नेपाल–चीन संबंधों में उभरी असहज स्थिति

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देवेन्द्र किशोर ढुंगाना

भद्रपुर: नेपाल–चीन संबंध इस समय एक बार फिर संवेदनशील मोड़ पर खड़े हैं। हाल के दिनों में चेन सोग की सक्रियता ने न केवल कूटनीतिक दायरे में बल्कि समग्र राजनीतिक बहस में भी हलचल पैदा कर दी है। गृहमंत्री के साथ उनकी मुलाकात और उस दौरान तिब्बत और ताइवान जैसे मुद्दों पर दिए गए स्पष्ट संदेश को लेकर कई तरह की व्याख्याएं सामने आ रही हैं। सवाल उठ रहा है- क्या यह सामान्य कूटनीतिक संवाद था, या नेपाल पर बढ़ते रणनीतिक दबाव का संकेत?
नेपाल ने हमेशा “वन चाइना पॉलिसी” के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। नेपाल और चीन के बीच संबंध ऐतिहासिक रूप से मैत्रीपूर्ण और पारस्परिक सम्मान पर आधारित माने जाते हैं। लेकिन कूटनीतिक मर्यादा से ऊपर उठती दिखने वाली गतिविधियों ने इस संतुलन पर सूक्ष्म लेकिन गंभीर सवाल खड़े किए हैं। विशेष रूप से तिब्बत और ताइवान जैसे संवेदनशील मुद्दों पर खुले तौर पर संदेश देना, नेपाल जैसे संप्रभु देश की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है।
इतना ही नहीं, इंडिया में होने वाले तिब्बती नेता के शपथ ग्रहण समारोह में नेपाल की किसी भी स्तर पर भागीदारी न हो, इस संबंध में चीन की स्पष्ट चेतावनी ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। कूटनीति में मित्र देशों के बीच चिंता और रुचि व्यक्त करना स्वाभाविक है, लेकिन जब इसे “निर्देश” या “चेतावनी” के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो यह संबंधों में असहजता पैदा करता है। इससे नेपाल एक कठिन स्थिति में खड़ा हो गया है, जहाँ एक ओर पड़ोसी शक्तियों की संवेदनशीलताएँ हैं, तो दूसरी ओर अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का प्रश्न।
इसी संदर्भ में बालेन शाह के नेतृत्व वाली सरकार पर बाहरी प्रभाव बढ़ाने की कोशिशों को लेकर आशंकाएँ भी चर्चा में हैं। हालांकि “नेपाल फर्स्ट” की अवधारणा को आगे बढ़ाने वाले वर्तमान परिदृश्य में जनता के बीच एक अपेक्षा स्पष्ट रूप से दिखती है—नेपाल अपने राष्ट्रीय स्वाभिमान से समझौता किए बिना पड़ोसी देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखे।
नेपाल की विदेश नीति का मूल आधार संतुलन ही रहा है। दक्षिण में भारत और उत्तर में चीन जैसे दो बड़े देशों के बीच स्थित भूराजनीतिक वास्तविकता ने नेपाल को हमेशा संवेदनशील बनाए रखा है। ऐसे में किसी एक पक्ष के अत्यधिक दबाव को स्वीकार करना दीर्घकालीन राष्ट्रीय हित में नहीं हो सकता। इसलिए चीन के साथ संबंधों को मजबूत रखते हुए भारत के साथ ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संबंधों को भी समान रूप से संतुलित करना आवश्यक है।
चीन की चिंताओं की पृष्ठभूमि को समझना भी जरूरी है। तिब्बत से संबंधित किसी भी अंतरराष्ट्रीय गतिविधि को बीजिंग अपने आंतरिक मामले के रूप में देखता है। यही कारण है कि नेपाल की किसी भी प्रतीकात्मक भागीदारी को वह गंभीरता से लेता है। लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि नेपाल को अपनी विदेश नीति स्वतंत्र रूप से संचालित करने का अधिकार है। इसी संतुलन को बनाए रखना नेपाल की कूटनीतिक परिपक्वता की असली परीक्षा है।
इस घटनाक्रम ने नेपाली राजनीति में एक गंभीर सवाल खड़ा किया है- क्या नेपाल अपने निर्णय स्वयं लेने में सक्षम है, या बाहरी प्रभाव लगातार बढ़ रहा है? विश्लेषकों का मानना है कि यदि ऐसी घटनाएँ बार-बार होती रहीं, तो इससे नीतिगत स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। इसलिए सरकार के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वह पारदर्शी और स्पष्ट रुख अपनाए, ताकि जनता का विश्वास बना रहे।
विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण से देखा जाए तो वर्तमान स्थिति केवल चुनौतीपूर्ण ही नहीं, बल्कि अवसर भी है। यह नेपाल के लिए अपनी कूटनीतिक क्षमता दिखाने का समय है। मित्र देशों के साथ संबंध खराब करना समझदारी नहीं है, लेकिन अपने स्वाभिमान की रक्षा करते हुए स्पष्ट रुख अपनाना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। “संतुलित विदेश नीति” केवल नारे तक सीमित न रहकर व्यवहार में भी दिखाई देनी चाहिए।
अंततः, नेपाल–चीन संबंध किसी एक घटना से तय होने वाले नहीं हैं। ये दीर्घकालीन विश्वास, सम्मान और पारस्परिक हितों पर आधारित रहने चाहिए। लेकिन ऐसे संवेदनशील क्षण संबंधों की वास्तविकता को उजागर करते हैं। आज की सबसे बड़ी चुनौती यही है- दबाव और संबंधों के बीच संतुलन बनाए रखते हुए नेपाल अपनी स्वतंत्र पहचान और निर्णय क्षमता को सुरक्षित रख पाएगा या नहीं।
इसका उत्तर केवल सरकार की कूटनीतिक रणनीति में ही नहीं, बल्कि समग्र राजनीतिक परिपक्वता और राष्ट्रीय एकता में निहित है।

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