नई दिल्ली: बांग्लादेश अपनी सैन्य क्षमता के विस्तार के लिए पाकिस्तान और चीन के साथ रक्षा संबंधों को एक नई ऊंचाई पर ले जा रहा है। विशेष रूप से वायु सेना के क्षेत्र में पाकिस्तान के साथ सहयोग और रक्षा तकनीक में चीन की मदद लेने के ढाका के इस कदम ने क्षेत्रीय भू-राजनीति में हलचल पैदा कर दी है।
पाकिस्तान के साथ सैन्य प्रशिक्षण समझौता
बांग्लादेशी वायु सेना (बीएएफ) और पाकिस्तान वायु सेना के बीच पायलटों और तकनीशियनों के प्रशिक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर होने जा रहे हैं। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य बांग्लादेशी पायलटों को उन्नत सैन्य प्रशिक्षण प्रदान करना और दोनों देशों के बीच रक्षा साझेदारी में विविधता लाना है। फरवरी २०२६ के चुनावों के बाद बनी बीएनपी (बीएनपी) के नेतृत्व वाली नई सरकार ने भी पूर्ववर्ती अंतरिम सरकार द्वारा शुरू किए गए पाकिस्तान के साथ सैन्य सहयोग को जारी रखा है। हाल ही में पाकिस्तानी सैन्य अधिकारियों के एक प्रतिनिधिमंडल ने गाजीपुर स्थित ‘बांग्लादेश मशीन टूल्स फैक्ट्री लिमिटेड’ का दौरा कर उत्पादन प्रक्रियाओं और भविष्य के सहयोग पर चर्चा की है।
चीन की एंटी-ड्रोन तकनीक और रडार प्रणाली
सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए बांग्लादेश सेना ढाका छावनी क्षेत्र में अत्याधुनिक एंटी-ड्रोन एकीकृत प्रणाली (सी-यूएएस और सी-यूएभी) तैनात करने की योजना बना रही है। इसके लिए चीनी विशेषज्ञों ने अप्रैल २०२६ के अंतिम सप्ताह में लगभग २० सैन्य अधिकारियों और सैनिकों को विशेष प्रशिक्षण दिया है। यह प्रणाली रडार, रेडियो फ्रीक्वेंसी स्कैनर और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल कैमरों के जरिए दुश्मन के ड्रोन का पता लगाने, उन पर नजर रखने और उन्हें जाम या निष्क्रिय करने में सक्षम है। इसे सुरक्षा की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण ‘लेयर्ड एप्रोच’ माना जा रहा है।
क्षेत्रीय सुरक्षा और भारत पर प्रभाव
बांग्लादेश की पाकिस्तान और चीन के साथ बढ़ती यह सैन्य निकटता भारत के लिए चिंता का विषय बन सकती है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि एक तरफ पाकिस्तान के साथ पायलट ट्रेनिंग और दूसरी तरफ चीनी रडार तकनीक का विस्तार दक्षिण एशिया के सामरिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है। यह विकास न केवल रक्षा साझेदारी के बदलते स्वरूप को दर्शाता है, बल्कि इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती पैठ की ओर भी संकेत करता है।









