नई दिल्ली: अमेरिका और इसराइल के साथ जंग शुरू होने के बाद से ही ईरान के सामने यह सवाल बना हुआ है कि देश की वास्तविक सत्ता किसके हाथ में है। औपचारिक तौर पर इसका जवाब साफ़ है कि २८ फरवरी को अपने पिता अली ख़ामेनेई के निधन के बाद मोजतबा ख़ामेनेई देश के नए सर्वोच्च नेता बने हैं। ईरान की इस्लामी गणराज्य व्यवस्था में यह पद सबसे बड़ा माना जाता है और सर्वोच्च नेता के पास युद्ध, शांति और देश की रणनीति से जुड़े हर महत्वपूर्ण मामले पर अंतिम फ़ैसला लेने का अधिकार होता है। हालाँकि, वास्तव में ईरान की राजनीतिक तस्वीर काफी धुंधली नज़र आ रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी ईरान के नेतृत्व को आपस में बंटा हुआ बताया है और संकेत दिया है कि अमेरिका एक ऐसे प्रस्ताव का इंतज़ार कर रहा है जो ईरान में सर्वसम्मति से तैयार किया गया हो।
सत्ता संभालने के बाद से मोजतबा ख़ामेनेई सार्वजनिक रूप से नहीं देखे गए हैं और कुछ लिखित बयानों के अलावा उनके दैनिक नियंत्रण का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिला है। ईरानी अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि वे शुरुआती हमलों में घायल हो गए थे, जबकि न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार उन्हें चेहरे समेत कई जगहों पर चोटें आई हैं, जिसके कारण उन्हें बोलने में कठिनाई हो रही है। ख़ामेनेई के दिवंगत पिता भाषणों और अलग-अलग गुटों के बीच प्रत्यक्ष दख़ल के माध्यम से अपने इरादे ज़ाहिर करते थे, लेकिन अब ऐसे संकेतों की क्षमता गायब दिखती है। इसका नतीजा यह हुआ कि ईरान में फ़ैसले लेने की प्रक्रिया जंग से पहले की तुलना में कम केंद्रीकृत दिखाई दे रही है और यह अनिश्चितता बनी हुई है कि क्या मोजतबा वास्तव में सक्रिय रहकर व्यवस्था चलाने के काबिल हैं।
कागज़ों पर ईरान में कूटनीति की बागडोर राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान और विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची के हाथ में है, लेकिन दोनों में से कोई भी रणनीति तय करते हुए नहीं दिखता है। अराग़ची की भूमिका निर्देश देने के बजाय केवल संचालन करने तक सीमित दिखती है, जबकि ईरानी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व अक्सर संसद अध्यक्ष मोहम्मद बग़र ग़ालिबाफ़ करते नज़र आते हैं। दूसरी ओर, होर्मुज स्ट्रेट पर नियंत्रण जैसे सबसे प्रभावशाली हथियारों का फ़ैसला राजनयिकों के बजाय अहमद वाहिदी के नेतृत्व वाले इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड (आईआरजीसी) के हाथ में है। स्पष्ट राजनीतिक दख़ल के अभाव में आईआरजीसी की ऑपरेशनल स्वायत्तता बढ़ गई है, जिससे देश की वास्तविक शक्ति उन लोगों के पास चली गई है जो पर्दे के पीछे काम करते हैं।
इसी अस्पष्टता के बीच मोहम्मद बग़र ग़ालिबाफ़ एक प्रमुख हस्ती बनकर उभरे हैं। पूर्व आईआरजीसी कमांडर और वर्तमान संसद अध्यक्ष ग़ालिबाफ़ वार्ताओं में सक्रिय रूप से भाग ले रहे हैं और युद्ध को वैचारिक के बजाय व्यावहारिक आधार पर पेश कर रहे हैं। वे ज़ोर देकर कहते हैं कि उनके कार्य मोजतबा ख़ामेनेई की इच्छाओं के मुताबिक़ हैं, फिर भी सर्वोच्च नेता से उनके प्रत्यक्ष तालमेल का कोई स्पष्ट प्रमाण मौजूद नहीं है। इन तमाम परिस्थितियों को देखने पर पता चलता है कि ईरान का सिस्टम काम तो कर रहा है, लेकिन उसके पास पुख़्ता निर्देश नहीं हैं। कूटनीति सक्रिय है पर निर्णायक नहीं, और सेना के पास शक्तियां तो हैं पर रास्ता दिखाने वाला कोई स्पष्ट चेहरा नहीं है। फिलहाल यह व्यवस्था दबाव के बावजूद नियंत्रण बनाए हुए है, लेकिन यह सवाल लगातार उठ रहा है कि क्या वास्तव में तालमेल का पालन हो रहा है या यह सिर्फ़ एक दिखावा है।











