गंगा: आध्यात्मिकता का प्रतीक या प्रदूषण के शिकार एक जलधारा?

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सामान्य लोगों की असचेतना से बढ़ रहा जल प्रदूषण

‎कोलकाता(बेबी चक्रवर्ती): हिमालय की श्वेत शिखरों पर, जहाँ मेघ पर्वतों की गोद में सिर रखकर निद्रा में लीन हो जाते हैं, वहीं छिपी है एक मौन जन्मकथा। हिमपिघलित जल की प्रथम धारा से ही जन्म लेती है पुण्यतोया गंगा। गोमुख हिमनद के अंतराल से झरकर गिरती यह जलधारा मानो प्रकृति की एक पवित्र प्रार्थना है, जो धीरे-धीरे महाकाव्य का रूप धारण करती है।
‎गोमुख से उतरती भागीरथी की धारा शिलाओं को चीरती, घाटियों को पार करती अनंत की ओर अग्रसर होती है। इसके साथ मिलती है अलकनंदा, और देवप्रयाग के पवित्र संगम पर जन्म लेती है ‘गंगा’, जो केवल एक नदी का नाम नहीं, बल्कि सनातन आस्था का प्रतीक है।

‎हिमालय की गोद से निकलकर जब गंगा मैदानों की ओर बढ़ती है, तब वह मात्र नदी नहीं रहती, वह जनजीवन की जीवनरेखा बन जाती है। इसके तटों पर विकसित होती हैं सभ्यता, संस्कृति, व्यापार और आध्यात्मिकता के केंद्र। हरिद्वार के घाटों पर प्रातःकाल सूर्य उदय के साथ हजारों लोग पुण्यस्नान करते हैं, और प्रयागराज के संगम पर तीन पवित्र नदियों का मिलन होता है।
‎इसके पश्चात आता है वाराणसी- समय से भी प्राचीन एक नगरी, जहाँ गंगा स्वयं इतिहास बनकर प्रवाहित होती है। सायंकाल गंगा तट पर आरती के समय दीपों की ज्योति, शंखध्वनि और मंत्रोच्चार से एक अलौकिक वातावरण निर्मित होता है, जो गंगा की पवित्रता का संदेश देता है।
‎किन्तु इस पवित्रता के आड़ में आज एक गहरा संकट छिपा हुआ है। जिस गंगा को ‘माता’ कहा जाता है, उसी के तट पर उपेक्षा का अंबार जमा हो रहा है। पूजा के उपरांत पुष्प, बेलपत्र, प्लास्टिक, प्रतिमाओं के अवशेष बिना किसी विचार के नदी में डाले जा रहे हैं। अनेक स्थानों पर पशु-पक्षियों के मृत शरीर बहते दिखाई देते हैं, और नगरों का अपरिशोधित नाला जल भी इसकी धारा में मिल रहा है। औद्योगीकरण और नगरीकरण के दबाव में गंगा की निर्मलता दिन-प्रतिदिन क्षीण होती जा रही है।
‎जो जलधारा कभी निर्मल और जीवनदायिनी थी, आज अनेक स्थानों पर न तो पीने योग्य रही है और न ही स्पर्श के लिए सुरक्षित। पर्यावरणविदों के अनुसार, यह प्रदूषण केवल नदी के अस्तित्व को ही संकट में नहीं डाल रहा, बल्कि संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर रहा है। मछलियाँ, डॉल्फिन सहित अनेक जलीय जीव अस्तित्व के संघर्ष में लगे हैं। नदी तटवर्ती लोगों का जीवन भी दूषित जल के कारण संकटग्रस्त हो गया है।
‎इस स्थिति से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने विभिन्न कदम उठाए हैं। गंगा शुद्धिकरण योजनाओं तथा ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम के अंतर्गत नाला शोधन संयंत्रों का निर्माण, औद्योगिक अपशिष्ट नियंत्रण और नदी तट संरक्षण के कार्य किए जा रहे हैं।
‎फिर भी प्रश्न बना हुआ है- क्या ये प्रयास पर्याप्त हैं? वास्तविकता यह है कि केवल योजनाएँ पर्याप्त नहीं, बल्कि लोगों की मानसिकता में परिवर्तन आवश्यक है। जिस नदी की पूजा की जाती है, उसकी रक्षा करना भी उतना ही आवश्यक है।
‎समाज के एक वर्ग का मत है कि विदेशों में नदियों या समुद्र को ‘माता’ नहीं कहा जाता, फिर भी वहाँ जल प्रदूषण अपेक्षाकृत कम है। इसके विपरीत यहाँ गंगा को ‘माता’ कहने के बावजूद उसी में विभिन्न प्रकार के अपशिष्ट डालकर प्रदूषण बढ़ाया जा रहा है। गंगासागर में मकर संक्रांति के अवसर पर स्नान के पश्चात वस्त्र विसर्जन तथा पूजा सामग्री का प्रवाह भी प्रदूषण के प्रमुख कारणों में शामिल है।
‎विशेषज्ञों का सुझाव है कि पूजा सामग्री को नदी में न डालकर भूमि पर डालना चाहिए, जिससे वह जैविक खाद के रूप में उपयोगी बन सके और भूमि की उर्वरता बढ़ा सके। इससे जल प्रदूषण को काफी हद तक रोका जा सकता है।
‎आज गंगा एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है—एक ओर उसकी आध्यात्मिक महिमा, तो दूसरी ओर प्रदूषण की काली छाया। इस परिस्थिति में समाज को निर्णय लेना होगा कि वह केवल आचार-विधियों तक सीमित रहेगा या वास्तव में नदी की रक्षा के लिए आगे आएगा।
‎गंगा केवल एक नदी नहीं है, यह एक जीवंत इतिहास और सांस्कृतिक संबंध है। इसकी रक्षा करना हमारे अस्तित्व, पहचान और भविष्य की रक्षा करना है।
‎अतः पुण्यतोया गंगा के समक्ष खड़े होकर पुनः संकल्प लेने की आवश्यकता है, भक्ति के साथ-साथ उत्तरदायित्व की भावना से ही निर्मल गंगा का निर्माण संभव है।

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