शी चिनफिंग की शक्ति, आंतरिक राजनीति और विश्व रणनीति की नई दिशा
देशबंधु विश्वमित्र
चीन की सर्वोच्च सैन्य संरचना सेंट्रल मिलिट्री कमीशन (सीएमसी) से वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों झांग युशिया और लियू झेनली को हटाने के फैसले ने चीन की घरेलू राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। अनुशासन उल्लंघन और कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति निष्ठा पर सवाल उठने के कारण लंबे समय से जांच के दायरे में रहे इन दोनों अधिकारियों को नेशनल पीपुल्स कांग्रेस की स्थायी समिति द्वारा औपचारिक रूप से पद से हटाए जाने के बाद चीन के सैन्य नेतृत्व के भीतर चल रहे सत्ता पुनर्गठन को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं।

झांग युशिया चीनी सेना के सबसे वरिष्ठ वर्दीधारी अधिकारियों में से एक थे, जबकि लियू झेनली संयुक्त स्टाफ विभाग के प्रमुख थे। दोनों के पास लंबा सैन्य अनुभव था और उन्हें चीनी सेना के भीतर बेहद प्रभावशाली माना जाता था। उनकी बर्खास्तगी को केवल अनुशासनात्मक कार्रवाई के रूप में देखना इस घटनाक्रम की पूरी तस्वीर पेश नहीं करता। यह चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अधीन सेना यानी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी पर पूर्ण राजनीतिक नियंत्रण बनाए रखने के राष्ट्रपति शी चिनफिंग के प्रयास को भी दर्शाता है।
शी चिनफिंग ने वर्ष 2012 में पार्टी का नेतृत्व संभालने के बाद से भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को राजनीतिक शुद्धिकरण के एक महत्वपूर्ण औजार के रूप में इस्तेमाल किया है। हाल के वर्षों में रक्षा मंत्रालय, रॉकेट फोर्स और शीर्ष सैन्य नेतृत्व के खिलाफ की गई कार्रवाइयां संकेत देती हैं कि चीनी सेना में केवल भ्रष्टाचार ही नहीं, बल्कि सत्ता संतुलन और राजनीतिक निष्ठा का सवाल भी गंभीर बन गया है। वरिष्ठ अधिकारियों को लगातार हटाए जाने से स्पष्ट होता है कि शी सेना पर अपना नियंत्रण और मजबूत करना चाहते हैं।
हालांकि, इसका एक दूसरा पहलू भी है। चीन जैसी महाशक्ति के सैन्य नेतृत्व में बार-बार होने वाले उच्चस्तरीय फेरबदल से निर्णय लेने की प्रक्रिया में अस्थायी अनिश्चितता पैदा हो सकती है। विशेष रूप से ताइवान, दक्षिण चीन सागर, अमेरिका-चीन रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और भारत के साथ सीमा विवाद जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सैन्य नेतृत्व की स्थिरता बेहद महत्वपूर्ण है। नेतृत्व परिवर्तन से चीन की सैन्य रणनीति में तत्काल कोई बड़ा बदलाव भले न आए, लेकिन आने वाले दिनों में कमान संरचना, सैन्य आधुनिकीकरण और विदेश नीति में नई प्राथमिकताएं दिखाई दे सकती हैं।
दूसरी ओर, यह घटनाक्रम इस सवाल को भी सामने लाता है कि शी चिनफिंग की सत्ता कितनी अधिक केंद्रीकृत होती जा रही है। सीएमसी में शी स्वयं और अनुशासन संबंधी जिम्मेदारी संभालने वाले झांग शेंगमिन के अलावा अन्य शीर्ष अधिकारियों की अनुपस्थिति यह संकेत देती है कि सैन्य नेतृत्व में निर्णय लेने की शक्ति अत्यधिक केंद्रीकृत हो गई है। अल्पावधि में इससे शी और अधिक शक्तिशाली हो सकते हैं, लेकिन दीर्घकाल में संस्थागत संतुलन और सामूहिक नेतृत्व की परंपरा को लेकर बहस तेज हो सकती है।
विश्व राजनीति के लिए इसका महत्व और भी व्यापक है। चीन के सैन्य नेतृत्व में चल रहा पुनर्गठन केवल आंतरिक भ्रष्टाचार पर नियंत्रण तक सीमित रहेगा या इससे चीन के रणनीतिक व्यवहार पर भी असर पड़ेगा, यह एक महत्वपूर्ण सवाल होगा। यदि शी सैन्य ढांचे को और अधिक राजनीतिक रूप से एकजुट कर अपने नियंत्रण में ले आते हैं, तो ताइवान और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर चीन अधिक दृढ़ और आक्रामक रुख अपना सकता है। इसका सीधा प्रभाव अमेरिका, जापान, भारत और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों की सुरक्षा रणनीतियों पर पड़ सकता है।
अंततः, झांग युशिया और लियू झेनली की बर्खास्तगी केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं है; यह चीन की सत्ता राजनीति के भीतर चल रहे गहरे पुनर्गठन का भी एक महत्वपूर्ण संकेत है। शी चिनफिंग के लिए यह सेना को ‘साफ’ करने और उस पर राजनीतिक नियंत्रण को और मजबूत करने का अवसर हो सकता है। लेकिन चीन के लिए यह सैन्य नेतृत्व की स्थिरता, संस्थागत विश्वसनीयता और भविष्य की रणनीतिक दिशा को लेकर नए सवाल भी खड़े करता है। आने वाले दिनों में चीन के भीतर सत्ता संघर्ष और सैन्य पुनर्गठन का विश्व शक्ति संतुलन पर क्या प्रभाव पड़ता है, यह विशेष रूप से निगरानी का विषय बना रहेगा।





