क्या हूती विद्रोहियों के खिलाफ सऊदी अरब की मदद के लिए अब जंग में उतरेगा तुर्की?

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अंकारा : सऊदी अरब पर हूती विद्रोहियों के हमले बढ़ने के बीच तुर्की इस बात पर विचार कर रहा है कि मक्का संयुक्त रक्षा समझौते के तहत वह सऊदी अरब की कैसे मदद कर सकता है।
तुर्की के रक्षा मंत्रालय ने गुरुवार को जारी एक बयान में कहा कि सऊदी अरब और पाकिस्तान के साथ हुए समझौते के तहत दी जाने वाली संभावित सैन्य मदद के विकल्प जमीनी जरूरतों के मुताबिक तय किए जाएंगे।
हालांकि, इससे पहले तुर्की की ग्रैंड नेशनल असेंबली (संसद) से मंजूरी लेनी होगी और संवैधानिक प्रक्रिया पूरी करनी होगी। इस सिलसिले में तुर्की की पहली प्राथमिकता मक्का संयुक्त रक्षा समझौते को संसद से मंजूरी दिलाना है।
इसके बाद विदेश में सेना भेजने की अनुमति से जुड़ा प्रस्ताव दोबारा संसद के सामने मंजूरी के लिए रखा जाएगा। दूसरी ओर, तुर्की की योजना सऊदी अरब की जरूरतों और मांगों के मुताबिक मदद का दायरा तय करने की है। फिलहाल सबसे अहम विकल्प सऊदी अरब की रक्षा क्षमता बढ़ाने के लिए हवाई सुरक्षा और दूसरी सैन्य रसद क्षमताओं को सक्रिय करना है।
सऊदी अरब को सैन्य मदद
हूतियों और सऊदी अरब के बीच झड़पें खास तौर पर पिछले दो हफ्तों के दौरान बढ़ी हैं। इन झड़पों में सऊदी अरब के ऊर्जा से जुड़े बुनियादी ढांचे और हवाई अड्डों के साथ कुछ पवित्र जगहों को भी निशाना बनाया गया है।
ईरान समर्थित हूतियों के हमलों पर तुर्की और पाकिस्तान समेत कई देशों ने प्रतिक्रिया दी है। उनसे तुर्की और पाकिस्तान की ओर से “सऊदी अरब को सैन्य मदद देने” के फैसले के बारे में पूछा गया।
इस पर अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा, “मुझे लगता है कि वे सऊदी अरब की मदद करना चाहते हैं और यह अच्छी बात है।”
तुर्की ने खास तौर पर मक्का गठबंधन के तहत सऊदी अरब को सैन्य मदद देने के मुद्दे को अपने एजेंडे में शामिल कर लिया है। राष्ट्रपति रेसेप तैय्यप अर्दोआन और विदेश मंत्री हाकान फिदान ने अपने बयानों से साफ किया है कि इस तरह की मदद देने को लेकर अंकारा में मजबूत राजनीतिक इच्छा है।
अर्दोआन ने १३ अक्टूबर को सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से फोन पर बात की थी। इस दौरान उन्होंने कहा था कि तुर्की, सऊदी अरब के साथ खड़ा रहेगा।
सऊदी अरब को संभावित मदद देने से जुड़ी प्रक्रिया तुर्की के विदेश और रक्षा मंत्रालय मिलकर आगे बढ़ा रहे हैं। रक्षा मंत्रालय के बयान से पता चलता है कि सऊदी अरब की मदद करने के लिए कानूनी और सैन्य स्तर पर किस रास्ते को अपनाया जाएगा।
मंत्रालय के बयान से पता चलता है कि तुर्की की ओर से संभावित सैन्य मदद संवैधानिक प्रावधानों के मुताबिक आगे बढ़ेगी। इसके लिए पहले तुर्की की संसद से मक्का संयुक्त रक्षा समझौते को मंजूरी मिलना जरूरी है। इसके बाद तुर्की के सशस्त्र बलों को विदेश में तैनात करने से जुड़े प्रस्ताव को भी मंजूरी दिलानी होगी।
तुर्की के संविधान के अनुच्छेद ९२ में कहा गया है कि तुर्की की सेना को विदेश भेजने या विदेशी सेनाओं को तुर्की में तैनात करने का अधिकार देश की संसद के पास है। राष्ट्रपति अर्दोआन ने भी १२ अक्टूबर को कहा था कि यह समझौता आने वाले दिनों में संसद के सामने पेश किया जाएगा। समझौते और प्रस्ताव को संसद से मंजूर कराने के लिए साधारण बहुमत काफी है।
कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद सैन्य मदद का स्वरूप कैसे तय होगा, इसे लेकर रक्षा मंत्रालय ने कहा, “संभावित सहयोग का दायरा तय करते समय सऊदी अरब की जरूरतों और मांगों, जमीनी हालात और सैन्य अभियानों की जरूरतों को ध्यान में रखा जाएगा। इस बारे में हमारे संबंधित संस्थानों के आकलन और दोनों पक्षों के बीच बनने वाली सहमति के मुताबिक नियम तय किए जाएंगे।”
तुर्की में हो रहे आकलन के मुताबिक, मदद करते समय उसका मुख्य ध्यान सऊदी अरब की रक्षा क्षमता बढ़ाने पर होगा। इसमें खास तौर पर हवाई सुरक्षा, रसद और खुफिया जानकारी से जुड़ी मदद को प्राथमिकता दी जाएगी।
विदेश मंत्री हाकान फिदान ने ८ अक्टूबर को जो बयान दिया था, उससे इस मुद्दे पर उनके देश का रुख काफी हद तक साफ होता है। फिदान ने कहा था, “मक्का समझौता एक रक्षा समझौता है। यह हमला करने का समझौता नहीं है। जब समझौते का कोई सदस्य हमले का शिकार होता है, तो आप उसकी रक्षा के लिए उसके साथ खड़े होते हैं।” उन्होंने यह भी कहा, “तुर्की किसी दूसरे देश की जमीन पर सेना भेजकर वहां हमला नहीं करेगा।”
तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब के लिए मक्का गठबंधन में साझा रक्षा और दुश्मन को हमला करने से रोकने की क्षमता अहम प्राथमिकताएं हैं। हालांकि, तीनों देशों के बीच हुए समझौते में नाटो के अनुच्छेद पांच जैसा एक सिद्धांत भी शामिल है। इसके मुताबिक, गठबंधन के किसी एक सदस्य पर हुआ हमला सभी सहयोगी देशों पर हमला माना जाएगा।
मक्का गठबंधन में फैसले लेने वाली सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्था ‘रणनीतिक राजनीतिक और रक्षा समिति’ यानी एसएसएसके है। इस समिति ने ५ अक्टूबर को हुई बैठक में सऊदी अरब को तुरंत सैन्य मदद देने का फैसला किया था। हालांकि, मक्का गठबंधन अभी बहुत नया है और इसे संस्था के रूप में तैयार करने की प्रक्रिया भी पूरी नहीं हुई है। इस वजह से सैन्य मदद देने से जुड़े कदमों में समय लगने की बात कही जा रही है।
सऊदी अरब और यमन के बड़े हिस्से पर नियंत्रण रखने वाले हूती विद्रोही के बीच २०१४ से समय-समय पर झड़पें होती रही हैं। अमेरिका और इजराइल की ईरान के साथ लड़ाई के दौरान हूती विद्रोही ने खास तौर पर बाब अल-मंदेब स्ट्रेट से टैंकरों की आवाजाही सीमित करने की कोशिश की।
अमेरिकी मीडिया में ऐसी रिपोर्टें प्रकाशित हुई हैं कि वॉशिंगटन, रियाद के साथ मिलकर हूतियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू करने पर विचार कर रहा है। वहीं, इजराइल भी इस कार्रवाई में खुफिया जानकारी और सैन्य मदद देने जैसे विकल्पों पर विचार कर रहा है।
ईरान के साथ बातचीत भी जारी
इस पूरी प्रक्रिया में तुर्की एक और अहम संतुलन का ध्यान रख रहा है। वह ईरान के साथ अपने रिश्तों में संभावित तनाव से बचना चाहता है। राष्ट्रपति अर्दोआन ने 12 अक्टूबर को कहा था, “तुर्की का रुख, उसकी संवेदनशीलता और जिन सिद्धांतों का हम समर्थन करते हैं, वे सभी साफ हैं। हम कभी भी घटनाओं को नस्लीय या सांप्रदायिक नजरिए से नहीं देखते। हम चाहते हैं कि हमारे पूरे क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनी रहे।”
विदेश मंत्री हाकान फिदान ने १३ अक्टूबर को ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची से फोन पर बात की। इस बातचीत में दोनों नेताओं ने क्षेत्र में बढ़ते तनाव को कम करने के लिए उठाए जाने वाले जरूरी कदमों पर चर्चा की।

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