसी ने दूसरी बार अर्जेंटीना की जर्सी छोड़ने का फैसला किया है, लेकिन इन दोनों मौकों की कहानी बिल्कुल अलग-अलग रही है। पहली बार वह मानसिक रूप से ध्वस्त खिलाड़ी थे, जिन्हें लगातार हार ने भीतर से खोखला कर दिया था। वहीं दूसरी बार वह ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने अपने देश के लिए लगभग हर सपना पूरा किया है।
​साल था २०१६, कोपा अमेरिका का फाइनल। अर्जेंटीना के सामने प्रतिद्वंद्वी टीम के रूप में चिली थी। मेसी की टीम एक बार फिर खिताब जीतने से चूक गई थी। वह केवल एक मैच की हार नहीं थी। उससे पहले भी मेसी ने अर्जेंटीना को बड़े फाइनल तक पहुँचाया था, लेकिन हर बार टीम ट्रॉफी जीतने से चूक जाती थी। न्यू जर्सी के मेटलाइफ स्टेडियम में उस रात मेसी चरम निराश दिखे थे। वह पेनाल्टी शूटआउट में गेंद को नेट में नहीं डाल सके थे और चिली चैंपियन बन गया था। मेसी के लिए वह लगातार तीसरा बड़ा फाइनल था, जिसमें अर्जेंटीना पराजित हुआ था। उस मैच के बाद मेसी के फैसले ने फुटबॉल जगत में हलचल मचा दी थी। उन्होंने कहा था, “राष्ट्रीय टीम मेरे लिए समाप्त हो चुकी है। यह चौथा फाइनल है और मैं जीत नहीं सका। मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की। इससे अन्य किसी की तुलना में मुझे अधिक दुख हुआ और यह स्पष्ट हो गया है कि यह मेरे लिए नहीं है।”
​इस तरह मेसी ने २९ साल की उम्र में ही अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल से संन्यास की घोषणा कर दी थी। वह कोई चोट या उम्र की वजह से लिया गया फैसला नहीं था। वह लगातार असफलता और खुद पर बने दबाव के कारण मानसिक रूप से टूट चुके एक महान फुटबॉलर का फैसला था। मेसी के उस फैसले की दुनियाभर में चर्चा हुई थी। उनके सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी माने जाने वाले क्रिस्टियानो रोनाल्डो ने भी अर्जेंटीनी कप्तान की व्यथा को समझने का प्रयास किया था। रोनाल्डो ने उस समय कहा था, “मेसी ने कठिन फैसला लिया है और लोगों को इसे समझना चाहिए। उन्हें हार और निराशा की आदत नहीं है। यहाँ तक कि उनके लिए दूसरे स्थान पर रहना भी आसान नहीं है। इसके अलावा पेनाल्टी मिस करने से कोई खिलाड़ी खराब नहीं बन जाता।” यह मेसी-रोनाल्डो प्रतिद्वंद्विता का एक अलग पहलू था। मैदान पर एक-दूसरे के कट्टर प्रतिद्वंद्वी होने के बावजूद रोनाल्डो ने कहा था, “मेसी को रोते हुए देखकर दुख होता है। मुझे उम्मीद है कि वह जल्द ही अपने देश के लिए लौटेंगे क्योंकि अर्जेंटीना को उनकी जरूरत है।”
​संन्यास की घोषणा करने के बाद भी मेसी ज्यादा समय तक अर्जेंटीनी टीम से दूर नहीं रह सके। संपूर्ण विश्व के साथ अर्जेंटीनी राष्ट्रपति की अपील के बाद वह उसी साल के अंत में राष्ट्रीय टीम में लौट आए। देश, प्रशंसकों और टीम के साथियों के प्यार के कारण वह फिर से अर्जेंटीनी जर्सी में लौटे। मेसी का राष्ट्रीय टीम में लौटना केवल एक वापसी न होकर एक नई कहानी की शुरुआत थी, जिसका अंत फुटबॉल इतिहास हमेशा याद रखेगा। संन्यास से लौटने के बाद मेसी ने २०२१ में राष्ट्रीय टीम के साथ कोपा अमेरिका का खिताब जीता। ब्राजील के खिलाफ मारकाना स्टेडियम में मिली उस जीत ने उनके करियर की सबसे बड़ी पीड़ा का अंत कर दिया, लेकिन असली लक्ष्य अभी बाकी था।
​साल २०२२ में कतर में मेसी ने वह चमत्कार करके दिखाया, जिसका इंतजार अर्जेंटीना और प्रशंसकों को सालों से था। लुसैल स्टेडियम में फ्रांस के खिलाफ फाइनल में अर्जेंटीना ने पेनाल्टी शूटआउट में जीत हासिल की और मेसी ने फीफा विश्व कप ट्रॉफी उठाई। जिस खिलाड़ी ने २०१६ में अपने देश के लिए ट्रॉफी न जीत पाने की बात कही थी, वही खिलाड़ी ६ साल बाद विश्व के सबसे बड़े मंच पर विश्व चैंपियन बन चुका था। इसके बाद अर्जेंटीना ने २०२४ में भी कोपा अमेरिका का खिताब जीता। इस प्रकार जिस मेसी के लिए २०१६ में अर्जेंटीना की जर्सी यंत्रणा का प्रतीक बनी थी, उसी जर्सी में उन्होंने विश्व और दक्षिण अमेरिका दोनों पर राज किया।
​मेसी ने लगभग १० साल बाद एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल से विदा ली। फीफा विश्व कप २०२६ के फाइनल में अर्जेंटीना को स्पेन के खिलाफ हार का सामना करना पड़ा। अंततः वही मैच मेसी के करियर का अंतिम अंतरराष्ट्रीय मैच साबित हुआ। इस बार तस्वीर बिल्कुल अलग थी। २०१६ में मेसी के आँसुओं में पछतावा और अधूरापन था, जबकि २०२६ में उनकी आँखों में एक लंबी यात्रा के समाप्त होने का भाव था। वह उस टीम को छोड़ रहे हैं, जिसके साथ उन्होंने विश्व कप, कोपा अमेरिका और कई बड़े गौरव हासिल किए। इस बीच उनके पिता और लंबे समय तक सलाहकार रहे जॉर्ज मेसी के निधन ने इस विदाई को और भी भावुक बना दिया।

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