नई दिल्ली: चंद्रमा के दक्षिणी उच्च अक्षांशों में चंद्रयान-३ के प्रज्ञान रोवर द्वारा विश्लेषित की गई मिट्टी की भू-रासायनिक संरचना चंद्रमा के पहले ज्ञात उल्कापिंड से काफी मिलती-जुलती पाई गई है। अहमदाबाद स्थित भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल) के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक नए अध्ययन में यह सामने आया है कि ‘शिव शक्ति’ पॉइंट (चंद्रयान का लैंडिंग स्थल) की मिट्टी चांद की प्राचीन सतह के निर्माण के कई अनसुलझे रहस्यों को खोल सकती है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अनुसार, यह शोध रिपोर्ट प्रतिष्ठित ‘एनपीजे स्पेस एक्सप्लोरेशन’ पत्रिका में प्रकाशित हुई है।
इस अध्ययन के अनुसार, वर्ष १९८१-१९८२ के अभियान के दौरान अंटार्कटिका के एलन हिल्स इलाके में खोजे गए ‘एएलएचए ८१००५’ नामक उल्कापिंड और शिव शक्ति क्षेत्र की मिट्टी, दोनों में ही एल्युमीनियम ऑक्साइड, आयरन ऑक्साइड और मैग्नीशियम ऑक्साइड का मिश्रण लगभग एक जैसी मात्रा में मौजूद है। हालांकि, वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि इन नतीजों का मतलब यह कतई नहीं है कि वह उल्कापिंड इसी शिव शक्ति स्थल से टूटकर आया था, बल्कि इससे यह पता चलता है कि दोनों ही मैग्नीशियम से भरपूर चंद्रमा की प्राचीन सतह (क्रस्ट) और रेगोलिथ के एक जैसे प्रकार को प्रदर्शित करते हैं।
मिट्टी के इस गहन विश्लेषण से यह भी पता चला है कि शिव शक्ति स्टेशन पर मौजूद मिट्टी चंद्रमा की सतह की अलग-अलग परतों से आए पदार्थों का एक जटिल मिश्रण है। इसरो का मानना है कि चंद्रयान-3 मिशन ने शिव शक्ति स्टेशन को चंद्रमा के पहले पहचाने गए उल्कापिंड से जोड़कर, चंद्रमा की सबसे पुरानी सतह के बनने की वैज्ञानिक प्रक्रिया को और अधिक सटीकता से समझने के लिए पूरी दुनिया के अंतरिक्ष विज्ञानियों के लिए एक नया रास्ता खोल दिया है।










