देवेन्द्र के. ढुंगाना
काठमांडू: काठमांडू की नदी किनारों पर दशकों से बसे सुकुम्बासी बस्तियों को हटाने के सरकारी कदम ने एक बार फिर नेपाली राजनीति को गहरे विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है। थापाथली, गैरीगाउँ और मनहरा क्षेत्रों में डोज़र चलाकर बस्तियाँ खाली कराने की कार्रवाई को सरकार ने सार्वजनिक भूमि वापस लेने, जोखिमपूर्ण बसावट हटाने और “असली–नकली” सुकुम्बासियों की पहचान करने के अभियान के रूप में प्रस्तुत किया है। लेकिन इसके क्रियान्वयन की शैली, समय और संवेदनशीलता की कमी के कारण व्यापक आलोचना हो रही है।
नेपाल में सुकुम्बासी समस्या कोई नई नहीं है। पंचायत व्यवस्था के समय से ही भूमि प्रबंधन और आवास अधिकार का सवाल राजनीतिक नारों तक सीमित रहा है। बहुदलीय व्यवस्था आने के बाद भी विभिन्न सरकारों ने आयोग बनाए, आंकड़े जुटाए और पुनर्वास योजनाएँ घोषित कीं, लेकिन वे प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो सकीं। इस दौरान सुकुम्बासी समस्या राजनीतिक दलों के लिए वोट बैंक का साधन बनती गई। चुनाव के समय वादे करना और बाद में भूल जाना—इस प्रवृत्ति ने समस्या को और जटिल बना दिया।
इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में बालेन शाह के नेतृत्व वाली सरकार के वर्तमान कदम को देखना आवश्यक है। स्वतंत्र छवि के साथ उभरे बालेन शाह से युवा वर्ग, शहरी मध्यम वर्ग और परिवर्तन की चाह रखने वाले नागरिकों को काफी उम्मीदें थीं। “जनरेशन जेड” की ऊर्जा और वैकल्पिक राजनीति के प्रतीक के रूप में उनकी पहचान बनी। लेकिन सुकुम्बासी बस्तियों को हटाने के इस निर्णय ने उनकी राजनीतिक परिपक्वता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सरकार का तर्क स्पष्ट है—नदी किनारों पर अवैध बसावट बाढ़ के जोखिम को बढ़ाती है, सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण होता है और शहरी योजना प्रभावित होती है। ये तर्क तथ्यात्मक हैं। लेकिन असली सवाल इसके मानवीय पक्ष का है। जब हजारों लोगों को कम समय में विस्थापित किया जाता है, तो उनके जीवन, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पर पड़ने वाले प्रभावों को पर्याप्त रूप से संबोधित किया गया है या नहीं—यह एक गंभीर प्रश्न बन जाता है।
वर्तमान विरोध का मूल कारण भी यही है। मानवाधिकार संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और नागरिक समाज ने इस कदम को “असंवेदनशील” बताया है। आरोप है कि सुकुम्बासियों के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किया गया, उन्हें वैकल्पिक व्यवस्था दिए बिना बल प्रयोग किया गया और संवाद की कमी रही। यदि सरकार पहले स्पष्ट पुनर्वास योजना लाती और प्रभावित समुदाय से सहमति बनाती, तो शायद इतना विरोध नहीं होता।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह कदम बालेन सरकार को दोराहे पर खड़ा करता है। एक ओर यह उन्हें सख्त निर्णय लेने वाले प्रशासक के रूप में प्रस्तुत करता है, तो दूसरी ओर कमजोर और हाशिए पर पड़े वर्गों के प्रति संवेदनहीनता का आरोप उनकी लोकप्रियता को नुकसान पहुँचा सकता है।
नेपाल के राजनीतिक इतिहास में ऐसे फैसलों के दूरगामी प्रभाव देखे गए हैं। माओवादी आंदोलन के बाद सत्ता में आने पर अपेक्षानुसार जनमुखी बदलाव न ला पाने से जनविश्वास में गिरावट आई थी। उसी तरह, यदि वर्तमान सरकार भी न्याय, समानता और सम्मान जैसे मूल अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पाती, तो उसे राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।
इस मुद्दे से सरकार के भीतर वैचारिक टकराव भी बढ़ सकता है। एक पक्ष विकास, कानून और व्यवस्था को प्राथमिकता देगा, जबकि दूसरा पक्ष सामाजिक न्याय, समावेशन और मानवाधिकार को केंद्र में रखने की बात करेगा। यदि इन दोनों के बीच संतुलन नहीं बन पाया, तो नीति निर्माण में अस्थिरता आ सकती है।
सुकुम्बासी समस्या का समाधान केवल डोज़र चलाने से संभव नहीं है। इसके लिए बहुआयामी दृष्टिकोण जरूरी है—भूमि सुधार, सस्ती आवास योजनाएँ, रोजगार के अवसर और सामाजिक सुरक्षा जैसे उपाय साथ-साथ लागू करने होंगे। साथ ही “असली” और “नकली” सुकुम्बासियों की पहचान की प्रक्रिया पारदर्शी और न्यायसंगत होनी चाहिए, अन्यथा नए विवाद जन्म लेंगे।
अंततः, यह परिस्थिति बालेन शाह सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षा है। उन्हें केवल एक प्रशासक नहीं, बल्कि संवेदनशील और दूरदर्शी नेता के रूप में खुद को स्थापित करना होगा। सुकुम्बासी समस्या सिर्फ प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और मानवाधिकार से जुड़ा प्रश्न है।
यदि सरकार इसे अवसर के रूप में लेकर न्यायपूर्ण और समावेशी समाधान की दिशा में आगे बढ़ती है, तो यह कदम इतिहास में सकारात्मक बदलाव के रूप में दर्ज हो सकता है। अन्यथा, डोज़र की गूंज के साथ उठता असंतोष सरकार की राजनीतिक नींव को कमजोर कर सकता है।










