म्यांमार से नेपाल सीमा तक फैलता तस्करी का त्रिकोण, बच्चे से लेकर महिलाएं तक अपराधियों के जाल में
देवेन्द्र के ढुंगाना
भारत के पश्चिम बंगाल स्थित मालदा जिला कभी अपने रसीले और मीठे आमों के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध था। बाद में नकली भारतीय नोटों के कारोबार के कारण यह सुरक्षा एजेंसियों के ध्यान में आया। लेकिन हाल के दिनों में मालदा की पहचान से जुड़ा एक और गंभीर और चिंताजनक विषय सामने आया है। वह है औद्योगिक स्तर पर फैलता नशीले पदार्थों का उत्पादन, प्रसंस्करण और तस्करी का नेटवर्क।
गांव जैसा दिखाई देने वाले कुमारपुर की गलियों में करोड़ों रुपये का अवैध नशीले पदार्थों का कारोबार संचालित होना और इसमें अंतरराज्यीय गिरोहों की संलिप्तता सामने आना भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के लिए भी गंभीर चुनौती बन गया है। इसका प्रभाव केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित रहने की आशंका नहीं है। पूर्वोत्तर भारत से होते हुए बिहार और झारखंड तक फैले नशीले पदार्थों की तस्करी के मार्गों के कारण नेपाल के पूर्वी सीमावर्ती क्षेत्रों में भी सुरक्षा संबंधी चिंताएं बढ़ गई हैं।
मालदा में हाल के दिनों में हुई पुलिस की दो बड़ी कार्रवाइयों ने इस समस्या की गहराई को उजागर किया है। फरवरी 2026 में इंग्लिश बाजार क्षेत्र के अंतर्गत कुमारपुर में पुलिस ने छापेमारी कर लगभग 17 करोड़ भारतीय रुपये मूल्य की ब्राउन शुगर बरामद की थी। इस कार्रवाई में 16 किलो 998 ग्राम ब्राउन शुगर, 8 लाख 78 हजार 500 रुपये नकद तथा नशीले पदार्थों के उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले विभिन्न रासायनिक पदार्थ और उपकरण बरामद किए गए थे। इस मामले में तीन महिलाओं सहित पांच लोगों को गिरफ्तार किया गया था।
पुलिस की प्रारंभिक जांच में आशंका जताई गई थी कि कुमारपुर स्थित एक गैरेज का इस्तेमाल नशीले पदार्थों के उत्पादन और भंडारण केंद्र के रूप में किया जा रहा था। पुलिस के अनुसार बिहार के पूर्णिया और समस्तीपुर से भी कारोबारी वहां नशीले पदार्थ खरीदने पहुंचते थे। इस घटना ने संकेत दिया कि मालदा अब केवल नशीले पदार्थों की आवाजाही का मार्ग नहीं, बल्कि उत्पादन और आपूर्ति केंद्र के रूप में भी विकसित हो रहा है।
इसके बाद 31 अक्टूबर 2026 की रात मालदा के कालियाचक क्षेत्र के मधुघाट के निकट राष्ट्रीय राजमार्ग-12 पर पश्चिम बंगाल पुलिस की विशेष कार्यबल ने एक और महत्वपूर्ण कार्रवाई की। संदिग्ध वाहन को रोककर तलाशी लेने पर 2 किलो 688 ग्राम प्रतिबंधित मॉर्फिन बरामद हुई। इस मामले में अंतरराज्यीय नशीले पदार्थों के नेटवर्क से जुड़े होने के आरोप में चार लोगों को गिरफ्तार किया गया। भारतीय मीडिया के अनुसार बरामद पदार्थ की अवैध बाजार कीमत लगभग तीन करोड़ रुपये आंकी गई है।
इन दोनों घटनाओं को केवल अलग-अलग बरामदगी की घटनाओं के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। एक ही जिले में उत्पादन केंद्र का पता चलना, दूसरी जगह बड़ी मात्रा में प्रतिबंधित पदार्थ के साथ अंतरराज्यीय गिरोह के सदस्यों का पकड़ा जाना और विभिन्न भारतीय राज्यों के लोगों की संलिप्तता सामने आना इस बात की जांच की आवश्यकता पैदा करता है कि उत्पादन, भंडारण, वितरण और बाजार प्रबंधन के बीच कोई संभावित संबंध है या नहीं।
हालांकि दोनों घटनाओं के बीच प्रत्यक्ष संगठनात्मक संबंध स्थापित होने का सार्वजनिक प्रमाण अभी उपलब्ध नहीं है। इसलिए जांच का मुख्य विषय केवल गिरफ्तार किए गए लोग नहीं, बल्कि उन्हें कच्चा माल उपलब्ध कराने वाले, उत्पादन में शामिल लोग, आर्थिक लेन-देन संभालने वाले और अंतिम बाजार तक नशीले पदार्थ पहुंचाने वाले पूरे नेटवर्क को बनाना चाहिए।
मालदा के जिला पुलिस प्रमुख द्वारा मीडिया से बातचीत में मणिपुर, बिहार, झारखंड सहित विभिन्न राज्यों से आरोपियों की गिरफ्तारी और स्थानीय स्तर पर नशीले पदार्थों की बिक्री की जानकारी दिए जाने की खबरें प्रकाशित हुई हैं।
पुलिस जांच में यह आशंका भी सामने आई है कि पूर्वोत्तर भारत के असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम और नागालैंड से कच्चा माल मालदा पहुंचता है और वहां से विभिन्न प्रकार के नशीले पदार्थ तैयार कर पूर्वी भारत के बाजारों में भेजे जाते हैं। इससे पूर्वोत्तर भारत, बंगाल और बिहार के बीच सक्रिय संभावित आपूर्ति नेटवर्क की विस्तृत जांच आवश्यक हो गई है।
भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र लंबे समय से म्यांमार से जुड़े अंतरराष्ट्रीय नशीले पदार्थों की तस्करी के जोखिम का सामना कर रहा है। म्यांमार, लाओस और थाईलैंड के आसपास स्थित गोल्डन ट्रायंगल क्षेत्र से उत्पादित हेरोइन और कृत्रिम नशीले पदार्थ भारत में प्रवेश करते रहे हैं। भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की रिपोर्टों में भी इस बात का उल्लेख मिलता है कि मणिपुर और मिजोरम के सीमावर्ती इलाकों से नशीले पदार्थ भारत में प्रवेश करते हैं और असम सहित अन्य राज्यों के रास्ते विभिन्न बाजारों तक पहुंचते हैं।
भारत के राजस्व खुफिया निदेशालय द्वारा जनवरी 2025 में सार्वजनिक की गई कार्रवाई संबंधी जानकारी के अनुसार म्यांमार से लगी मिजोरम सीमा के रास्ते भारत लाए गए 26 किलो मेथामफेटामिन को असम के कछार जिले से बरामद किया गया था। इसकी अंतरराष्ट्रीय अवैध बाजार कीमत लगभग 26 करोड़ भारतीय रुपये आंकी गई थी।
इसी तरह जून 2025 में मणिपुर के चुराचांदपुर क्षेत्र में की गई संयुक्त कार्रवाई के दौरान लगभग 7 किलो 755 ग्राम हेरोइन और 6 किलो 736 ग्राम अफीम बरामद की गई थी। ये घटनाएं दर्शाती हैं कि पूर्वोत्तर भारत में नशीले पदार्थों की समस्या केवल स्थानीय अपराध तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति नेटवर्क से भी है।
इसी पृष्ठभूमि में मालदा का महत्व और बढ़ जाता है। पूर्वोत्तर भारत से पश्चिम बंगाल की ओर जाने वाले परिवहन और व्यापारिक मार्गों का इस्तेमाल नशीले पदार्थों की तस्करी के लिए किए जाने का जोखिम है। मालदा बिहार और बांग्लादेश की सीमा से जुड़े भौगोलिक क्षेत्र में स्थित होने के कारण भी सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील है।
यहां उत्पादित, प्रसंस्कृत या भंडारित नशीले पदार्थ दूसरे राज्यों के बाजारों तक पहुंचाए जा सकते हैं। हालांकि कौन-सा पदार्थ किस मार्ग से किस जिले या देश तक पहुंचाया गया, इसकी पुष्टि गिरफ्तार व्यक्तियों के बयान, आर्थिक अभिलेखों, संचार संपर्कों और बरामद सामग्री की वैज्ञानिक जांच के आधार पर ही होनी चाहिए।
इस पूरे मामले का एक और चिंताजनक पहलू तस्करी में बच्चों और महिलाओं के इस्तेमाल का आरोप है। मालदा पुलिस सूत्रों के हवाले से प्रकाशित समाचारों में उल्लेख किया गया है कि 12 से 14 वर्ष तक के नाबालिग बच्चों को नशीले पदार्थों की ढुलाई और स्थानीय स्तर पर बिक्री के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
कुछ महिलाओं को भी तस्करी के काम में लगाए जाने और नवजात शिशु वाली महिलाओं को शिशु आहार या बच्चों से संबंधित सामग्री की आड़ में नशीले पदार्थ ले जाने के लिए इस्तेमाल किए जाने के आरोप सामने आए हैं। गिरोह के चंगुल से बचाए गए एक नाबालिग ने समाचारों के अनुसार बताया कि उन्हें पैसों के बजाय नशीले पदार्थ दिए जाते थे।
यदि ये आरोप जांच में प्रमाणित होते हैं, तो यह केवल तस्करी का मामला नहीं रहेगा, बल्कि अपराधियों द्वारा बच्चों की गरीबी, अशिक्षा, पारिवारिक असुरक्षा और नशे की लत का इस्तेमाल करने वाला गंभीर सामाजिक अपराध साबित होगा।
बच्चों को पहले छोटी मात्रा में नशीले पदार्थों की ढुलाई में लगाना, फिर उन्हें नशे का आदी बनाना और अंततः उन्हीं को स्थानीय स्तर पर बिक्री का माध्यम बना देना समाज के लिए दीर्घकालिक खतरा है। इससे विद्यालय, परिवार और स्थानीय समुदाय की सामाजिक संरचना भी कमजोर होती है।
मालदा की इस घटना ने नेपाल के सामने भी कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। विशेष रूप से कोशी प्रदेश के झापा, मोरंग और सुनसरी जैसे भारतीय सीमा से सटे जिलों में नशीले पदार्थों की तस्करी, बिक्री और युवाओं में बढ़ती नशे की लत के खिलाफ सुरक्षा सतर्कता बढ़ाने की आवश्यकता दिखाई देती है।
भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र और नेपाल के पूर्वी भूभाग के बीच व्यापार, आवागमन, पारिवारिक संबंध और परिवहन के पुराने संपर्क हैं। इसलिए यह संभावना नजरअंदाज नहीं की जा सकती कि भारत के विभिन्न राज्यों में सक्रिय नशीले पदार्थों के नेटवर्क सीमावर्ती बाजारों को संभावित उपभोक्ता क्षेत्र या पारगमन मार्ग के रूप में देख सकते हैं।
हालांकि मालदा में गिरफ्तार गिरोह का नेटवर्क नेपाल तक फैला होने की पुष्टि अभी नहीं हुई है। पश्चिम बंगाल पुलिस ने नेपाल में इस गिरोह के कारोबार या आपूर्ति संबंधी कोई औपचारिक जानकारी सार्वजनिक की हो, ऐसा प्रमाण भी फिलहाल उपलब्ध नहीं है। इसलिए मालदा के गिरोह और नेपाल के नशीले पदार्थों के कारोबार के बीच प्रत्यक्ष संबंध होने का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
फिर भी भारतीय जांच का दायरा बढ़ने पर बिहार, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर भारत से जुड़े संभावित आपूर्ति एवं वितरण संबंधों की जांच में नेपाल से जुड़े संपर्क भी महत्वपूर्ण विषय बन सकते हैं।
भारतीय नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो की वर्ष 2023-24 की वार्षिक रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि पूर्वोत्तर भारत से पूर्वी राज्यों की ओर नशीले पदार्थों की आवाजाही मुख्य रूप से सड़क मार्ग से होती है। इसी रिपोर्ट में भारत-नेपाल सीमा से भी उल्लेखनीय मात्रा में गांजे की तस्करी होने की जानकारी दी गई है।
यह तथ्य बताता है कि नेपाल और भारत के बीच खुली आवाजाही का अपराधी दुरुपयोग कर सकते हैं और इस संभावना को सुरक्षा नीति का महत्वपूर्ण विषय बनाया जाना चाहिए।
एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य के अनुसार भारतीय गृह मंत्रालय द्वारा जुलाई २०२६ में सार्वजनिक की गई जानकारी में बताया गया कि वर्ष २०२१ से २०२५ के बीच पूर्वोत्तर भारत में ४,६२४ किलो कृत्रिम उत्तेजक नशीले पदार्थ और २,६५२ किलो हेरोइन बरामद की गई थी। ये आंकड़े पूर्वोत्तर भारत में नशीले पदार्थों की तस्करी की गंभीरता को दर्शाते हैं।
नेपाल के सामने चुनौती केवल सीमा पर नशीले पदार्थों के साथ पकड़े जाने वाले लोगों को गिरफ्तार करना नहीं है। इसके पीछे सक्रिय आर्थिक नेटवर्क, स्थानीय वितरकों, संपर्क सूत्रों और युवाओं को नशे की लत में फंसाने वाले समूहों की पहचान करना भी उतना ही आवश्यक है।
मालदा में उत्पादित नशीले पदार्थ नेपाल तक पहुंचते हैं या नहीं, इसकी जांच के साथ-साथ मणिपुर और म्यांमार की दिशा से भारत में प्रवेश करने वाले नशीले पदार्थों के मार्ग, बिहार के बाजारों और नेपाल से जुड़े संभावित आपूर्ति संबंधों पर भी सूचनाओं का आदान-प्रदान होना चाहिए।
नेपाल पुलिस के नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो, सशस्त्र पुलिस बल, सीमा शुल्क प्रशासन और भारत के सीमा सुरक्षा बल के बीच नियमित सूचना आदान-प्रदान तथा संयुक्त निगरानी को प्रभावी बनाया जा सकता है।
विशेष रूप से झापा के काकड़भिट्टा, भद्रपुर, पाठामारी और पन्थापाड़ा, मोरंग के रानी तथा सुनसरी के सीमावर्ती आवागमन केंद्रों पर जोखिम आधारित निगरानी, संदिग्ध आर्थिक लेन-देन की जांच और नशीले पदार्थों के सेवन में फंस रहे किशोर-किशोरियों की पहचान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
खुली सीमा को बंद करना इसका व्यावहारिक समाधान नहीं है। इसके बजाय वैध आवागमन को आसान बनाए रखते हुए अपराधियों को इसका दुरुपयोग करने से रोकने वाली सुरक्षा व्यवस्था विकसित करना आवश्यक है। विद्यालयों और कॉलेजों में जागरूकता अभियान, स्थानीय स्तर पर नशामुक्ति एवं पुनर्वास सेवाएं और अभिभावकों के साथ सहयोग भी पुलिस कार्रवाई जितने ही महत्वपूर्ण हैं।
दूसरी ओर भारत की जांच एजेंसियों के लिए भी केवल मालदा के गिरोह के सदस्यों को गिरफ्तार कर लेना सफलता का पर्याप्त प्रमाण नहीं होगा।
कुमारपुर में मिले उत्पादन केंद्र का स्रोत क्या है? रासायनिक कच्चा माल किसने उपलब्ध कराया? उत्पादन के लिए आर्थिक निवेश किसने किया? वितरण की जिम्मेदारी किसके पास थी? गिरफ्तार व्यक्तियों का दूसरे राज्यों के कारोबारियों से किस प्रकार का संबंध था?
इन सभी सवालों के जवाब सामने आना जरूरी है। कालियाचक में बरामद मॉर्फिन का स्रोत और गंतव्य पता लगाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसके लिए भारतीय राज्यों के बीच पुलिस समन्वय, बैंकिंग लेन-देन की जांच, डिजिटल साक्ष्यों का विश्लेषण और मनी लॉन्ड्रिंग से संबंधित जांच आवश्यक होगी।
नशीले पदार्थों के कारोबार की सबसे बड़ी ताकत उसका भारी मुनाफा है। कुछ लाख रुपये के निवेश से करोड़ों रुपये का अवैध कारोबार करने की संभावना बेरोजगार युवाओं, आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों और आपराधिक समूहों को आकर्षित करती है।
जब अपराधी स्थानीय समाज के बच्चों, महिलाओं और बेरोजगार युवाओं को अपने कारोबार का माध्यम बनाने लगते हैं, तब यह समस्या पुलिस नियंत्रण से आगे बढ़कर एक गंभीर सामाजिक संकट का रूप ले सकती है। इसलिए नशीले पदार्थों के नियंत्रण को केवल गिरफ्तारी, बरामदगी और मुकदमे दर्ज करने के आंकड़ों तक सीमित नहीं रखा जा सकता।
मालदा के कुमारपुर में हुई पुलिस कार्रवाई और कालियाचक में हुई हालिया बरामदगी ने पूर्वोत्तर भारत से पूर्वी भारत की ओर फैलते नशीले पदार्थों के संभावित नेटवर्क की संरचना पर कई सवाल खड़े किए हैं।
इसकी जांच से नेपाल तक कोई संपर्क या आपूर्ति संबंध सामने आता है या नहीं, यह आने वाले दिनों में महत्वपूर्ण विषय होगा। अभी नेपाल को इस गिरोह का गंतव्य या पारगमन केंद्र घोषित करना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। लेकिन सीमावर्ती क्षेत्रों में सतर्कता बढ़ाने, भारतीय जांच एजेंसियों के साथ समन्वय करने और संभावित जोखिमों की समय रहते पहचान करने में देरी करना भी समझदारी नहीं होगी।
मालदा की पहचान आम और नकली नोटों के इतिहास से निकलकर नशीले पदार्थों के उत्पादन और तस्करी की खबरों तक पहुंचना केवल एक जिले की अपराध कथा नहीं है। यह दक्षिण एशिया में सीमा पार संगठित अपराध, कमजोर सामाजिक सुरक्षा और युवा पीढ़ी के भविष्य से जुड़ी एक गंभीर चेतावनी है।
आज कुमारपुर की गलियों में दिखाई देने वाला नशीले पदार्थों का कारोबार कल सीमा पार के बाजारों तक पहुंच सकता है। इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि मालदा में कितने किलो नशीले पदार्थ बरामद हुए, बल्कि यह भी है कि इसके पीछे मौजूद आर्थिक शक्ति, आपूर्ति संबंध और अपराधियों का पूरा नेटवर्क आखिर कहां तक फैला हुआ है।
इस जांच से मिलने वाले जवाब भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र और नेपाल के सीमावर्ती समाज की सुरक्षा iरणनीति को भी नई दिशा देने में महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।





