देवेन्द्र के ढुङगाना
नेपाल–भारत संबंधों को केवल दो संप्रभु राष्ट्रों के बीच के कूटनीतिक संबंध के रूप में समझना अधूरा होगा। यह संबंध राज्य–राज्य के बीच के औपचारिक संबंधों से कहीं अधिक पुराना, गहरा और बहुआयामी है। हिमालय से लेकर गंगा के मैदान तक फैला भूगोल, साझा सभ्यता, भाषा, संस्कृति, धर्म, व्यापार, आवागमन और पारिवारिक संबंध इसे विशिष्ट बनाते हैं। विशेष रूप से मधेश और भारत का सीमांचल क्षेत्र इस संबंध का जीवंत आधार है। सीमा के दोनों ओर रहने वाले लोगों के दैनिक व्यवहार, सुख–दुःख, विवाह, त्योहार, व्यापार और पारिवारिक संबंध नेपाल–भारत संबंधों को व्यवहार में निरंतरता प्रदान करते आए हैं।
इतिहास की दृष्टि से देखें तो आज की नेपाल–भारत सीमा हमेशा अपने वर्तमान स्वरूप में नहीं थी। मिथिला, अवध और तिरहुत जैसे सांस्कृतिक–ऐतिहासिक भूभागों के बीच राजनीतिक सीमाएँ बदलती रही हैं, लेकिन सामाजिक और सांस्कृतिक संबंध विच्छेदित नहीं हुए। आधुनिक राज्यों की सीमाएँ बनने के बाद भी सीमा के दोनों ओर के समाजों के बीच संबंध समाप्त नहीं हुए। बल्कि खुली सीमा ने उन पुराने संबंधों को निरंतरता देने में महत्वपूर्ण माध्यम की भूमिका निभाई। इसलिए नेपाल–भारत संबंधों का इतिहास केवल राज्यों द्वारा किए गए संधि और समझौतों में ही नहीं, बल्कि सीमावर्ती जनता की पीढ़ियों से चली आ रही जीवन-पद्धति में भी खोजा जाना चाहिए।
सन् १८१६ की सुगौली संधि के बाद नेपाल और ब्रिटिश भारत के बीच सीमा-रेखा एक नई राजनीतिक वास्तविकता के रूप में स्थापित हुई। बाद में भारत के स्वतंत्र होने के पश्चात नेपाल और भारत के बीच १९५० की शांति तथा मैत्री संधि ने द्विपक्षीय संबंधों को औपचारिक आधार प्रदान किया। लेकिन इन राजनीतिक और कूटनीतिक संरचनाओं के नीचे जनस्तर पर विकसित संबंधों का इतिहास इससे कहीं पुराना है। नेपाल और भारत के नागरिकों के बीच आवागमन, व्यापार, धार्मिक यात्राएँ, रोजगार तथा वैवाहिक संबंध निरंतर चलते रहे। इसलिए नेपाल–भारत संबंधों को केवल काठमांडू और नई दिल्ली के कूटनीतिक निर्णयों से परिभाषित नहीं किया जा सकता।
इस संबंध का सबसे संवेदनशील पक्ष मधेश और भारत का सीमांचल क्षेत्र है। सीमा के दोनों ओर एक जैसी भाषाएँ, मिलती-जुलती संस्कृतियाँ, समान सामाजिक व्यवहार और पारिवारिक रिश्तों वाले समुदाय निवास करते हैं। कई परिवारों की बेटियाँ एक देश में और उनके मायके या रिश्तेदार दूसरे देश में हैं। जन्म से लेकर विवाह और मृत्यु तक के संस्कारों में सीमा पार रहने वाले रिश्तेदारों की भागीदारी सामान्य सामाजिक परंपरा के रूप में रही है। इसी कारण नेपाल–भारत संबंधों को ‘रोटी–बेटी का संबंध’ कहा जाता है। यह किसी कूटनीतिक नारे से अधिक सीमावर्ती समाज के वास्तविक जीवन से जुड़ी अभिव्यक्ति है।
नेपाल–भारत संबंधों का एक अन्य महत्वपूर्ण आधार आर्थिक परस्पर निर्भरता है। नेपाल एक स्थलरुद्ध राष्ट्र होने के कारण तीसरे देशों के साथ व्यापार तथा आपूर्ति व्यवस्था में भारत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। नेपाल की दैनिक उपभोग की वस्तुओं से लेकर औद्योगिक कच्चे माल तक का बड़ा हिस्सा भारतीय बाजार और पारगमन प्रणाली से जुड़ा हुआ है। दूसरी ओर लाखों नेपाली भारत में रोजगार, व्यवसाय और अध्ययन के लिए जाते रहे हैं। भारतीय निजी क्षेत्र का नेपाल में निवेश तथा नेपाली उपभोक्ताओं और व्यवसायों का भारतीय बाजार से संबंध भी दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं को परस्पर जोड़ता है। इसलिए आर्थिक संबंधों को केवल आयात–निर्यात के आँकड़ों से नहीं, बल्कि सीमा के दोनों ओर के लोगों के जीवन से जोड़कर देखना आवश्यक है।
धार्मिक और सांस्कृतिक संबंध भी उतने ही गहरे हैं। पशुपतिनाथ, जनकपुरधाम, मुक्तिनाथ, लुंबिनी, काशी, अयोध्या, गया और बोधगया जैसे धार्मिक एवं सांस्कृतिक केंद्र लंबे समय से नेपाल और भारत के लोगों को जोड़ते आए हैं। मिथिला सभ्यता तथा जनकपुर–अयोध्या के बीच का सांस्कृतिक संबंध इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। त्योहारों, विवाह, धार्मिक अनुष्ठानों और तीर्थयात्राओं में होने वाली सहभागिता ने राजनीतिक सीमाओं से ऊपर उठकर जनस्तरीय संबंधों को निरंतरता दी है।
भाषा भी इस संबंध को सहज बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मैथिली, भोजपुरी, अवधी, हिंदी आदि भाषाओं का साझा भाषाई क्षेत्र सीमावर्ती समुदायों के बीच संवाद में कोई बड़ा अवरोध उत्पन्न नहीं होने देता। भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं है; यह सामाजिक निकटता, व्यापारिक सुविधा और सांस्कृतिक पहचान का आधार भी है। सीमावर्ती क्षेत्रों में एक ही परिवार और समुदाय के सदस्य आवश्यकता के अनुसार दोनों ओर के भाषाई और सामाजिक परिवेश को सहज रूप से अपनाते रहे हैं।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यही जनस्तरीय संबंध विभिन्न प्रशासनिक, सुरक्षा और सीमा शुल्क संबंधी व्यवस्थाओं के कारण दबाव में आने की शिकायतें बढ़ रही हैं। खुली सीमा का अर्थ यह नहीं है कि सीमा प्रबंधन आवश्यक नहीं है। तस्करी, अपराध और अवैध गतिविधियों पर नियंत्रण करना राज्य की जिम्मेदारी है। लेकिन सुरक्षा और सीमा शुल्क के नाम पर की जाने वाली व्यवस्थाएँ यदि सीमावर्ती नागरिकों के सामान्य सामाजिक और पारिवारिक आवागमन को अनावश्यक रूप से कठिन बना दें, तो इससे संबंधों में मनोवैज्ञानिक दूरी बढ़ सकती है। विशेष रूप से विवाह, पारिवारिक मुलाकात, त्योहार और उपहारों के आदान–प्रदान जैसी स्वाभाविक गतिविधियों को केवल संदेह की दृष्टि से देखना जनस्तरीय संबंधों के लिए उचित नहीं है।
सीमावर्ती लोगों की इसी पीड़ा को नेपाल–भारत संबंधों के निर्माण की राष्ट्रीय नीति के केंद्र में रखा जाना चाहिए। काठमांडू और नई दिल्ली में तैयार होने वाली नीति यदि सीमांचल के वास्तविक जीवन से मेल नहीं खाती, तो कागज पर संबंध चाहे जितने मजबूत दिखाई दें, व्यवहार में दूरी बढ़ सकती है। संबंधों की संवेदनशीलता को समझने के लिए सीमाक्षेत्र का स्थलीय अध्ययन, स्थानीय समुदायों के साथ संवाद तथा स्थानीय आवश्यकताओं और अनुभवों को नीति-निर्माण में शामिल करना आवश्यक है।
नेपाल–भारत संबंधों में ‘राष्ट्रहित’ और ‘जनहित’ को एक-दूसरे के विरोधी के रूप में प्रस्तुत करना भी उचित नहीं है। दीर्घकालीन राष्ट्रहित का आधार ही जनता का हित है। सीमावर्ती नागरिकों की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक आवश्यकताओं को संबोधित किए बिना यदि संबंधों को केवल सुरक्षा, रणनीति या भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा जाए, तो संबंधों का वास्तविक आधार कमजोर हो सकता है। विश्व और क्षेत्रीय राजनीति की बदलती प्राथमिकताओं के बीच भी सीमांचल के लोगों के दैनिक जीवन को नीति के केंद्र में रखा जाना चाहिए।
इसके लिए नेपाल और भारत को सीमावर्ती नागरिकों के सहज आवागमन, पारिवारिक तथा वैवाहिक गतिविधियों, स्थानीय व्यापार, धार्मिक यात्राओं आदि से सीधे जुड़े विषयों पर व्यावहारिक और मानवीय व्यवस्था विकसित करनी चाहिए। सुरक्षा और सुविधा के बीच संतुलन कायम करते हुए आधुनिक तकनीक का उपयोग किया जा सकता है, लेकिन तकनीक और प्रशासन जनता की सेवा के लिए होने चाहिए, उन्हें अनावश्यक परेशानी देने के लिए नहीं।
नेपाल–भारत संबंधों का भविष्य केवल दोनों देशों की सरकारों की इच्छा से निर्धारित नहीं होगा। इसे सीमा के दोनों ओर रहने वाले लाखों लोगों का दैनिक जीवन भी निर्धारित करता है। इसलिए यदि संबंधों को नई ऊँचाई तक ले जाना है, तो काठमांडू और नई दिल्ली के कूटनीतिक संवाद के साथ-साथ जनकपुर, वीरगंज, विराटनगर, सिरहा, सप्तरी, महोत्तरी से लेकर भारत के सीमांचल क्षेत्रों तक के लोगों की आवाज को भी महत्व देना होगा।
अंततः नेपाल–भारत संबंधों की वास्तविक शक्ति न तो संधि–समझौतों में है और न ही राजनीतिक भाषणों में। इसकी मूल शक्ति साझा इतिहास, सामाजिक निकटता, पारिवारिक रिश्तों, आर्थिक परस्पर निर्भरता, संस्कृति, धर्म, भाषा और सीमांचल के जीवंत संबंधों में है। समय के साथ राज्य की सीमाएँ और नीतियाँ बदल सकती हैं, लेकिन जनस्तर पर स्थापित संबंधों का सम्मान और संरक्षण किया जाए तभी नेपाल–भारत संबंध दीर्घकालीन रूप से मजबूत रह सकते हैं। इसलिए अब की संबंध नीति केवल इस प्रश्न तक सीमित नहीं रहनी चाहिए कि ‘सीमा को कैसे अधिक कड़ा बनाया जाए’, बल्कि इसका केंद्र यह प्रश्न होना चाहिए कि ‘सीमा को व्यवस्थित करते हुए लोगों के बीच संबंधों को और अधिक सहज, सम्मानजनक और मजबूत कैसे बनाया जाए।’ यही दृष्टिकोण नेपाल–भारत के ऐतिहासिक संबंधों को वर्तमान की आवश्यकताओं और भविष्य की संभावनाओं से जोड़ सकता है।











